कभी अवध और कश्मीर के महलों में महकती थी 'शब देग', जानिए क्यों लुप्त हो रहा है यह सदियों पुराना स्वाद

Shahi Deg Traditional Recipe: शाही खानपान में शब देग एक ऐसा भूला-बिसरा नाम है, जिसकी खुशबू कभी अवध और कश्मीर के शाही महलों की रसोई से लेकर नवाबों और राजाओं के दस्तरखान तक विशेष रूप से महकती थी। फारसी भाषा में 'शब' का अर्थ रात और 'देग' का अर्थ तांबे या भारी तले का बड़ा बर्तन होता है। इस पारंपरिक व्यंजन का इतिहास मुगलों के समय से जुड़ा हुआ है, जिसे सर्दियों के मौसम में बेहद खास और धीमी आंच की पारंपरिक कला के साथ तैयार किया जाता था। यह न केवल एक व्यंजन था, बल्कि शाही मेहमान नवाजियों और दावतों की शान हुआ करता था।
शब देग बनाने की पारंपरिक प्रक्रिया
शब देग को बनाने में दो-तीन नहीं बल्कि पूरी रात का समय लगता है। इस शाही डिश को मुख्य रूप से मटन या बकरे के गोश्त, शलजम और मटन के कोफ्तों के साथ पकाया जाता था।

इसमें केसर, बादाम का पेस्ट, दही, क्रीम, सौंफ और कई तरह के खड़े मसालों का भरपूर इस्तेमाल किया जाता था। सभी सामग्रियों को भारी तले की तांबे की देग में डालकर ढक्कन को आटे से सील कर दिया जाता था ताकि भाप बाहर न निकले।
इसे भी पढ़ें- क्या आपने कभी चखा है 'भुट्टे का दुलमा'? जानें UP के गायब हो चुके दुर्लभ स्वाद की कहानी
शब देग तैयार करने में लगता है रातभर का समय
शब देग को रात भर यानी लगभग 6 से 8 घंटे तक धीमी आंच या अंगारे पर पकने के लिए छोड़ दिया जाता था। रात भर पकने के कारण गोश्त और शलजम में मसालों का स्वाद पूरी तरह से रच-बस जाता था और इसका टेक्सचर बेहद मक्खन जैसा मुलायम हो जाता था।
शब देग का स्वाद लुप्त होने के पीछे का कारण?
आज के आधुनिक दौर में शब देग जैसी पारंपरिक और शाही डिश का लुप्त होती जा रही हैं। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण इसे बनाने में लगने वाला अत्यधिक समय और लंबी मेहनत है। आज की तेज-तर्रार जीवनशैली में जहां लोग झटपट बनने वाले खानपान को प्राथमिकता देते हैं।

वहां रात भर धीमी आंच पर पकने वाले इस पकवान के लिए न तो समय बचा है और न ही वैसे पारंपरिक रसोइया। इसके अलावा, इसमें इस्तेमाल होने वाली महंगी सामग्रियां और जटिल विधियां भी नई पीढ़ी के खानसामों (रसोइयों) से दूर होती जा रही हैं। आधुनिक रेस्टोरेंट और फूड कल्चर के आने से यह शाही स्वाद धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह गया है।
इसे भी पढ़ें- नए जमाने में खोया बाजरा फरा, जानिए यूपी की इस रेसिपी की कहानी; जो स्वाद और सेहत दोनों में थी नंबर-1
पारंपरिक व्यंजनों की लिस्ट से गुम होती डिशेज के बारे में जानने और पढ़ने के लिए गुमनाम जायका सीरीज जरूर पढ़ें। इसके तहत हम उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों की गुमनाम होते व्यंजन के बारे में बताते हैं। अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।
Image Credit- wikioedia, ai (main image)
- 'शब देग' असल में क्या है?
- 'शब देग' अवध और कश्मीर के शाही घरानों का एक पारंपरिक व्यंजन है, जिसमें मटन (या कोफ्ते) और शलजम (Turnip) को धीमी आंच पर पकाया जाता है।
- 'शब देग' को पारंपरिक रूप से इसे किस मौसम में और कब खाया जाता था?
- 'शब देग' को मुख्य रूप से कड़ाके की सर्दियों में बनाया जाता था और सुबह के नाश्ते में बाकरखानी या खमीरी रोटी के साथ परोसा जाता था।
- क्या शब देग को आज के प्रेशर कुकर या गैस पर वैसा ही बनाया जा सकता है?
- नहीं, कुकर में झटपट पकाने से देग की धीमी आंच वाला प्रामाणिक स्वाद, सुगंध और मटन का मखमली टेक्सचर नहीं मिल पाता।
हमारा उद्देश्य अपने आर्टिकल्स और सोशल मीडिया हैंडल्स के माध्यम से सही, सुरक्षित और विशेषज्ञ द्वारा वेरिफाइड जानकारी प्रदान करना है। यहां बताए गए उपाय, सलाह और बातें केवल सामान्य जानकारी के लिए हैं। किसी भी तरह के हेल्थ, ब्यूटी, लाइफ हैक्स या ज्योतिष से जुड़े सुझावों को आजमाने से पहले कृपया अपने विशेषज्ञ से परामर्श लें। किसी प्रतिक्रिया या शिकायत के लिए, compliant_gro@jagrannewmedia.com पर हमसे संपर्क करें।