नवरात्रि में माता के दर्शन के लिए अगर आप कहीं जाना चाहते हैं, तो इस बार हिमाचल प्रदेश की इन दो देवियों के दर्शन करें। हिमाचल में नैना देवी और ज्वाला देवी शक्तिपीठ मंदिर बहुत माने जाते हैं और दूर-दराज से लोग यहां दर्शन के लिए आते हैं। मान्यताओं की मानें तो इन मंदिरों में हर किसी की कामना पूरा होती है। दोनों ही मंदिर अपने आप में अद्वितीय और आलौकिक हैं। अगर आप हिमाचल प्रदेश जा रहे हैं, तो इन मंदिरों के दर्शन जरूर करें और देवी शक्ति से आशीर्वाद जरूर लें।

नैना देवी शक्तिपीठ मंदिर

naina devi temple shaktipeeth

नैना देवी मंदिर हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में स्थित है। यह मंदिर देवी के 51 शक्तिपीठों में शामिल है। शिवालिक पर्वत श्रेणी की पहाड़ियों पर स्थित यह मंदिर समुद्र तल से 11000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। ऐसा माना जाता है कि यहां देवी सती के नेत्र गिरे थे, इसलिए यहां नैना देवी नाम से शक्तिपीठ स्थापित हुआ। मंदिर के गर्भगृह में तीन मूर्तियां हैं, जिसके एक तरफ माता काली है, दूसरी तरफ भगवान गणेश हैं तो मध्य में नैना देवी विराजमान हैं। 

पौराणिक कथा

देवी सती के अंग से बने शक्तिपीठ की एक और कहानी है। माना जाता है कि नैना नाम के लड़के की है, जो एक दिन अपने जानवरों को चराने ले गया और उसने देखा कि एक सफेद गाय अपने थनों से एक पत्थर पर दूध बरसा रही है। काफी समय तक उसने यह देखा और एक रात सोते वक्त उसे देवी मां ने दर्शन दिए। देवी मां ने कहा कि वह पत्थर उनकी पिंडी है। लड़के ने इस चीज को राजा बीर चंद को बताया और तभी उस जगह पर यह मंदिर बना। (उत्तराखंड के 5 मंदिर जहां प्रधानमंत्री से लेकर बॉलीवुड स्टार्स आते हैं अपनी मन्नत लेकर)

कैसे पहुंचे

फ्लाइट से: निकटतम हवाई अड्डा चंडीगढ़ में है और वहां से दूरी लगभग 100 किमी के करीब है।

ट्रेन से: निकटतम रेलवे स्टेशन आनंदपुर साहिब में है और वहां से दूरी लगभग 30 किमी के करीब है।

सड़क द्वारा : मंदिर दिल्ली से लगभग 350 किमी और चंडीगढ़ से 100 किमी और बिलासपुर सदर से लगभग 85 किमी दूर है। पंजाब और हिमाचल प्रदेश के सभी महत्वपूर्ण शहरों से लगातार राज्य परिवहन बस सेवाएं उपलब्ध हैं।

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ज्वाला देवी शक्तिपीठ मंदिर

jwala devi mandir shaktipeeth in hp

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में कालीधार पहाड़ी के बीच ज्वाला देवी का मंदिर बसा है। ज्वाला देवी तीर्थ स्थल को देवी के 51 शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ माना जाता है। शक्तिपीठ वह स्थान कहलाता है जहां माता सती के अंग गिरे थे। माना जाता है कि इस जगह पर ही देवी सती की जीभ गिरी थी। इस मंदिर में मां की ज्योत बिना तेल और बाती के सदियों से जल रही है।

ज्वाला देवी के मंदिर में नौ ज्वालाएं जलती हैं, जिसमें से एक प्रमुख ज्वाला देवी हैं। वहीं, यहां पर सभी ज्वालाओं के अपने नाम हैं। प्रमुख ज्वाला को महाकाली कहा जाता है तो वही बाकी आठ ज्वालाओं के नाम, अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विंध्यवासिनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अम्बिका और अंजी देवी हैं।

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ऐसी है मान्यता

ऐसा कहा जाता है कि मुगल सम्राट अकबर ने ज्वाला जी में ज्योतियों को बुझाने की काफी कोशिश की। अकबर ने इन ज्योतियों को बुझाने के लिए एक नहर खुदवाकर पानी छोड़ दिया था।।ज्योतियों पर लोहे के तवे भी चढ़ा दिए पर इन ज्योतियां को नहीं बुझा पाया। उसके बाद अकबर का अहंकार टूटा और वह नंगे पैर मां के दर्शन करने पहुंच गया। मां को सोने का छत्र चढ़ाया। सालों से मां ज्वाला की ज्योतियां जलने का कारण भी लोग आज तक पता नहीं कर पाए हैं।

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कैसे पहुंचे

फ्लाइट से : ज्वाला देवी मंदिर जाने के लिए आप पास के हवाई अड्डे तक जाएं। इसके बाद यहां से मंदिर तक जाने के लिए कार व बस सुविधा ले सकते हैं।

ट्रेन से : यदि आप रेल मार्ग से जाने वाले हैं तो पठानकोट से चलने वाली स्पेशल ट्रेन की मदद से पालमपुर जा सकते हैं। इसके बाद पालमपुर से मंदिर तक जाने के लिए बस या टैक्सी की सुविधा ले सकते हैं।

सड़क द्वारा : यात्री अपने निजी वाहनों या फिर हिमाचल प्रदेश टूरिज्म विभाग की बस के जरिए भी मंदिर पहुंच सकते हैं।

हिमाचल प्रदेश बाकी शहरों से इतनी दूर भी नहीं है। यहां जाना भी आसान है, इसलिए अगर आपका प्लान यहां जाने का बने तो माता के दर्शन करने का नवरात्रि से बड़ा अवसर क्या ही होगा। आपको यह लेख पसंद आया तो इसे लाइक और शेयर करें और  देवी के ऐसे ही शक्तिपीठों के बारे में जानने के लिए जुड़े रहें हरजिंदगी से।

Image Credit: nativeplanet