सास बहू की लड़ाई तो हर घर में होती है। कभी किसी बात पर सास नाराज हो जाती है, तो कभी बहू ठीक से जिम्मेदारी निभा नहीं पाती है और झगड़ा बढ़ने लगता है। बातों -बातों में छोटी मोटी लड़ाई होना कोई बड़ी बात नहीं है। लेकिन जब झगड़ा इतना बढ़ जाए कि बात किसी की हत्या या आत्महत्या पर आ जाए तो आप क्या कहेंगे। जी हां, हाल ही में एक ऐसा मामला सामने आया जिसमें एक सास ने बहू को इतना प्रताड़ित किया कि बहू आत्महत्या के लिए मजबूर हो गई।

दरअसल ये मामला कुछ साल पुराना यानी साल 2006 का है लेकिन 80 साल की सास को सुप्रीम कोर्ट ने 3 महीने की जेल की सजा दी है। वास्तव में उस सास का क्रूर व्यवहार सजा के ही लायक था। आइए जानें क्या है पूरा मामला और कौन है 80 साल की क्रूर सास। 

क्यों दी गयी बुजुर्ग महिला को सजा 

old woman supreme court

दरअसल चेन्नई की रहने वाली मीरा को एक निचली अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए  के तहत दोषी ठहराया और सजा सुनाई, जिसे बाद में मद्रास उच्च न्यायालय ने बरकरार रखा। धारा 498ए उन लोगों पर लगाई जाती है जो महिलाओं के साथ क्रूरता का व्यवहार करते हैं। इसलिए अपनी बहू के साथ क्रूरता के लिए दोषी ठहराई गई एक 80 वर्षीय महिला को सुप्रीम कोर्ट ने उसकी अधिक उम्र के बावजूद 11 जनवरी 2022  को तीन महीने के लिए जेल भेज दिया, जिसने मामले को गंभीरता से लिया। 

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क्या है पूरा मामला 

चेन्नई में रहने वाली एक महिला मीरा की बहू ने साल 2006 में आत्महत्या कर ली थी। उस समय सास मीरा की उम्र लगभग 65 साल थी। दरअसल सास अपनी बहू को बात -बात पर ताना मारती थी। उस समय उसका पति विदेश में था और बहू अपनी सास के क्रूर व्यवहार को झेल नहीं पायी और आत्महत्या के लिए मजबूर हो गयी। सास को बहू के साथ क्रूरता करने का दोषी पाते हुए, जबकि उसका पति विदेश में था, बेंच ने इस बात पर जोर देते हुए कहा कि सास पर कोई नरमी दिखाने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि पति के बाहर होने की वजह से बहू घर में अकेली थी इसलिए सास का कर्तव्य उसकी देखभाल करना था न कि उसे प्रताड़ित करना। लेकिन सास घर की छोटी बातों से लेकर गहनों तक की कई बातों पर बहू को प्रताड़ित करती थी।

महिला पर अपराध करना है गंभीर मामला 

domestic violence

सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि जब एक महिला द्वारा किसी अन्य महिला, यानी बहू के साथ क्रूरता करके अपराध किया गया है, तो यह एक और गंभीर अपराध बन जाता है। अगर एक महिला, यानी सास दूसरी महिला की रक्षा नहीं करती है, तो दूसरी महिला, यानी बहू असुरक्षित हो जाएगी।  यह बात सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एमआर शाह और बीवी नागरत्ना की बेंच ने सजा सुनाते समय कही। (हमारे देश में इतना आसान क्यों है महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार)

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धारा 498ए और धारा 306 के तहत मामला था दर्ज 

पीड़िता बहू की मां ने साल 2006 में उसकी मृत्यु के बाद ही अपनी बेटी के पति, सास-ससुर के खिलाफ दंड संहिता की धारा 498ए और धारा 306 के तहत मामला दर्ज कराया था। उसकी मां ने बताया कि पीड़िता अपने ससुराल में रह रही थी क्योंकि उसका पति सऊदी अरब में काम करता था। उस समय सास-ससुर ने निचली अदालत के उस आदेश को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय का रुख किया था जिसमें उन्हें 1 साल कैद की सजा सुनाई गई थी। हालांकि, उच्च न्यायालय ने उसकी अपील को खारिज कर दिया और निचली अदालत के फैसले की पुष्टि की। बाद में, उसने उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देते हुए शीर्ष अदालत का रुख किया। लेकिन दूसरी और मीरा के वकील का कहना था कि पीड़िता नहीं चाहती थी कि उसका पति विदेश जाए लेकिन उसके ऐसा करने के कारण और आत्महत्या का कदम उठाया। सास मीरा की ओर से पेश हुए वकील ने उनकी अधिक उम्र और इस तथ्य पर विचार करते हुए कि उच्च न्यायालय ने उन्हें धारा 306 के तहत आरोप से पहले ही बरी कर दिया था क्योंकि उनके वकील ने एक उदार दृष्टिकोण के लिए अदालत से गुहार लगाई थी। 

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सुप्रीम कोर्ट ने सुनाई सजा 

supreme court decision on old lady

सुप्रीम कोर्ट ने 11 जनवरी इस पूरे मामले पर अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि एक महिला का किसी अन्य महिला के साथ क्रूरता करना अधिक गंभीर अपराध बन जाता है, क्योंकि उसने आईपीसी की धारा 498 ए के तहत मृतक की 80 वर्षीय सास की सजा को बरकरार रखा है और उसे तीन महीने के कारावास की सजा सुनाई है। बुजुर्ग महिला को दोषी ठहराते हुए, पीठ ने कहा कि धारा 498 ए आईपीसी के तहत अपराध के लिए एक साल के कारावास के बजाय, अपीलकर्ता मीरा को तीन महीने के कारावास और ट्रायल कोर्ट द्वारा लगाए गए डिफ़ॉल्ट सजा के साथ जुर्माना लगाने का निर्देश दिया जाता है। पीठ ने 80 वर्षीय महिला के जमानत बांड को भी रद्द कर दिया और उसे चार सप्ताह की अवधि के भीतर उपयुक्त अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करने को कहा।सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा 'जिस समय घटना हुई, उस समय अपीलकर्ता की उम्र लगभग 60-65 वर्ष के बीच थी। घटना वर्ष 2006 की है। इसलिए, केवल इसलिए कि मुकदमे को समाप्त करने या उच्च न्यायालय द्वारा अपील का निर्णय करने में एक लंबा समय बीत चुका है, सजा न लगाने या पहले से ही दी गई सजा को लागू करने का कोई आधार नहीं है। 

वास्तव में ये मामला बेहद पेंचीदा था और ये इस बात को दिखाता है कि हमारे देश की महिलाएं किसी भी रिश्ते में सुरक्षित नहीं हैं। लेकिन सजा के तौर पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला सराहनीय है। 

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Image Credit: freepik and shutterstock