Mohini Ekadashi Vrat Katha: मोहिनी एकादशी के दिन जरूर करें इस व्रत कथा का पाठ, सदैव बना रहेगा भगवान विष्णु का आशीर्वाद

हिंदू धर्म में किसी भी एकादशी व्रत का विशेष महत्व होता है और हर एकादशी को अपने आप में ही खास माना जाता है। इन्हीं एकादशी तिथियों में से एक है मोहिनी एकादशी और इसे मनाने का कारण है कि इसी दिन भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार का अवतरण हुआ था। इस दिन भक्त अपने आराध्य को प्रसन्न करने के लिए व्रत करते हैं और कई उपाय करते हैं। अगर आप भी मोहिनी एकादशी का व्रत करती हैं, तो आपको इस दिन उपवास करने के साथ मोहिनी एकादशी व्रत की कथा का पाठ भी करना चाहिए जिससे आपको भगवान विष्णु का पूर्ण आशीर्वाद मिले। यह व्रत न केवल पापों से मुक्ति दिलाने वाला माना जाता है, बल्कि जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाने का भी प्रतीक भी होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो व्यक्ति इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से व्रत करता है और कथा का पाठ करता है, उसे विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। आइए आपको बताते हैं कि मोहिनी एकादशी के दिन आपको किस व्रत कथा का पाठ करना चाहिए।
मोहिनी एकादशी व्रत कथा
मोहिनी एकादशी व्रत कथा के अनुसार एक समय की बात है सरस्वती नदी के तट पर भद्रावती नाम की एक सुंदर नगरी थी। वहां धृतिमान नाम के राजा राज्य करते थे। उसी नगर में धनपाल नाम के एक धर्मात्मा और धनवान वैश्य भी रहते थे। वे दोनों ही भगवान विष्णु के परम भक्त थे और सदैव दान-पुण्य तथा धार्मिक कार्यों में लिप्त रहते थे। धनपाल के पांच पुत्र थे, जिनमें से चार पुत्र आज्ञाकारी और पिता के कार्यों में सहयोग करने वाले थे और सबसे बड़ा पुत्र दृष्टबुद्धि अत्यंत दुर्व्यसनों में लिप्त था। वह बुरी संगत में पड़ चुका था और न न तो धार्मिक कार्यों में रुचि लेता था और न ही अपने परिवार की इज्जत का ध्यान रखता था।
समय के साथ उसकी बुरी आदतें और बढ़ती जा रही थीं। उसने अपने पिता की संपत्ति को भी व्यर्थ कार्यों में खर्च करना शुरू कर दिया। परिवार के लोगों ने उसे कई बार समझाने की कोशिश की, लेकिन उस पर कोई असर नहीं हुआ। अंततः परेशान होकर उसके माता-पिता ने उसे घर से निकाल दिया।

घर से निकलने के बाद दृष्टबुद्धि खुद को पूरी तरह से स्वतंत्र महसूस करने लगा। उसने अपनी बची हुई संपत्ति भी बुरी आदतों में गंवा दी। जब उसके पास कुछ नहीं बचा, तो उसने चोरी और लूटपाट शुरू कर दी। एक दिन वह चोरी करते हुए पकड़ा गया और उसे राजा के सामने लाया गया। राजा ने उसे दंड दिया, लेकिन उसके पिता ने उसे मृत्यु दंड से बचाने का आग्रह किया। इसके बावजूद वह अपनी गलत आदतों से भी नहीं सुधरा और दोबारा अपराध करने लगा। अंत में राजा ने उसे राज्य से बाहर निकाल दिया। राज्य से बाहर होने के बाद दृष्टबुद्धि इधर-उधर भटकने लगा। भूख और प्यास से परेशान होकर उसने पशु-पक्षियों का शिकार करना शुरू कर दिया और धीरे-धीरे उसका जीवन पूरी तरह से कष्टमय हो गया। धीरे-धीरे उसे अपने किए हुए पापों का एहसास होने लगा।
एक दिन जंगल में भटकते हुए उसकी मुलाकात कौंडिन्य ऋषि से हुई। दृष्टबुद्धि ने उनके सामने अपने सभी पापों को स्वीकार किया और उनसे मुक्ति का मार्ग पूछा। उसके पश्चाताप को देखकर ऋषि ने कहा कि यदि वह अपने पापों से छुटकारा पाना चाहता है, तो उसे मोहिनी एकादशी का व्रत करना चाहिए। ऋषि के बताए अनुसार दृष्टबुद्धि ने श्रद्धा और नियमपूर्वक मोहिनी एकादशी का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से उसके सभी पाप नष्ट हो गए और उसका जीवन शुद्ध हो गया। अंततः उसने भगवान विष्णु की कृपा से मोक्ष की प्राप्ति हुई और विष्णु लोक प्राप्त हुआ।
मोहिनी एकादशी क्यों मनाई जाती है?

धार्मिक ग्रंथों की अनुसार, मोहिनी एकादशी का संबंध भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार से भी है। समुद्र मंथन के समय जब देवताओं और असुरों के बीच अमृत को लेकर विवाद हुआ, तब भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण करके देवताओं को अमृत पान कराया था। इसी कारण से इस एकादशी को मोहिनी एकादशी कहा जाता है और इसे विष्णु जी के मोहिनी रूप का अवतरण दिवस भी माना जाता है।
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अगर आप भी मोहिनी एकादशी का व्रत करती हैं, तो आपको इस दिन इस विशेष कथा का पाठ जरूर करना चाहिए, जिससे जीवन में खुशहाली बनी रहे। अगर आपको यह स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।
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