हमारा देश जिस संकट से अभी गुजर रहा है, उस बीच हमारे कुछ दोस्तों ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की एक बड़ी अदाकारा को सिर्फ इसलिए निशाना बना दिया क्योंकि उन्होंने एक फिल्म में सीता के किरदार के लिए बड़ी रकम की मांग की। कठघरे में खड़ी वो अभिनेत्री करीना कपूर खान हैं और यह जो हंगामा बरपा गया है, वो आलौकिक देसाई कि फिल्म 'सीता : द इनकार्नेशन' में उनके किरदार को लेकर हुआ है। सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर पर जंग छिड़ गई और ट्रेंड करने लगा #Boycottkareenakhan।

 

ऐसा क्यों होता है कि अगर एक टैलेंटेड एक्टर अपने किरदार के लिए बड़ी रकम की मांग करे तो वो सही है और क्यों किसी टैलेंटेड एक्ट्रेस की इसी मांग पर उस पर सवाल खड़े कर दिए जाते हैं। क्या उनके बहिष्कार करने की मांग बॉलीवुड की सदियों पुरानी पितृसत्तात्मक मानसिकता नहीं दिखाता? हालांकि हमने फिल्म इंडस्ट्री में ऐसा दौर भी देखा जब कई एक्ट्रेसेस को सफलता की गारंटी कहा जाता था। मीना कुमारी, नरगिस, नूतन, वहिदा रहमान जैसी अभिनेत्रियों का दौर भी आया जब उन्हें किसी फिल्म के लिए ज्यादा फीस दी गई। उसके बाद श्रीदेवी, माधुरी दीक्षित, जूही चावला जैसी अभिनेत्रियों ने यह लेगेसी आगे बढ़ाई। तो फिर क्यों यह सवाल बार-बार आता है? क्यों आज फिल्ममेकर्स अभिनेत्रियों को उनकी काबिलियत के हिसाब से नहीं जांचते। या क्यों अपने टैलेंट के बावजूद एक अभिनेत्री को फिल्मों में उस तरह के किरदार नहीं दिए जाते जो वह डिजर्व करती है?

1940-1950 का जमाना

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यह जमाना वो था जब राज कपूर की फिल्मों में उनकी लीडिंग लेडीज को देखने के लिए सिनेमा हॉल में लंबी लाइन लगती थी। जब नरगिस और मधुबाला जैसी अभिनेत्रियों ने हिंदी सिनेमा में अपने अभिनय के जरिए एक अमिट छाप छोड़ी। नरगिस को अपने जमाने की सबसे इंफ्लूंशियल एक्ट्रेस माना जाता था। आलम यह था कि हर निर्देशक और अभिनेता उनके साथ काम करना चाहता था। फिल्म 'मदर इंडिया' की सफलता में अगर किसी का सबसे बड़ा योगदान रहा तो वह नरगिस ही हैं। किसी फिल्म में उनका होना फिल्म सफलता की गारंटी थी। इतना ही नहीं, वह उस जमाने में सबसे ज्यादा फीस पाने वाली अभिनेत्री थीं, तो फिर आज लोगों को या फिल्मकारों को यह बात हजम करने में इतनी परेशानी क्यों होती है?

1970-1980 का जमाना

the hit era

इसी तरह 1970 के दशक में जया बच्चन, रेखा, हेमा मालिनी अर्श पर थीं। कहा जाता है ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी की पॉपुलेरिटी को देखते हुए जब उन्हें फिल्म 'शोले' में साइन किया तो उनको 75000 रुपये फीस मिली थी। उस दौर में किसी अभिनेत्री को मिलने वाली फीस से यह कहीं ज्यादा थी। फिल्म के निर्देशक रमेश सिप्पी बसंती के रोल के लिए हेमा मालिनी को ही चाहते थे और उसके लिए जो फीस हेमा मालिनी ने मांगी उन्हें दी गई। 

