भगवान शिव जितने सरल हैं उतने ही रहस्‍यमयी भी हैं। उनका रहन-सहन, खान-पान, पहनावा और वेश-भूषा अन्‍य देवताओं से एकदम अलग है। हिंदू शास्‍त्रों में जहां हर देवता के वस्‍त्रों और आभूषणों का वर्णन मिलता है वहीं भगवान शिव केवल हिरण की खाल और भस्‍म को ही धारण करते हैं। इस बात का साक्षी है मध्‍यप्रदेश स्थित धार्मिक स्‍थन उज्‍जैन में बना भगवान शिव का महाकालेश्‍वर मंदिर। यहां भगवान शिव के कई स्‍वरूपों की पूजा की जाती है मगर यहां शिव जी के अघोरी रूप को सबसे ज्‍यादा महत्‍व दिया जाता है। जिस तरह साधू और संतों के शरीर में भस्‍म लिपटी रहती है उसी तरह यहां पर भगवान शिव के शिवलिंग पर चिता की ताजी भस्‍म से आरती की जाती है और इसी से उनका श्रृंगार भी होता है। चलिए जानते हैं कि इस आरती का रहस्य क्या है...

क्‍या है महत्‍व 

भगवान शिव की भस्‍म आरती केवल उज्‍जैन के महाकालेश्‍वर मंदिर में होती है। यह आरती बेहद अलग ढंग से की जाती है। इस आरती को प्रात: सुबह के वक्‍त 4 बजे किया जाता है। यह आरती चिता की ताजी राख से होती है। हालाकि कुछ कारणों से अब इस आरती को चिता की राख से नहीं किया जा रहा । मगर पहले इस आरती के लिए लोग अपने जीवनकाल में ही रजिस्‍ट्रेशन कराया करते थे। मृत्‍यु के बाद उनकी चिता की राख से भगवान शिव की पूजा की जाती थी। इस आरती को बंद कमरे में केवल मंदिर के पुजारी ही करते हैं। आरती के दौरान भगवान के कक्ष में लगे कैमरों में इस आरती की रिकॉडिंग होती रहती है और कक्ष के बाहर खड़े भक्‍त इस आरती को देखते रहते हैं। आरती के दौरान भगवान के शिवलिंग को पूरी तरह से भस्‍म से नहला दिया जाता है। बाद में शिवलिंग पर भगवान शिव का फेस बनाया जाता है और पट खुलते हैं। 

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क्‍यों की जाती है भस्‍म आरती 

शिवपुराण में बताया गया है कि जब सती ने स्‍वंय को अग्नि में समर्पित कर दिया था, तो उनकी मृत्‍यु का संदेश मिलते ही भगवान शिव क्रोधित हो गए थे और अपना मानसिक संतुलन खो बैठे थे। इसके बाद वह माता सती के मृत शरीर को लेकर इधर-उधर घूमने लगे। जब भगवान शिव को श्रीहरी ने देखा तो उन्‍हें संसार की चिंता सताने लगी। हल निकालने के लिए उन्‍होंने माता सती के शरीर को अपने सुदर्शन चक्र से कई हिस्‍सों में बांट दिया था। यह हिस्‍से देश के कई स्‍थानों पर गिरे और पिंड बन गए। मगर शिव जी के हाथों में केवल माता के शव की भस्‍म रह गई। भगवान शिव को लगा कि कहीं वह सती का हमेशा के लिए न खो दें इसलिए उन्‍होंने उनकी शव की राख को अपने शरीर पर लगा लिया। 

कब जाएं महाकालेश्‍वर 

वैसे तो पुरे वर्ष कभी भी आप महाकालेश्‍वर के दर्शन के लिए जा सकती हैं। मगर सावन और शिवरात्री पर इस स्‍थान पर विशेष आयोजन होता है। अगर आप सावन के महीने में महाकालेश्‍वर मंदिर के दर्शन करने जाएंगी तो यहां पर आपको देश के कोने-कोने से आए भक्‍तों की भीड़ देखने को मिलेगी। आपको उज्‍जैन आने के लिए ज्‍यादा दिक्‍कतों का सामना नहीं करना होगा। यह शहर इंदौर के सबसे करीब है। आप चाहें तो इंदौर से ट्रेन या टैक्‍सी से यहां आ सकती हैं। रुकने के लिए यहां पर बहुत सारे और अच्‍छे भक्‍ता निवास हैं, जहां बहुत ही कम पैसों में अच्‍छी व्‍यवस्‍था मिल जाती है। 

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यहां भी घूमें

उज्‍जैन एक धार्मिक स्‍थान है यहां पर आपको पग-पग पर मंदिर मिल जाएंगे मगर यहां काल भैरव, श्री बड़े गणपति जी का मंदिर, श्री हरसिद्धि देवी का मंदिर आदि भी यहां के प्रसिद्ध मंदिर हैं। यहां पर कालियादेह महल है। यह महल बेहद प्राचीन है। अब इस सूर्य मंदिर के नाम से लोग जानते हैं। यह महल मुहम्‍मद खिलजी ने 1458 में बनवाया था। मांडू के सुल्‍तान ने यहां पर 52 कुंडों का निर्माण करवाया था। यह कुंड आज भी देखे जा सकते हैं।