दिवाली के लगभग 15 दिन के बाद यानी कि कार्तिक पूर्णिमा तिथि को पूरे देश में देव दिवाली मनाई जाती है। हिंदी पंचांग के अनुसार काशी में काफी उत्साह और उमंग के साथ यह पर्व मनाया जाता है और पूरे काशी शहर को दीपों से सजाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन न सिर्फ मनुष्यों बल्कि देवताओं की भी दिवाली होती है जिसका जश्न देवता भी मनाते हैं और हर साल देव दिवाली का उत्सव कार्तिक महीने की एकादशी तिथि से ही आरंभ हो जाता है और इस दिन दीप दान करने का विधान है। इस दिन लोग घर में दीपक जलाते हैं और साथ ही नदी और तालाबों में भी दीप जलाकर प्रवाहित करते हैं। 

इस साल देव दिवाली 19 नवंबर को पड़ेगी क्योंकि इसी दिन कार्तिक पूर्णिमा है। वैसे तो पूरा कार्तिक महीना पूजा पाठ के लिए अच्छा माना जाता है और इस पूरे महीने में दीपदान कराना शुभ माना जाता है लेकिन मुख्य रूप से देव दिवाली के दिन दीप दान की प्रथा वर्षों से चली आ रही है। कहा जाता है इस दिन जो भी दीपदान करता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। लेकिन क्या आप जानती हैं कि क्यों मनाई जाती है देव दिवाली और इसका इतिहास और कहानी क्या है? आइए इस लेख में अयोध्या के पंडित राधे शरण शास्त्री जी से जानें कि देव दिवाली क्यों मनाई जाती है और इसका इतिहास क्या है। 

देव दिवाली में देवता धरती पर उतरते हैं 

dev diwali in india

देव दिवाली के लिए एक प्राचीन मान्यता है कि इस दिन देवता काशी की पवित्र भूमि पर उतरते हैं और एक साथ दिवाली मनाते हैं। इसीलिए मुख्य रूप से देव दिवाली काशी में गंगा नदी के तट पर मनाई जाती है। इस दिन काशी नगरी में एक अलग ही उल्लास देखने को मिलता है और चारों ओर रोशनी और दीयों की धूम होती है। पूरी काशी नगरी में प्रकाश और दीपक से चारों और और सभी घाटों को रोशन किया जाता है और भक्त जन इसका आनंद लेते हैं। मुख्य रूप से देव दिवाली में गंगा आरतीका एक अलग ही नज़ारा देखने को मिलता है जो दूर-दूर के पर्यटकों को अपनी ओर खींचता है। 

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देव दिवाली का इतिहास 

दरअसल देव दिवाली मनाने के पीछे एक धार्मिक कथा प्रचलित है। इस कथा के अनुसार एक बार त्रिपुरासुर नाम के राक्षस ने अपने आतंक से मनुष्यों सहित देवी-देवताओं और ऋषि मुनियों सभी को परेशान कर दिया था। उसके आतंक से हर कोई त्राहि-त्राहि कर रहा था। उस समय सभी देव गणों ने भगवान शिव से उस राक्षस का अंत करने का निवेदन किया। जिसके बाद भगवान शिव ने त्रिपुरासुर राक्षस का वध कर दिया। इसी खुशी में सभी देवता अत्यंत प्रसन्न हुए और शिव जी का आभार व्यक्त करने उनकी नगरी काशी पधारे। उस समय देवताओं ने काशी में अनेकों दीए जलाकर खुशियां मनाई। इस दिन सौभाग्य से कार्तिक महीने की पूर्णिमा तिथि थी इसीलिए हर साल कार्तिक पूर्णिमा को देव दिवाली मनाने के चलन है। 

देव दिवाली में दीपदान का महत्व 

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देव दिवाली के दिन घरों में विशेष पूजा और व्रत के साथ दीपदान का भी विशेष महत्व होता है। इस दिन गंगा स्नान के बाद भक्त जन रात में दीपदान करते हैं और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करते हैं ,ऐसा माना जाता है कि इस दिन नदी या पोखर में दीपदान करने से मनुष्य को पुण्य का लाभ मिलता है। इसी दिन भगवान शिव ने तारकाक्ष, कमलाक्ष व विद्युन्माली के त्रिपुरों का नाश किया था। इसलिए भगवान शिव को त्रिपुरारी भी कहा जाता है और इस दिन भगवान विष्णु का मत्स्यावतार भी हुआ था इसलिए इस दिन का महत्व और ज्यादा बढ़ जाता है। 

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इस प्रकार देव दिवाली के दिन दीप दान और पवित्र स्नान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। जिससे मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। अगर आपको यह लेख अच्छा लगा हो तो इसे शेयर जरूर करें व इसी तरह के अन्य लेख पढ़ने के लिए जुड़ी रहें आपकी अपनी वेबसाइट हरजिन्दगी के साथ।

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