हिंदी सिनेमा की अभिनेत्री सुपरस्टार का जमाना

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हमारी बात की खबर के मुताबिक, जया प्रदा और मीनाक्षी शेशाद्री के बाद, अभिनेत्री श्रीदेवी एकलौती ऐसी अभिनेत्री थीं, जिन्होंने फिल्मी परदे पर राज किया। फिल्म 'सदमा' से मिली हिट ने उन्हें न सिर्फ शीर्ष पर पहुंचाया बल्कि 1986 में आई उनकी हिट फिल्म 'नागिन' के बाद उनकी फीस में इजाफा भी हुआ। ऐसा कहा जाता है कि उस दौरान उनकी फीस 40 लाख थी। मिस्टर इंडिया की रिलीज के बाद, श्रीदेवी अपने चरम पर पहुंच गईं और बॉलीवुड की निर्विवाद रूप से सबसे बड़ी सुपरस्टार बन गईं। उन्हें 'महिला बच्चन' कहा जाता था क्योंकि अमिताभ और श्रीदेवी दोनों उस समय लगभग 60 लाख रुपये फीस ले रहे थे। जब अमिताभ बच्चन की फिल्में बॉक्स ऑफिस पर कुछ खास नहीं कर पाईं तो उन्होंने खुदा गवाह में श्रीदेवी के साथ काम किया और फिल्म बॉक्स ऑफिस पर नंबर भुनाने में कामियाब रही थी। एक लीडिंग साइट को दिए गए इंटरव्यू में बोनी कपूर ने इस बात को साझा किया था कि फिल्म 'मिस्टर इंडिया' के लिए जब श्रीदेवी की मां ने 10 लाख रुपये की डिमांड की थी, तो बोनी कपूर ने उन्हें 11 लाख रुपये की अमाउंट के साथ साइन किया था।

इसी बीच फिल्म 'तेजाब' से माधुरी दीक्षित की एंट्री हुई। उनके सुपरहिट गानों ने एक बार फिर साबित किया कि फिल्म इंडस्ट्री में अभिनेत्रियों की बादशाहत कायम रहेगी। साल 1990 में श्रीदेवी, माधुरी दीक्षित, मीनाक्षी शेशाद्री और जूही चावला सबसे ज्यादा फीस पाने वाली अभिनेत्रियों में से एक थीं, तो फिर आज वापिस यह सवाल क्यों? उसके बाद आईं तमाम अभिनेत्रियों ने हर कदम पर साबित किया कि वे अपने साथी अभिनेताओं से किसी मुकाबले में कम नहीं है। ऐसी तमाम एक्ट्रेसेस हैं जो फिल्मी परदे पर नंबर्स की गारंटी रही हैं। इसके बावजूद एक फिर अभिनेत्री करीना कपूर खान की फीस पर बवाल क्यों? और यह पहली बार नहीं है जब किसी अभिनेत्री को उचित पेचेक के लिए निशाना बनाया गया हो। बॉलीवुड में जेंडर वेज गैप की चर्चा पहले भी कई बार हो चुकी है, लेकिन अब तक शायद ही कोई प्रगति हुई हो। तापसी पन्नू, कंगना रनौत, अनुष्का शर्मा जैसी प्रमुख अभिनेत्रियों ने इस मुद्दे पर हमेशा अपनी बात रखी।

तो आखिर दिक्कात कहां है?

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दुर्भाग्य यह है कि यह मुद्दा पितृसत्ता और सदियों से चली आ रही परंपरा पर टिका है, जहां आज भी कई मौकों पर माना जाता है कि महिलाएं पुरषों से कम हैं। जहां एक तरफ एक अभिनेता को अक्सर आसन पर बैठा दिया जाता है और एक अभिनेत्री की जगह फिल्मों में आइटम सॉन्ग और कुछ सेकेंड के किरदारों पर रह जाती है। ऐसा हमेशा ही होता है, जब एक अभिनेत्री को अभिनेता के बराबर नहीं देखा जाता। एक अभिनेत्री को गानों और डांस के जरिए ऑब्जेक्टिफाइ कर दिया जाता है। अगर उनकी किस्मत अच्छी हो तो उन्हें कुछ दो-तीन संवाद दे दिए जाते हैं। और ऐसा नहीं है कि हमने इन अभिनेत्रियों को मेनस्ट्रीम सिनेमा में एक सशक्त किरदार निभाते हुए न देखा हो। रानी मुखर्जी, विद्या बालन, करीना कपूर खान, कंगना रनौत जैसी अभिनेत्रियों द्वारा बॉक्स ऑफिस पर हिट फिल्में देने के बाद भी यह घटना हर बार मुख्यधारा में आ जाती है।

