सर्दी की धूंप हो, और आंखें मीचे आप सुन रहीं हों एक दिलचस्प किस्सा...या फिर घर का काम निपटाते हुए एक गुदगुदाने वाली कहानी आपके काम को हल्का बना दे...या रात को सोते हुए, बत्तिया बुझाकर एक अफसाना सुनते सुनते आप नींद में डूब जाये

अगर ये परिदृश्य आपको अच्छा लगा तो Audible.in पर लॉन्च हुई नयी सीरीज "दिल लोकल" आपको पसंद आएगी। इस कहानी की सीरीज में मुंबई लोकल के इर्द-गिर्द मौजूद लोगों और उनकी कहानियों की चर्चा की गई है। वैसे तो अक्सर कहानियां लिखी और पढ़ी जाती हैं, लेकिन इस ऑडियो प्लेटफॉर्म पर इन्हें सुनाया जा रहा है। इसी सीरीज और ऑडिबल प्लेटफॉर्म को लेकर हमने जाने माने लेखक दिव्य प्रकाश दुबे और व्यंगकार राकेश कायस्थ से कुछ बातें कीं।

सवाल- इस सीरीज को लेकर आपका एक्सपीरियंस कैसा रहा?

जवाब- दिव्य प्रकाश दुबे और राकेश कायस्थ दोनों का ही ये कहना था कि इस प्लेटफॉर्म में उन्हें कुछ भी करने के लिए बहुत मुश्किल नहीं हुई। ऑडिबल प्लेटफॉर्म बहुत ही अच्छा रहा है। इसके पहले 'पिया मिलन चौक' पर भी हमने काम किया था। इसके साथ ही 'दिल लोकल' में भी काम किया जहां हमारे लिए ये प्रोसेस बहुत आरामदायक रहा। दिव्य प्रकाश दुबे जी का कहना है कि 'क्योंकि भारत में अभी ऑडियो प्लेटफॉर्म धीरे-धीरे आ रहा है इसलिए हम इससे और अच्छे रिस्पॉन्स की उम्मीद करते हैं।'

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सवाल- 'दिल लोकल' के किरदारों के चुनाव में क्या खास है?

जवाब- 'दिल लोकल' में आम इंसानों के बारे में और उनकी जिंदगियों के बारे में बात की जा रही है। जिन कहानियों के बारे में यहां बात हो रही है वो सभी किसी न किसी भावना से जुड़ी हैं। राकेश जी के मुताबिक इनमें कोई थॉट प्रोसेस नहीं था। ये कहानियां बस अपने आप ही बनती चली गईं। इन कहानियों के कुछ किरदारों को तो बरसों तक फॉलो किया गया है और फिर उन्हें बहुत ही अच्छे से शब्दों में पिरोया गया है। ये कहानियां सुनकर आपके अंदर कई सारी भावनाएं आएंगी जिन्हें आप आसानी से व्यक्त नहीं कर पाएंगे।

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सवाल- अपने पर्सनल एक्सपीरियंस को मुंबई लोकल से कैसे जोड़ सकते हैं?

जवाब- इस सवाल के जवाब में दिव्य प्रकाश जी का कहना है कि वो जब 2008 में आए थे तो लोकल का सफर उनके लिए बहुत मुश्किल था। वो इंटर्नशिप करने जाते थे और उन्होंने ये कहा था कि वो ऑफिस टाइमिंग में सफर नहीं करेंगे क्योंकि रोज़ाना उन्हें आने के लिए कम से कम 4-5 लोकल छोड़नी पड़ती थी। तो उस समय काफी मुश्किलें हुईं, लेकिन उन्होंने एक बात सोची कि ये कोई बड़ी बात नहीं है, अगर आप टिके रहेंगे तो ये हो ही जाएगा। बस उसी जिद में सफलता मिलती चली गई। मुंबई लोकल आपको ये सिखाती है कि टिके रहना बहुत जरूरी है। (भारत की सबसे प्रभावशाली 50 बिज़नेस वीमेन की लिस्ट

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सवाल- इस सीरिज में व्यंग्य का कितना अहम रोल है?

जवाब- राकेश जी का इस सवाल के जवाब में कहना था कि ये सीरीज व्यंग्य से नहीं बल्कि असल जिंदगी से जुड़ी है। व्यंग्स और हंसी ठिठोली तो असल जिंदगी का हिस्सा होती है और इसलिए हम ये कह सकते हैं कि इसमें व्यंग्य का रोल बहुत कम है। चैलेंज ये था कि राकेश जी व्यंग्यकार हैं और उससे अलग उन्हें कुछ करना था, लेकिन इस ऑडिबल सीरीज में उन्होंने बहुत ही बखूबी से इस काम को किया है।

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सवाल- दादी-नानी की कहानियां सुनना हमें बहुत अच्छा लगता था, ऑडिबल पूरी तरह से कहानियों पर आधारित है तो एक लेखक को अच्छी तरह से कहानियां सुनाने के लिए क्या करना चाहिए?

जवाब- इस सवाल के जवाब में दिव्य प्रकाश जी ने बखूबी कहा कि कहानी हमेशा ऐसे ही सुनाएं कि आप अपने पुराने दोस्त को कोई किस्सा सुना रहे हों। कोई ऐसा दोस्त जिससे बहुत समय से नहीं मिले, लेकिन फिर भी जब मिलें तो किस्से उतने ही रोचक हों।

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रीडर्स को दिया ये मैसेज-

इन दोनों ही ने हमारे रीडर्स को एक मैसेज दिया कि जिस प्रकार मुंबई लोकल में लोग चढ़ते हैं और आगे बढ़ते हैं उसी प्रकार उन्हें खुद को रोकना नहीं है और आगे बढ़ते रहना है। अगर आप आगे नहीं बढ़ेंगे तो जिंदगी का सफर मुश्किल हो जाएगा। भले ही कितनी भी भीड़ हो और मुश्किलें आएं तब भी आगे बढ़ना है।

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