इसी महीने की 7 तारीख को नौ दुर्गा हमारे घर पधारेंगी। 9 दिनों तक उनका स्वागत, पूजा-अर्चना और कार्यक्रमों में लोग व्यस्त होंगे। कुछ लोग ऐसे मौके पर माता के दर्शन के लिए माता के मंदिर भी जाते हैं। आज हम आपको ऐसे 4 आदि शक्तिपीठ के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां आप दर्शन के लिए जा सकते हैं। भारत में देवी के पूरे 51 शक्तिपीठ हैं।

कहा जाता है कि जब सती के पिता ने सती और भगवान शिव को यज्ञ में नहीं बुलाया था, तो देवी सती रूठ गई थीं और अपने पति भगवान शिव के अपमान को सह नहीं पाई। इसी क्रोध में उन्होंने यज्ञ में आहुति दी। जब यह बात भगवान शिव को पता चली, तो वह सती से दूर होने के गम में टूट गए। वह सती के शरीर को छोड़ने के लिए राजी ही नहीं हुए। इस दुख से उन्हें निकालने के लिए भगवान विष्णु ने अपने चक्र से देवी सती के शरीर के भाग कर दिए। देवी सती के शरीर के अंग जहां-जहां गिरे, वहां एक शक्तिपीठ बन गया। उन्हीं में चार आदि शक्तिपीठ के बारे में हम आपको बताएंगे।

बिमला शक्तिपीठ, पुरी

विमला मंदिर या बिमला मंदिर भारतीय राज्य ओडिशा में पुरी में जगन्नाथ मंदिर परिसर के भीतर स्थित देवी विमला को समर्पित एक हिंदू मंदिर है। हालांकि मंदिर परिसर में एक छोटा मंदिर, बिमला मंदिर देवी-उन्मुख शाक्त और तांत्रिक उपासकों के लिए महत्वपूर्ण है, जो इसे मुख्य जगन्नाथ मंदिर से भी अधिक मानते हैं। विमला को जगन्नाथ की तांत्रिक पत्नी और मंदिर परिसर की संरक्षक माना जाता है। मुख्य मंदिर में जगन्नाथ की पूजा करने से पहले भक्त विमला को सम्मान देते हैं। जगन्नाथ को चढ़ाया जाने वाला भोजन 'महाप्रसाद' तब तक पवित्र नहीं होता, जब तक कि वह देवी विमला को भी नहीं चढ़ाया जाता।

देवी सती के पैर पर बना यह मंदिर

ऐसा माना जाता है कि यहां सती देवी के पैर/पाद खंड गिरे थे। मंदिर को सभी शक्तिपीठों में सबसे प्रमुख माना जाता है। भगवान जगन्नाथ को भैरव रूप में पूजा जाता है, जो वैष्णव और शैव मान्यताओं के समन्वय को दर्शाता है। देवी बिमला को शक्ति के शांतिपूर्ण रूप के रूप में पूजा जाता है। 

त्योहार

हिंदू महीने अश्विन (अक्टूबर) में दुर्गा पूजा का त्योहार विमला मंदिर में 16 दिनों तक मनाया जाता है, जिसका समापन विजयदशमी के साथ होता है।

कैसे पहुंचे बिमला मंदिर

ट्रेन से : दिल्ली, चेन्नई, मुंबई, हैदराबाद आदि शहरों से यहां आने के लिए नियमित और सीधी ट्रेन सेवाएं उपलब्ध हैं।

फ्लाइट से : हालांकि पुरी में हवाई अड्डा नहीं है, लेकिन भुवनेश्वर हवाई अड्डा, जो पुरी से 53 किलोमीटर दूर है, शहर को देश के अन्य शहरों से जोड़ने में मदद करता है। आप एयरपोर्ट से पुरी के लिए कैब ले सकते हैं।

बस से : स्थानीय परिवहन की बसों से लेकर कैब और टैक्सियों तक, पुरी तक पहुंचने के कई रास्ते हैं। यह अच्छी तरह से निर्मित सड़कों के माध्यम से पड़ोसी शहरों से जुड़ा हुआ है।

