हिन्दू कैलेंडर के अनुसार दिवाली के छठवें दिन कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की षष्टी तिथि को छठ पूजा के रूप में मनाया जाता है। यह त्योहार मुख्य रूप से भारत के बिहार राज्य में मनाया जाता है। लेकिन पूरे भारत में अब इस त्योहार को बड़ी धूम धाम से मनाया जाने लगा है। यह त्योहार मुख्य रूप से तीन दिनों तक मनाया जाता है जिसमें नहाय खाय, खरना और संध्या अर्घ्य प्रमुख हैं।

छठ पूजा के लिए मान्यता है कि जो भी पति-पत्नी पूरे श्रद्धा भाव से छठ माता का पूजन करते हैं उनका स्वास्थ्य ठीक बना रहता है और निःसंतान दम्पत्तियों को संतान सुख की प्राप्ति होती है। आइए अयोध्या के जाने माने पंडित राधे शरण शास्त्री जी से जानें इस साल कब मनाई जाएगी छठ पूजा और इसका क्या महत्व है।  

छठ पूजा की तिथि और शुभ मुहूर्त 

chhath puja vidhi significance

छठ पूजा मुख्य रूप से सूर्य देव को समर्पित पर्व है। यह तीन दिनों तक चलता है जिसमें इसका आरम्भ नहाय खाय से होता है। इस साल यह पर्व 8 नवंबर, सोमवार से आरंभ हो रहा है। 

  • नहाय खाय से छठ पूजा का प्रारंभ- 08 नवंबर 2021, सोमवार
  • खरना- 09 नवंबर 2021
  • छठ पूजा संध्या अर्घ्य -10 नंवबर 2021, बुधवार
  • छठ पूजा समापन- 11 नवंबर 2021, गुरुवार, उगते हुए सूर्य को अर्घ्य

नहाय खाय 

छठ पूजा का पहला दिन नहाय खाय के रूप में जाना जाता है। इस दिन पूरा परिवार एक पारंपरिक भोजन तैयार करता है और दोपहर में इसे भोग के रूप में परोसता है, इस तैयार भोजन को परिवार के सभी लोग मिलजुलकर ग्रहण करते हैं।

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खरना 

छठ पूजा के दूसरे दिन, खरना में महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं। ये व्रत सूर्योदय से शुरू हो जाता है और सूर्यास्त तक चलता है। महिलाएं सूर्य की पूजा करने के बाद व्रत का पारण करती हैं। 

संध्या अर्घ्य 

इस दिन महिलाएं एक दिन का उपवास रखती हैं और अगले दिन सूर्योदय के बाद उपवास तोड़ती हैं। 

सुबह का अर्घ्य

morning arghya

छठ उत्सव चौथे और अंतिम दिन समाप्त होता है जब भक्त उषा अर्घ्य यानी उगते हुए उगते सूरज की प्रार्थना करते हैं। इस प्रकार ये त्योहार चार दिनों तक बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है।

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छठ पूजा का महत्व

छठ माता का व्रत सूर्य देव, ऊषा , प्रकृति, जल और वायु को समर्पित होता है। मान्यतानुसार इस व्रत को श्रद्धा और विश्वास से करने से निःसंतान दम्पत्तियों को भी संतान सुख की प्राप्ति होती है। बताया जाता है कि छठ व्रत (क्यों मनाई जाती है छठ पूजा) संतान की रक्षा और उनके उज्जवल भविष्य और जीवन में खुशहाली लाने के लिए किया जाता है। इस व्रत को श्रद्धा पूर्वक करने से संतान सुख में वृद्धि के साथ उसे प्रत्येक क्षेत्र में सफलता भी मिलती है। इस प्रकार छठ माता का व्रत भक्तों के लिए विशेष रूप से फलदायी माना जाता है। 

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छठ पूजा की कथा 

प्राचीन कथा के अनुसार प्रियंवद नाम का एक राजा था और उनकी पत्नी मालिनी थीं। शादी के कई सालों बाद भी जब प्रियंवद को संतान की प्राप्ति नहीं हुई तब वह बहुत दुखी रहने लगे। उन्होंने संतान प्राप्ति के लिए महर्षि कश्यप से विचार-विमर्श कर यज्ञ करवाने का निश्चय किया। तब यज्ञ की आहुति की खीर महर्षि कश्यप ने राजा प्रियंवद की पत्नी को दी और उसी के प्रभाव से उन्हें संतान के रूप में पुत्र की प्राप्ति हुई, लेकिन वह पुत्र मरा हुआ पैदा हुआ। पुत्र वियोग में जब राजा ने अपने प्राण त्यागने का निश्चय किया तो ब्रह्मा जी की मानस पुत्री देवसेना वहां पर प्रकट हुई और उन्हें पुत्र को जीवित करने के लिए छठ व्रत करने को कहा। इस व्रत के प्रभाव से राजा प्रियंवद का पुत्र जीवित हो गया। तब से छठ पूजा बड़ी ही धूमधाम से पूरे देश में मनाई जाती है।

इस प्रकार छठ पूजा का हिंदुओं में विशेष महत्व है और इन चार दिनों में छठ माता की पूजा विधि विधान से की जानी चाहिए। अगर आपको यह लेख अच्छा लगा हो तो इसे शेयर जरूर करें व इसी तरह के अन्य लेख पढ़ने के लिए जुड़ी रहें आपकी अपनी वेबसाइट हरजिन्दगी के साथ।

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