वट सावित्री व्रत हिंदू धर्म में सुहागिन महिलाओं द्वारा अपने पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और खुशहाल वैवाहिक जीवन के लिए रखा जाने वाला एक महत्वपूर्ण और सबसे ज्यादा कठिन व्रत है। वट सावित्री का व्रत ज्येष्ठ माह की अमास्या के दिन मनाया जाता है। इस साल यह व्रत 27 मई को पड़ रहा है। मान्यता है कि जो भी सुहागिन महिला इस व्रत का पालन करती है उसके पति की आयु लंबी होती है और व्रती महिला को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। वहीं, अगर यह व्रत किसी भी कारण से खंडित हो जाए तो इससे वैवाहिक जीवन पर संकट आ सकता है। ऐसे में ज्योतिषाचार्य राधाकांत वत्स से आइये जानते हैं कि वट सावित्री व्रत के दिन क्या करें और क्या न करें।
वट सावित्री व्रत के नियम
वट सावित्री व्रत के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें। इसके बाद, पूजा शुरू करने से पहले व्रत का संकल्प लेना महत्वपूर्ण है। आप मन ही मन या हाथ में थोड़ा गंगाजल लेकर संकल्प लें कि आप अपने पति की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए यह व्रत रख रही हैं और इसे पूर्ण निष्ठा से निभाएंगी।
यह व्रत मुख्यतः निर्जल (बिना पानी पिए) रखा जाता है। हालांकि, यदि स्वास्थ्य संबंधी कोई समस्या हो या गर्मी अधिक हो, तो फलाहार व्रत भी रख सकती हैं, जिसमें आप फल, दूध, जूस आदि का सेवन कर सकती हैं। अन्न का सेवन पूरे दिन वर्जित होता है।
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व्रत वाले दिन महिलाएं सोलह श्रृंगार करती हैं। नई चूड़ियां, सिंदूर, बिंदी, मेहंदी आदि लगाकर तैयार होती हैं। ये सभी चीजें सौभाग्य का प्रतीक मानी जाती हैं। इस दिन साफ़-सुथरे और शुभ रंग के वस्त्र पहनें (लाल, पीला या गुलाबी रंग शुभ माने जाते हैं)। काले या सफेद रंग के वस्त्र पहनने से बचें।
यह व्रत वट वृक्ष की पूजा के बिना अधूरा है। पूजा के लिए सभी सामग्री (कच्चा सूत या मोली, सिंदूर, कुमकुम, हल्दी, अक्षत, फूल, फल, भीगे हुए चने, मिठाई, जल का लोटा, धूप-दीप) तैयार करके वट वृक्ष के पास जाएं और पूजा संपन्न करें।
वट सावित्री व्रत की कथा सुनना या पढ़ना इस व्रत का एक अभिन्न अंग है। यह कथा पतिव्रता सावित्री की अटूट भक्ति और दृढ़ संकल्प को दर्शाती है, जिन्होंने यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस ले लिए थे। कथा सुनने से व्रत का पूर्ण फल मिलता है और मन में सकारात्मकता आती है।
पूजा के बाद अपनी सामर्थ्य अनुसार दान करना शुभ माना जाता है। किसी ब्राह्मण, जरूरतमंद या मंदिर में अनाज, वस्त्र, फल या धन का दान कर सकते हैं। यह दान व्रत के पुण्य को बढ़ाता है।
पूजा समाप्त होने के बाद, अपने पति के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लें। साथ ही, घर के बड़े-बुजुर्गों, विशेषकर सास-ससुर का आशीर्वाद लेना भी महत्वपूर्ण है।
पूरे दिन व्रत रखने के बाद, शाम को पूजा-पाठ समाप्त होने पर ही व्रत का पारण करें। पारण में सबसे पहले वट वृक्ष के भीगे हुए चने का प्रसाद खाएं। इसके बाद, फल और अन्य सात्विक भोजन (जैसे खीर, पूरी, सब्जी आदि) ग्रहण करें। पारण करते समय स्वच्छता और शुद्धता का ध्यान रखें।
वट सावित्री व्रत के दिन बाल धोने से बचें। यदि धोना बहुत आवश्यक हो तो व्रत के एक दिन पहले ही धो लें। सफेद या काले वस्त्र पहनने से बचें। व्रत के दिन मांसाहार या तामसिक भोजन (लहसुन, प्याज) का सेवन न करें।
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वट सावित्री व्रत के दिन किसी से भी वाद-विवाद या झगड़ा न करें। घर में शांतिपूर्ण माहौल बनाए रखें। किसी का अपमान न करें और मन में नकारात्मक विचार न लाएं। वट वृक्ष को किसी भी प्रकार से नुकसान न पहुंचाएं।
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