वेज हो या नॉनवेज, जिस बिरयानी पर फिदा है पूरा भारत... आखिर कहां हुई थी इसकी शुरुआत?

हमारे यहां भारत में अगर लोगों की सबसे पसंदीदा डिश की बात हो, तो बिरयानी का नाम जरूर लिया जाता है। चाहे कोई पार्टी हो, घर में गेट-टू-गेदर हो या फिर शादी-ब्याह का मौका ही क्यों न हो, बिरयानी का स्वाद हर मौके को खास बना देता है। आज देश के लगभग हर शहर में आपको बिरयानी की अलग-अलग वैरायटी मिल जाएगी। कहीं हैदराबादी बिरयानी फेमस है, तो कहीं लखनवी, कोलकाता, मलाबार या अंबूर बिरयानी लोगों को खूब पसंद आती है।
लेकिन क्या आप जानती हैं कि जिस बिरयानी को भारत में इतना पसंद किया जाता है, उसकी शुरुआत भारत में नहीं हुई थी? ऐसा बताया जाता है कि इसका संबंध प्राचीन फारस (आज का ईरान) से है। हालांकि, भारत तक इसके पहुंचने को लेकर अलग-अलग कहानियां सुनने को मिलती हैं। आइए जानते हैं इस स्वादिष्ट डिश का दिलचस्प इतिहास और भारत में इसके सफर की कहानी।
आखिर बिरयानी शब्द कहां से आया?
इस डिश का नाम ऐसे ही बिरयानी नहीं पड़ गया। इसके पीछे भी एक दिलचस्प किस्सा बताया जाता है। कहते हैं कि बिरयानी शब्द फारसी भाषा के बिरियां (Birian) से निकलकर आया है, जिसका मतलब होता है पकाने से पहले भूनना या तलना। हालांकि, इसे फारसी के एक दूसरे शब्द बरिंज (Berinj) से भी जोड़ा जाता है, जिसका मतलब चावल है। दरअसल, पुराने समय में चावल को पहले घी में थोड़ा सा भुना जाता था। इसके बाद उसमें मांस, मसाले और दूसरी चीजें मिलाकर धीमी आंच पर पकाया जाता था। इसी वजह से इस पकवान को बिरयानी कहा जाने लगा।
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क्या बिरयानी भारत की डिश नहीं है?
आपको बता दें कि बिरयानी पहले फारसी खाने का हिस्सा थी। वहां पर चावल और मांस को साथ पकाकर कई तरह की डिशेज तैयार की जाती थीं। समय बीतता गया और यह डिश अलग-अलग देशों तक पहुंच गई और जगह के हिसाब से इसका स्वाद बदलता गया। जब यह भारत आई तो यहां पर भारतीय मसाले, खुशबूदार चावल और नया स्वाद जुड़ गया। यही वजह है कि आज भारतीय बिरयानी दुनिया भर में अलग पहचान रखती है।
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भारत कैसे पहुंची बिरयानी? जानिए 3 मशहूर कहानियां
बिरयानी भारत कैसे आई, इसे लेकर कई मान्यताएं हैं। हालांकि इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है।
1. तैमूर लंग के साथ आई बिरयानी
14वीं शताब्दी की बात है जब मिडिल एशिया के शासक तैमूर लंग अपने साथ बिरयानी जैसी डिश भारत लेकर आए थे। कहा जाता है कि उसकी सेना के लिए ऐसा खाना चाहिए था, जो जल्दी बन जाए और पेट भी भर दे। ऐसे में बड़े बर्तन में चावल, मांस और मसालों को एक साथ डालकर धीमी आंच पर पकाया जाता था। इससे सैनिकों को भरपूर भोजन मिल जाता था।
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2. मुमताज महल से जुड़ी है कहानी
एक और कहानी बताई जाती है जिसका मुगल बादशाह शाहजहां की बेगम मुमताज महल का कनेक्शन है। कहा जाता है कि एक बार उन्होंने सैनिकों का शिविर देखा। वहां कई सैनिक कमजोर नजर आए। उन्होंने शाही बावर्चियों से ऐसा भोजन बनाने को कहा जिसमें चावल, मांस, घी और मसाले एक साथ हों, ताकि सैनिकों को स्वाद के साथ एनर्जी भी मिले। इसके बाद जो डिश बनाई गई, वही आगे चलकर बिरयानी बन गई।
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3. अरब व्यापारियों के जरिए दक्षिण भारत पहुंची बिरयानी
यह भी बताया जाता है कि बिरयानी उत्तर भारत से पहले दक्षिण भारत पहुंच चुकी थी। अरब व्यापारी समुद्र के रास्ते से केरल के मलाबार तट पर आते थे। वही अपने साथ चावल और मांस से बनने वाले कई डिशेज भी लाए। बाद में यहां के मसालों के साथ इन व्यंजनों का स्वाद बदला और धीरे-धीरे यह पूरे भारत में फैल गया।
भारत आकर बदल गया बिरयानी का स्वाद
- भारत पहुंचने के बाद बिरयानी ने हर इलाके का स्वाद अपना लिया। अवध (लखनऊ) में इसमें केवड़ा, गुलाब जल और कुछ मसालों का इस्तेमाल होने लगा।
- हैदराबाद में स्थानीय मसालों और दम पकाने की खास तकनीक ने बिरयानी को तीखा और ज्यादा मसालेदार बना दिया गया। आज हैदराबादी बिरयानी दुनिया भर में मशहूर है।
- कोलकाता बिरयानी की सबसे बड़ी पहचान उसका आलू है। माना जाता है कि जब अवध के आखिरी नवाब वाजिद अली शाह को कोलकाता भेजा गया था, तब पैसों के कारण बिरयानी में मांस की मात्रा कम करके आलू डाला जाने लगा। धीरे-धीरे लोगों को इसका स्वाद इतना पसंद आया कि आलू कोलकाता बिरयानी की पहचान बन गया।
भारत में मिलने वाली मशहूर बिरयानी
आज भारत में कई तरह की बिरयानी मिलती हैं, जैसे-
- हैदराबादी बिरयानी
- लखनवी (अवधी) बिरयानी
- कोलकाता बिरयानी
- मलाबार बिरयानी
- अंबूर बिरयानी
- डिंडीगुल बिरयानी
- थालास्सेरी बिरयानी
- सिंधी बिरयानी
हर बिरयानी का मसाला, चावल, पकाने का तरीका और स्वाद अलग होता है।
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अब तो आप भी अपनी पसंदीदा बिरयानी का इतिहास जान ही गई होंगी। साथ ही अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।
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