2019 उपलब्धियों के मामले में काफी अच्छा रहा। वैसे तो ये साल चला गया है, लेकिन इस साल जिन महिलाओं ने कई सारी उपलब्धियां हासिल की हैं वो अभी तक हमारे साथ ही हैं। ये महिलाएं हमारे लिए प्रेरणा का स्त्रोत बनकर आई हैं। आज हम ऐसी ही महिलाओं की कहानी के बारे में बात करते हैं जिनकी उपलब्धियां साल खत्म होने के साथ खत्म नहीं हुईं बल्कि इन्होंने तो आजीवन लोगों को प्रेरित करने के बारे में सोचा। इन महिलाओं के जज्बे को दुनिया कर रही है सलाम। इनमें Miss World Deaf विदिशा बालियान, बच्चों में बोन कैंसर की रोकथाम करने वाली डॉ. स्वाति श्रीवास्तव, सुपरबाइकर सुपर्णा सरकार और कश्मीर की पहली महिला फुटबॉल कोच नादिया निगहट शामिल हैं। इन महिलाओं ने अपनी लाइफ में कई तरह के चैलेंजेस का सामना किया, लेकिन हार नहीं मानी। बिना रुके, बिना थके ये अपने सफर पर आगे बढ़ती रहीं। इन महिलाओं ने साबित कर दिया कि अगर महिलाएं ठान लें तो लाख मुश्किलें आने के बावजूद वे अपनी मंजिल पाने में कामयाब हो सकती हैं। 

1. विदिशा बाल्यान- 

बचपन में ही जिसे पार्शियल हियरिंग इम्पेयरमेंट - यानि एक कान से न सुनाई देने की मुश्किल थी, उस इक्कीस साल की लड़की ने देश का नाम रौशन किया- विदिशा बाल्यान बनी भारत की पहेली Miss Deaf वर्ल्ड। स्पोर्ट्स बैकग्राउंड की होते हुए भी उन्हें हील्स में चलने की आदत डालनी थी। उन्हें मेकअप करने से लेकर कैसे खुद को स्टेज पर प्रेजेंट करना है इस सब के लिए स्ट्रगल करना था। विदिशा ने कॉम्पटीशन के टैलेंट राउंड में तांडव किया था जहां उनके पास तैयार होने के लिए पूरा समय भी नहीं था। खुद की ग्रूमिंग और सारी चीज़ों को पीछे छोड़ते हुए विदिशा भारत की पहली मिस डेफ वर्ल्ड बनीं।  

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2. डॉक्टर स्वाति श्रीवास्तव- 

कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी का क्योर ढूंढ निकालना आसान बात नहीं। वो भी एक शादीशुदा महिला के लिए जिसकी नई-नई शादी हुई हो। इजराइल में 22 लोगों के ग्रुप ने इस सक्सेसफुल रिसर्च में मदद की। शादी के तुरंत बाद स्वाती को रिसर्च के लिए इजराइल जाने की जरूरत पड़ी और इस स्ट्रगल को उन्होंने समझा और उनकी फैमिली ने भी। Ewing Sarcoma कैंसर जो बच्चों में ज्यादा होता है उसके लिए इलाज ढूंढना आसान नहीं था, फिर भी स्वाती ने कड़ी मेहनत की। रीसर्च और साइंस की फील्ड में फैमिली के लिए समय नहीं मिलता फिर भी स्वाती ने अपनी पहचान बनाई और वो यंग गर्ल्स को यही सलाह देती हैं कि एक तय ढर्रे पर चलने की जरूरत नहीं। जो उन्हें ठीक लगता है वो करें। 

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3. रितु कौशिक-

एक हाउसवाइफ जिसने अपने परिवार के अलावा कुछ नहीं सोचा। 16 साल की उम्र में डॉक्टर बनने के सपने देखने वाली रितु ने शादी के बाद खेती भी की और कम ही उम्र में बच्चों की जिम्मेदारी भी उठाई। हर जिम्मेदारी पूरी करने के बाद भी रितु ने अपना ग्रैजुएशन कंप्लीट किया। फैमिली के सपोर्ट से उन्होंने 3 साल में ही 10 हज़ार रुपए की लागत से शुरू किया बिजनेस लाखों रुपए का हो गया है। रितु को पड़ोसियों ने भी काफी कुछ कहा, तानों और डिमोटिवेशन के बाद भी वो आगे बढ़ीं और अपना बिजनेस बनाया।  

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4. सुपर्णा सरकार- 

हमारी ये सुपर स्त्री सुपर बाइकर भी हैं। मोटरसाइकल चलाने वाली ही नहीं मोटरसाइकल चलाना सिखाने वाली सुपर्णा ने इंजीनियरिंग के आखिरी साल में मोटरसाइकल चलाना सीखा। उन्होंने तो अपनी मोटरसाइकलों का नाम भी रखा हुआ है। माता-पिता को समाज की चिंता थी कि लड़की होकर बाइक चलाएगी तो समाज क्या कहेगा, लेकिन धीरे-धीरे सुपर्णा ने समाज के बंधनों को तोड़कर आगे की ओर रेस की। सुपर्णा ने कई सारी रैलियों में हिस्सा लिया है। सुपर्णा ने तो अपनी शादी भी बाइक पर ही की थी।  

5. नादिया निघत - 

ये कश्मीर की कली असल में कश्मीर की पहली महिला फुटबॉल कोच हैं। बचपन में बॉल के साथ खेलने को लेकर मां घर पर मार-मार कर वापस लाई थीं। पर पापा के साथ से वो नैशनल तक पहुंच गईं। वो 45 लड़कों के साथ एक अकेली लड़की होने के कारण उन्हें काफी परेशानी हुई। उन्हें लड़कों ने मना किया तो नाडिया ने अपने बाल काट लिए। कई लोगों ने उन्हें बोला कि उनके लिए ये करियर नहीं है, लेकिन नाडिया ने हार नहीं मानी और लड़कों के बीच खेलकर आगे बढ़ीं। कोच बनने पर उनसे भी बड़ी उम्र के बच्चे उनके पास ट्रेनिंग के लिए आते थे, कई टूर्नामेंट्स खेलने के बाद नाडिया के हौसले अब और बुलंद हैं।  

6. दीपा मलिक- 

सोसाइटी का प्रेशर कई बार लोगों की आस तोड़ देता है और अगर किसी स्पेशल एबिलिटी वाले इंसान को देखा जाए तो हर दिन के स्ट्रगल के बाद भी वो आगे बढ़ता है। ऐसी ही हैं हमारी सुपर स्त्री दीपा मलिक जो पैरालंपिक्स में मेडल जीतने वाली पहली महिला हैं और साथ ही साथ वो खेल रत्न अवॉर्डी भी हैं। 5-9 साल की उम्र में ट्यूमर से जंग लड़ने के बाद, अपनी बड़ी बेटी के साथ हादसे देखे और फिर दीपा को ट्यूमर वापस आ गए और वो पैरालाइज्ड हो गईं। दीपा ने फिर भी हिम्मत नहीं हारी। सोसाइटी ने दो बेटियों, की जिम्मेदारी, पति का दूर रहना और दीपा की डिसएबिलिटी को लेकर भी काफी कुछ कहा, लेकिन दीपा अब एक प्रेरणा हैं।  

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