शंख की गूंज और ढोल की थाप, फेस्टिव सीजन का यह 'शोर' कैसे कम करता है स्ट्रेस? जानें
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फेस्टिव सीजन आते ही हमारे आसपास के माहौल में पॉजिटिविटी बढ़ जाती है। कहीं ढोल की आवाज सुनाई देती है, तो कहीं शंख और मंदिर के घंटियों की गूंज। बाकी दिनों में इनकी आवाजें भले ही नॉर्मल लगती हैं, लेकिन त्योहारों के समय वही आवाजें मन को सुकून पहुंचाती हैं। कई लोगों को ढोल की थाप सुनकर एक्साइटमेंट आता है, तो कुछ लोगों का शंख और घंटियों की आवाज से मन खुश हो जाता है।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इन आवाजाें का हमारे दिमाग पर भी कोई असर पड़ता है? दरअसल, नीलम मिश्रा (क्लिनिकल और रिहैबिलिटेशन न्यूरोसाइकोलॉजिस्ट, सर गंगा राम अस्पताल, नई दिल्ली) ने बताया कि फेस्टिवल्स में सुनाई देने वाली ये आवाजें सिर्फ पूजा-पाठ या परंपरा तक ही सीमित नहीं हैं। कई बार ये आवाजें तनाव और चिंता को भी कम सकती हैं। आइए इसके बारे में विस्तार से जानते हैं-
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दिमाग को शांत करती हैं रिदम वाली आवाजें
त्योहारों पर बजने वाले ढोल की एक फिक्स बीट या रिदम होती है। ऐसे में डॉक्टर नीलम का कहना है कि ऐसी एक जैसी आवाजें हमारे दिमाग को फोकस करने में बहुत मदद करती हैं। जब हमारा ध्यान सिर्फ उस आवाज या उसकी धुन पर टिक जाता है, तो बेकार की टेंशन और उलझनें कुछ देर के लिए दिमाग से गायब हो जाती हैं। यही वजह है कि ढोल की थाप सिर्फ जोश ही नहीं भरती बल्कि माइंड को रिलैक्स और एकाग्र भी कर देती है। हालांकि, इसका असर हर इंसान पर अलग-अलग हो सकता है।
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शंख और घंटियों की आवाज पहुंचाती हैं दिल को सुकून
आपको बता दें कि शंख की गूंज और मंदिर की घंटियां सुनते ही एक अलग ही शांति महसूस होने लगती है। ये आवाजें मन में पॉजिटिविटी और एक आध्यात्मिक सा कनेक्शन ले आती हैं। त्योहारों के टाइम जब हम पूजा-पाठ में बिजी होते हैं, तो ये आवाजें उस माहौल का ऐसा हिस्सा बन जाती हैं कि अपने आप मन शांत हो जाता है।
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तनाव और चिंता हो जाती हैं कम
डॉ. नीलम ने बताया कि त्योहारों में गूंजने वाले ढोल, शंख और घंटियों का हमारे मेंटल हेल्थ पर बहुत पॉजिटिव असर पड़ता है। जैसे-
- एक रिदम वाली आवाजें दिमाग को फोकस करने में हेल्प करती हैं।
- इनसे स्ट्रेस और एंग्जायटी काफी हद तक कम होती है।
- शंख और घंटियों की ट्यून दिल-दिमाग को एकदम शांत और पॉजिटिव कर देती है।
यानी त्योहारों का यह शोर हर बार इरिटेटिंग नहीं होता बल्कि यह माइंड के लिए थेरेपी जैसा काम भी कर सकता है।
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अकेलापन भी दूर करता है फेस्टिव सीजन
आपकाे बता दें कि फेस्टिव सीजन में हम अकेले नहीं बल्कि फैमिली, फ्रेंड्स और आस-पास के लोगों के साथ होते हैं। ऐसे में साथ मिलकर ढोल सुनना, आरती में शामिल होना और शंख-घंटियों की आवाज के बीच सेलिब्रेट करना सबको एक-दूसरे के करीब ले आता है। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि इस तरह साथ मिलकर त्योहार मनाने से अकेलापन और मानसिक तनाव दोनों दूर हो सकते हैं।
लाउड नॉइज से रहे सावधान
डॉक्टर ने कहा कि इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आवाज जितनी तेज होगी, उतना ही ज्यादा मजा आएगा। अगर वॉल्यूम जरूरत से ज्यादा हाई हो जाए, तो वह कानों के साथ-साथ आपके मेंटल हेल्थ को भी नुकसान पहुंचा सकती है। इसलिए त्योहारों पर ढोल-धमाके और शंख-घंटियों का मजा लें, लेकिन एक बैलेंस्ड और कान के लिए सही लगने वाले वॉल्यूम पर।
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- क्या साउंड थेरेपी वास्तव में काम करती है?
- हां, साउंड थेरेपी दिमाग की तरंगों को शांत करती है। विशिष्ट ध्वनियों की कंपन्न से स्ट्रेस हार्मोन कम होता है और मन गहरा सुकून महसूस करता है।
- मानसिक शांति के लिए कौन-सी आवाजें सबसे अच्छी हैं?
- बहते पानी की आवाज, चिड़ियों का चहचहाना, शंख की गूंज और हल्की घंटियों की प्राकृतिक ध्वनियां मानसिक शांति और एकाग्रता बढ़ाने के लिए सबसे बेहतरीन मानी जाती हैं।
- घर पर साउंड थेरेपी कैसे ले सकते हैं?
- घर पर शांत जगह बैठकर सिंगिंग बाउल, हल्की घंटी या प्राकृतिक ध्वनियों के ऑडियो ट्रैक सुनकर आप रोजाना 10-15 मिनट में ही रिलेक्स महसूस कर सकते हैं।
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