खुशबूदार होते हैं मध्य प्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों के पारंपरिक मसाले, आप भी करें ट्राई

भारत विविधताओं का देश है और आपको यहां हर तरह की वैरायटी मिलेगी। इंसान से लेकर खाने की, रहन-सहन की, संस्कृति की। यहां बसे हर राज्य की अपनी एक अलग पहचान है, क्योंकि इन राज्यों को खास बनाते हैं यहां रहने वाले लोग, समुदाय और संस्कृति। इसलिए कई लोग अपने से कुछ अलग देखते हैं, तो उसके बारे में जानने के काफी उत्सुक रहते हैं जैसे- आदिवासी समुदाय।
यह एक ऐसा समुदाय है जिसका भारत के अलग-अलग हिस्सों में अपनी अलग ही पहचान है, सांस्कृतिक धरोहर और परंपराएं हैं। उनकी संस्कृति, रहन-सहन और खान-पान में भी अलग तरह की विशेषताएं हैं, जो उन्हें अन्य समुदायों से अलग बनाती हैं। यह तो आपको पता ही होगा कि आदिवासी मसाले अपने स्वाद और सुगंध के लिए जाने जाते हैं।
ये मसाले खाने में अलग ही स्वाद जोड़ने का काम करते हैं। इसलिए हमने सोचा तो क्यों न आज आपको इसी विषय के बारे में बताया जाए। आगे अगर आपसे आदिवासी क्षेत्रों के पारंपरिक मसाले के बारे में पूछे, तो आप बता पाए कि यह होते कौन-कौन से हैं।
बेल मसाला

मध्य प्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में भील, गोंड, कोल और परधान जनजातियां बेल के फल को सुखाकर और पीसकर एक खास मसाला बनाती हैं। इस मसाले का इस्तेमाल ड्रिंक्स और मिठाइयों में किया जाता है। यह बेल मसाला ड्रिंक्स और मिठाइयों को मीठा और खुशबूदार बना देता है और यह गर्मियों में ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है।
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2019 में बायोटेक के एक रिसर्च में बताया गया है कि बेल पाचन तंत्र और मधुमेह जैसी बीमारी से भी दूर रखने का काम करता है। इसलिए बेल मसाला सिर्फ स्वाद ही नहीं बढ़ाता बल्कि इसके कई स्वास्थ्य लाभ भी हैं, जो आदिवासियों की प्रकृति के साथ गहरे संबंध को भी दिखाते हैं।
कचनार की कलियों का मसाला
यह मसाला औषधीय पौधे से बनाया जाता है। इस पौधे का नाम है कचनार की कली। यही वजह है कि इस मसाले का इस्तेमाल भारतीय चिकित्सा पद्धतियों में भी किया जाता है। कचनार के पौधे की कलियां, जिसे हिंदी में कचनार की कली भी कहा जाता है, यह कई स्वास्थ्य लाभों से भरपूर होती हैं।
खास बात यह है कि इसे अचार में थोड़ा तीखा और कड़वा स्वाद लाने के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है। अगर आप चाहें तो इसका इस्तेमाल खाने का स्वाद बढ़ाने के लिए भी किया जा सकता है। वैसे कचनार कलियों का इस्तेमाल स्किन और पाचन संबंधी समस्याओं के लिए भी किया जा सकता है।
सौंफ और कलौंजी

सौंफ और कलौंजी भी आदिवासी मसालों की लिस्ट में शामिल है। इन मसालों का इस्तेमाल कई व्यंजनों को बनाने के लिए किया जाता है। खासकर नॉनवेज व्यंजनों को बनाने के लिए, सौंफ को पीसकर इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि, कलौंजी का इस्तेमाल तड़का बनाने के लिए किया जाता है।
इन मसालों से खाने को न सिर्फ अलग ही स्वाद मिलता है, बल्कि खुशबू भी आती है। ये मसाले पाचन और हृदय स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी होते हैं। इसके अलावा, ये मसाले आमतौर पर चाय, भोजन और स्नैक्स में मिलाए जाते हैं, जिससे खाने में अलग ही स्वाद आता है।
ताजे हर्ब्स और पत्ते

ताजे हर्ब्स और पत्ते केवल स्वाद को बढ़ाने का काम नहीं करते, बल्कि वे हमारे स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी होते हैं। इन हर्ब्स और पत्तों का इस्तेमाल न केवल भारतीय खाना पकाने में किया जाता है, बल्कि हेल्थ भी प्रदान करता है। फिर चाहे आप पुदीना, धनिया, तुलसी, या हरी मिर्च की बात करें, इन सभी का इस्तेमाल खाने में स्वाद और खुशबू को बढ़ाने के लिए किया जाता है।
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इसके अलावा, पुदीना की ताजगी, धनिया की खुशबू और तुलसी की औषधीय गुण हमें न केवल स्वाद देते हैं, बल्कि हमारे शरीर को भी स्वस्थ रखने में मदद करते हैं। ताजे हर्ब्स और पत्ते हमारे आहार में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जो न केवल खाने को अच्छा बनाते हैं, बल्कि आपके पोजिटीव भी फील करवाते हैं।
यह मसाले आप अपने किचन में शामिल कर सकते हैं। इन मसालों को इस्तेमाल करने के बाद अपना एक्सपीरियंस हमारे साथ जरूर साझा करें।
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