हमारे देश में मंदिरों को बहुत अहमियत की जाती है, जिनमें में कुछ मंदिर ऐसे हैं जिनका ऐतिहासिक और धार्मिक महत्‍व बहुत ज्‍यादा है। कुछ मंदिरों में तो लोगों की इतनी आस्‍था है कि वह दिल खोलकर इन मंदिरों को दान देते हैं। वहीं, दूर-दूर से लोग इन मंदिरों को देखने के लिए आते हैं। अपनी मान्‍यताओं की वजह से इन मंदिरों में देशी-विदेशी के प्रयर्टकों का तांता लगा रहता है। तो चलिए आज हम आपको ऐसे ही एक मंदिर के बारे में बताते हैं, जिसकी दंतकथा से लेकर खजाने तक की कहानी बेहद रोचक है।

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हम पद्मनाभस्वामी मंदिर की बात कर रहे हैं जो केरल के तिरुवनंतपुरम में स्थित है। यह भगवान विष्णु के मंदिर प्रमुख वैष्णव मंदिरों में शामिल है। इस मंदिर में हर रोज लोगों की भारी भीड़ लगती है। फिलहाल इस मंदिर का संचालन सुप्रीम कोर्ट की ओर से की गई विशेष व्यवस्था के तहत किया जा रहा है।

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देश का इस सबसे अमीर मंदिर में तकरीबन पूरे साल पुनर्निर्माण का कार्य चलता रहता है। अगर इसकी कुल संपत्ति का आंकलन किया जाए तो इसकी कुल संपत्ति करीब 97,500 करोड़ रुपए है, जिसमें खजाने से मिले गहनें भी शामिल है पर संपत्ति को लेकर अभी भी पूरी तरह से कोई पुष्टि नहीं है।

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यहां भगवान के दर्शन करने के लिए कुछ नियमों का मानना पड़ता है, जैसे कि मंदिर में सिर्फ धोती और अंगवस्त्र पहनकर ही जाया जा सकता है। आपको बता दें कि इस मंदिर में दर्शन के लिए सिर्फ हिन्दू श्रद्धालुओं को ही अनुमति है।

मंदिर का बेहद रोचक इतिहास

ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण दसवीं शताब्दी में किया गया था, लेकिन कहीं-कहीं इस मंदिर (विदेश में भी स्थित प्रसिद्ध मंदिरों के बारे जानें) के सोलहवीं शताब्दी में होने का भी जिक्र मिलता है। इस मंदिर के निर्माण में द्रविड़ और केरल शैली का मिला-जुला रूप देखने को मिलता है। 1750 में त्रावणकोर का एक योद्धा मार्तण्ड वर्मा था, जिसने मंदिर के आसपास के इलाकों को जीतकर यहां अपनी धन-संपत्ति बढ़ाई थी। माना जाता है कि मार्तण्ड ने राज्‍य के शासन को दैवीय स्वीकृति दिलाने के उद्देश्‍य से अपने राज्य को भगवान को समर्पित कर दिया था और भगवान को ही राज्‍य का राजा घोषित कर दिया था। कहा यह जाता है कि मार्तण्ड ने पुर्तगाली खजाने पर भी कब्जा कर लिया था और साथ ही, उसने यूरोपीय लोगों के व्‍यापार पर अपना पूरा अधिकार जमा लिया था। राज्य को इस व्यवसाय से काफी फायदा होता था और उससे आने वाली पूंजी को इसी मंदिर में रख दिया जाता था।

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मंदिर का पौराणिक महत्व

मंदिर में भगवान विष्णु की एक मूर्ति है जो शालिग्राम पत्थर से बनी हुई है। मंदिर (माता लक्ष्मी के प्रसिद्ध मंदिरों के बारें में जानें) की वेबसाइट के अनुसार किसी भी विश्वसनीय ऐतिहासिक दस्तावेज के जरिए यह बताना बहुत मुश्किल है कि मूल प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा कब हुई। पुराणों में भी इस मंदिर का उल्लेख मिलता है। श्रीमद भागवत् के अनुसार इस मंदिर में बलराम आए थे और उन्होंने पद्मातीर्थम में स्नान किया था और यहां कई तरह की भेंट चढ़़ा़ईं थी। वहीं, ट्रावनकोर के दिवंगत इतिहासविद् डाक्‍टर एल ए रवि वर्मा के मुताबिक इस मंदिर की स्थापना करीब पांच हजार वर्ष पूर्व यानि कलयुग के पहले दिन हुई थी।

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मंदिर से जुड़ी दंतकथा

मंदिर को लेकर जो दंतकथा प्रचलित है उसके हिसाब से इस मंदिर में मूर्ति को कलयुग के नौ सौ पचासवें वर्ष में तुलु ब्राह्मण साधु दिवाकर मुनि ने स्थापित किया था। वहीं, ऐसा माना जाता है राजा कोठा मर्थान्दन ने 960वें वर्ष में अभिश्रवण मंडप का निर्माण कराया था।

तहखानों का राज

इस मंदिर में सात तहखाने हैं, जिसमें से छह तहखाने सुप्रीम कोर्ट की निगरानी खोले गए थे, जिसमें 1 लाख करोड़ रुपये के हीरे और जूलरी निकली थी। इसके बाद जैसे ही टीम ने 7वें दरवाजे के खोलने की शुरुआत की, तो दरवाजे पर बने कोबरा सांप के फोटो को देखकर इसका काम रोक दिया गया। कई लोगों की मान्यता थी कि इस दरवाजे को खोलना बहुत अशुभ होगा। इस दरवाजे को सिर्फ कुछ मंत्रों के उच्चारण से ही खोला जा सकता है। इस मंदिर को किसी और तरीके से खोला गया तो मंदिर नष्ट हो सकता है और भारी प्रलय तक आ सकता है। दरअसल, यह दरवाजा स्टील का बना है, जिसपर दो सांप बने हुए हैं, जो इस द्वार की रक्षा करते हैं, आपको बता दें कि इसमें कोई नट-बोल्ट या कब्जा नहीं हैं। इस मंदिर में मिले खजाने में सोने-चांदी के महंगे चेन, हीरा, पन्ना, रूबी, दूसरे कीमती पत्थर, सोने की मूर्तियां जैसी कई बेशकीमती चीजें हैं, जिनकी असली कीमत आंकना बेहद मुश्किल है।

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मंदिर पर कभी नहीं हुआ कब्जा

इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि इसपर कभी कोई विदेशी हमला नहीं हुआ। माना यह जाता है कि टीपू सुल्तान ने 1790 में मंदिर पर कब्जे की कोशिश की थी, लेकिन उन्हें भी कोच्चि में हार का सामना करना पड़ा था और वापस लौटना पड़ा था। टीपू से पहले भी इस मंदिर पर कई शासकों ने हमले और कब्जे की कोशिशें की गई थीं, लेकिन कोई भी सफल नहीं हो पाया था। उस समय भी इस मंदिर के खजाने और वैभव की कहानियां दूर-दूर तक फैली हुई थीं। अगर आपको ये जानकारी अच्छी लगी तो जुड़ी रहिए हमारे साथ। इस तरह की और जानकारी पाने के लिए पढ़ती रहिए हरजिंदगी।

Photo courtesy- (amritsarworld.com,i.ytimg.com,static.toiimg.com,images.financialexpress.com,1.bp.blogspot.com,holidify.com)