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तारा तारिणी शक्तिपीठ, ओडिशा

tara tarini temple

चार आदिशक्ति पीठ में उड़ीसा का तारा तारिणी मंदिर भी शामिल है। यह भारत के प्राचीन मंदिरों में से एक है, जो उड़ीसा के ब्रह्मपुर शहर के पास तारा तारिणी पहाड़ी पर स्थित है। यह मंदिर दो जुड़वां देवियों यानी तारा और तारिणी को समर्पित है और इस मंदिर की चारों दिशाओं में एक-एक शक्तिपीठ है। यह मंदिर रुशिकुल्या नदी के किनारे पहाड़ी पर स्थित है। ऐसा माना जाता है कि यहां देवी सती के स्तनों की पूजा की जाती है।

प्रचलित कथाएं

इस मंदिर को लेकर एक पौराणिक कथा प्रचलित है और यह एक विद्वान ब्राह्मण वासु प्रहरजा से जुड़ा है, जो देवी के भक्त थे। कुछ वर्षों तक तारा तारिणी वासु प्रहरजा के साथ रहती थीं, लेकिन एक दिन वह लापता हो जाती हैं। इस बात से परेशान ब्राह्मण प्रहरजा उन्हें काफी ढूढ़ते हैं, लेकिन वह कहीं नहीं मिलतीं, जिससे वह काफी निराश हुए थे। ऐसा माना जाता है कि दोनों बहनें तारा तारिणी पहाड़ी पर चढ़ गई थीं और वहां से गायब हो गईं। कुछ वक्त बाद एक रात दोनों बहनें प्रहरजा के सपने में आईं और उन्हें बताया कि वह आदिशक्ति का अवतार हैं। जिसके बाद वहां मंदिर स्थापित किया गया और लोग उनकी पूजा करने लगे।

त्योहार

चैत्र महीने में हर मंगलवार को यहां भव्य मेला आयोजित किया जाता है। स्थानीय लोगों का मानना है कि इस महीने में हर मंगलवार को देवी के दर्शन करने से भक्तों की मनोकामना पूर्ण होती है।

कैसे पहुंचे तारा तारिणी मंदिर?

ट्रेन से : यहां ट्रेन से आना आसान है। बेरहमपुर यहां स्थिप निकटतम रेलवे स्टेशन है। जहां आप दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद जैसे शहरों से आ सकते हैं।

फ्लाइट से : यहां पंहुचने के लिए निकटतम एयरपोर्ट भुवनेश्वर है। आप भुवनेश्वर से यहां जाने के लिए लोकल टैक्सी या कैब आदि ले सकते हैं।

बस से : सड़क परिवहन मंदिर बेरहामपुर से बस सेवा द्वारा अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। भुवनेश्वर से बेरहामपुर बस से हुमा जंक्शन पर उतरें और वहां से मंदिर के लिए एक ऑटो किराए पर लिया जा सकता है।

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कामाख्या शक्तिपीठ, असम

kamakhya devi temple

51 शक्तिपीठों में से एक कामाख्या शक्तिपीठ बहुत ही प्रसिद्ध मंदिर है। यह चमत्कारी भी है और इसे अघोरियों का गढ़ माना जाता है। इस मंदिर को सभी मंदिरों का माहपीठ माना जाता है। यह असम स्थित दिसपुर से लगभग 7 किलोमीटर दूर नीलांचल पर्वत से भी 10 किलोमीटर दूर है। ऐसा माना जाता है कि यहां देवी सती की योनी गिरी थी। वहीं दूसरी ओर शक्ति की प्रतीक मां कामाख्या देवी को रजस्वला होने के दौरान पवित्र मानकर पूजा जाता है। 

पौराणिक कथा

पौराणिक सत्य है कि अम्बूवाची पर्व के दौरान मां भगवती रजस्वला होती हैं और मां भगवती की गर्भ गृह स्थित महामुद्रा से तीन दिनों तक जल-प्रवाह के स्थान से रक्त प्रवाहित होता है। यह अपने आप में, इस कलयुग में एक अद्भुत आश्चर्य-सा प्रतीत होता है।

त्योहार

हर साल यहां अम्बुबाची मेला भी लगता है, जिसके दौरान यहां स्थित ब्रह्मपुत्र का पानी तीन दिनों के लिए लाल हो जाता है। इन तीन दिनों तक देवी के द्वार बंद रहते हैं और द्वार खुलने पर भक्तों को लाल रंग का कपड़ा प्रसाद में दिया जाता है।