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वहीं महिला केंद्रित फिल्मों के मामले में, बजट कम होता है, क्योंकि निर्माता पहले ही यह सोच लेते हैं कि फिल्म नहीं चलेगी। कुछ ऐसी फिल्में जिनमें महिलाओं के सशक्त किरदार हैं। उनकी मार्केटिंग भी अभिनेताओं के नाम पर कर दी जाती है। बॉलीवुड के टॉप के एक्टर्स, बॉलीवुड की टॉप की एक्ट्रेसेस से लगभग तीन से चार गुना अधिक कमाते हैं, तो फिर हमारे कठघरे में अभिनेत्रियां क्यों और कैसे आ जाती हैं? 

साल 2003 में फिल्ममेकर करण जौहर ने अपनी फिल्म 'कल हो न हो' से अभिनेत्री करीना कपूर को सिर्फ इसलिए हटा दिया था क्योंकि करीना, शाहरुख जितनी ही फीस की मांग कर बैठी थीं। इसी वजह से दोनों के बीच लगभग साल भर तक बातचीत बंद रही। यह बात करण जौहर ने अपनी ऑटोबायोग्राफी में लिखी है। इतना ही नहीं, अभिनेत्री कंगना रनौत ने साल 2015 में एनडीटीवी को दिए एक इंटरव्यू में इस पर बात पर सवाल भी उठाया था। उन्होंने कहा था, ' अभिनेताओं को तीन गुना अमाउंट दी जाती है। कोई भी फिल्मी की सफलता की गैरंटी नहीं दे सकता, तो फिर यह भेदभाव क्यों?'

वहीं  सोनम कपूर ने करण जौहर के शो कॉफी विद करण में इस बात को कहा था, 'मुझे लगता है कि यह सही समय है, जब एक महिला की तरह, एक एक्टर की तरह और एक आर्टिस्ट की तरह हमें हमारा ड्यू मिलना चाहिए।' अभिनेत्री-अनुष्का शर्मा भी उन अभिनेत्रियों में से हैं जिन्होंने इस मुद्दे पर खुलकर बात की। उन्होंने एक इंटरव्यू के दौरान कहा था- ' अगर कोई ऐसा अभिनेता भी है, जिसका स्टैचर मेरे जैसा ही ही, उसको फिर भी ज्यादा फीस मिलेगी, क्योंकि वो एक पुरुष है। यह कुछ ऐसा है, जो बस है...।'

अपने चैट शो 'व्हाट वीमेन वॉन्ट' के एक एपिसोड में करीना कपूर ने वेतन समानता का मुद्दा उठाया था और अभिनेता अनिल कपूर से पूछा था कि क्या लीडिंग पुरुषों और महिलाओं के बीच वेतन अंतर को अभिनेताओं द्वारा संबोधित किया जाना चाहिए?

तो फिर कैसे खत्म हो यह भेदभाव

यह शायद तभी खत्म हो जब अभिनेत्रियों को फिल्मों मे इररिप्लेसेबल माना जाए। अभिनेता को ही क्यों सारे दमदार रोल मिलें? यह हक अभिनेत्रियों का भी है। आज जब 40-50 साल का एक अभिनेता अपने से कम उम्र की अभिनेत्रियों के साथ रोमांस कर रहा होता है, तो क्यों अभिनेत्रियों से यह उम्मीद रखी जाती है कि वह मां और दादी के किरदार निभाएं? आज फिल्ममेकर्स को और हमें इन रूढ़ियों को तोड़ने की जरूरत है। महिलाओं को फिल्म उद्योग में अधिक प्रतिनिधित्व करने और बिना किसी डर के अपना स्थान बनाने के लिए बातचीत करने की आवश्यकता है। हालांकि बदलाव की हवाएं धीरे-धीरे चलने लगी हैं, लेकिन दर्शकों के मन में महिलाओं की धारणा को बदलने में लंबा वक्त लगेगा।

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