कैसे पहुंचे कामाख्या देवी मंदिर

ट्रेन से : यहां कामाख्या नाम से रेलवे स्टेशन है, लेकिन आपको गुवाहाटी रेलवे स्टेशन उतरना चाहिए, क्योंकि यह सभी प्रमुख भारतीय शहरों से जुड़ा हुआ है। यहां पर उतरने के बाद आपक कैब या टैक्सी में कामाख्या मंदिर के दर्शन के लिए जा सकते हैं।

फ्लाइट से : कामाख्या जाने के लिए सबसे नजदीक एयरपोर्ट गुवाहाटी इंटरनेशनल एयरपोर्ट है। यहां से मंदिर 20 किलोमीटर दूर है।

बस से : आप आसानी से यहां बस के द्वारा भी पहुंच सकते हैं। रेलवे स्टेशन से उतर कर भी आप ऑटो रिक्शा या शेयर्ड कैब ले सकते हैं। 

दखिना कालिका शक्तिपीठ, कोलकाता

kalikaghat mandir kolkata

पश्चिम बंगाल के कोलकाता में कालीघाट एक शक्तिपीठ है। मान्यता के अनुसार मां सती के दाएं पैर की कुछ अंगुलियां इसी जगह गिरी थीं। आज यह जगह काली भक्तों के लिए सबसे बड़ा मंदिर है। काली घाट का ये काली मंदिर भी एक शक्तिपीठ माना जाता है, जहां सती के दाएं पांव की 4 अंगुलियां (अंगूठा छोड़कर) गिरी थीं। यहां की शक्ति 'कालिका' व भैरव 'नकुलेश' हैं। इस पीठ में काली की भव्य प्रतिमा मौजूद है, जिनकी लंबी लाल जिह्वा मुख से बाहर निकली है। मंदिर में त्रिनयना माता रक्तांबरा, मुण्डमालिनी, मुक्तकेशी भी विराजमान हैं। इसके पास ही में नकुलेश का भी मंदिर है।

इतिहास

माना जाता है कि कालीघाट मंदिर चंद्रगुप्त द्वितीय के समय से अस्तित्व में है। मूल मंदिर एक छोटी झोपड़ी के आकार का ढांचा था, जिसे राजा मानसिंह ने 16वीं शताब्दी में बनवाया था। वर्तमान संरचना 1809 में सबरन रॉय चौधरी के मार्गदर्शन में पूरी हुई। मंदिर के मुख्य मंदिर में देवी काली की एक अनूठी प्रतिमा है।

अष्टमी में होती है विशेष पूजा

मंदिर में कुंडूपुकर नाम का पवित्र तालाब है जो मंदिर परिसर के दक्षिण पूर्व कोने में स्थित है। ऐसा माना जाता है कि पानी में स्नान मात्र से हर मन्नत पूरा करने की शक्ति होती है। मंगलवार और शानिवार के साथ अष्टमी को यहां विशेष पूजा की जाती है। मंदिर में विशेष रूप से काली पूजा, पोइला बोइशाख, दुर्गा पूजा और बंगाली नव वर्ष दिवस जैसे शुभ अवसरों पर बड़ी संख्या में भक्त आते हैं।

कैसे पहुंचे कालिकाघाट मंदिर

ट्रेन से : हावड़ा और सियालदह रेलवे स्टेशन शहर में स्थित दो प्रमुख रेलवे स्टेशन हैं। ये दोनों रेलवे स्टेशन देश के सभी महत्वपूर्ण शहरों से अच्छी तरह से जुड़े हुए हैं। यहां पहुंचने पर आप मेट्रो स्टेशन या कैब के द्वारा मंदिर दर्शन के लिए जा सकते हैं।

फ्लाइट से : दमदम में स्थित सुभाष चंद्र बोस अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के रूप में जाना जाने वाला कोलकाता अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा शहर को देश के साथ-साथ दुनिया के सभी प्रमुख शहरों से जोड़ता है। 

बस से : आप कुछ प्रमुख शहरों से निजी बसों के द्वारा भी यहां पहुंच सकते हैं।

अब आप भी माता के दर्शन के लिए कहीं जाना चाहें, तो इन मंदिरों के दर्शन कर सकते हैं। हमें उम्मीद है यह लेख आपको पसंद आएगा। इसे लाइक और शेयर करें और ट्रैवल से जुड़े ऐसे रोचक डेस्टिनेशन के लिए पढ़ते रहें हरजिंदगी।

Image Credit: wikipedia & rvatravels