Fri Sep 11, 2026 | Updated 09:55 PM IST

Mohini Ekadashi 2026: आज है मोहिनी एकादशी, जानें तिथि, शुभ मुहूर्त और महत्व

मोहिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा होती है। ऐसे में आप भी सही तिथि, शुभ मुहूर्त और महत्व के बारे में जानकारी लेकर इस दिन व्रत की शुरूआत या शुभ कार्य कर सकती हैं, ताकि आपके जीवन में भगवान का आशीर्वाद बना रहे।
Updated:- 2026-04-27, 09:57 IST
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Mohini Ekadashi 2026: हिंदू धर्म में एकादशी का काफी महत्व होता है। साल में हमेशा 24 एकादशी आती हैं, लेकिन इस साल अधिक मास के कारण 26 एकादशी आएंगी। हर एक एकादशी का अलग महत्व होता है। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी पड़ रही है, जिसे मोहिनी एकादशी कहते हैं। ऐसा कहा जाता है कि इस दिन समुद्र मंथन से अमृत कलश निकला था, जिसे पाने के लिए राक्षस और देवता के बीच लड़ाई हुई। फिर भगवान विष्णु ने मोहिनी अवतार लेकर धर्म की रक्षा की। तभी से इस तिथि को मोहिनी एकादशी कहते हैं। आइए पंडित जन्मेश द्विवेदी से जानते हैं कि यह तिथि किस दिन आ रही है शुभ मुहूर्त क्या है और महत्व?

मोहिनी एकादशी की तिथि क्या है?

मोहिनी एकादशी की शुरूआत 26 अप्रैल 2026 को शाम 6 बजकर 6 मिनट से होगी, जो 27 अप्रैल 2026 को शाम 6 बजकर 15 मिनट तक रहेगी। इसी वजह से मोहिनी एकादशी का व्रत 27 अप्रैल को रखा जाएगा। इसी दिन भगवान विष्णु की पूजा भी होगी, लेकिन व्रत का पारण 28 अप्रैल को होगा।

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मोहिनी एकादशी के शुभ मुहूर्त

मोहिनी एकादशी के दिन कई सारे ऐसे शुभ मुहूर्त हैं जो पूजा, व्रत और दान के लिए शुभ हैं। पहला अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:53 बजे से दोपहर 12:45 बजे तक, दूसरा अमृत-सर्वोत्तम मुहूर्त प्रात:काल 05:44 बजे से सुबह 07:23 बजे तक, तीसरा ब्रह्म मुहूर्त प्रात काल 04:17 बजे से 05:01 बजे तक। व्रत के पारण का समय 28 अप्रैल, सुबह 05:47 बजे से सुबह 08:21 बजे।

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मोहिनी एकादशी का महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मोहिनी एकादशी का अत्यंत विशेष महत्व है, क्योंकि इसी पावन तिथि पर भगवान विष्णु ने असुरों से अमृत की रक्षा करने के लिए अत्यंत सुंदर 'मोहिनी' रूप धारण किया था। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली यह एकादशी व्यक्ति के जन्म-जन्मान्तर के पापों का नाश करने वाली और मन को मोह-माया के सांसारिक बंधनों से मुक्त करने वाली मानी जाती है। शास्त्रों के अनुसार, मोहिनी एकादशी का व्रत करने से मिलने वाला पुण्य कन्यादान और हजारों वर्षों की तपस्या के समान फलदायी होता है। यह व्रत साधक को मानसिक शांति प्रदान करता है और उसके जीवन में आने वाली दरिद्रता व सभी बाधाओं को दूर कर सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है। त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने भी अपने दुखों को दूर करने के लिए और द्वापरयुग में युधिष्ठिर ने इस व्रत के महत्व को जानकर इसे धारण किया था, जो इसके आध्यात्मिक प्रभाव को दर्शाता है।

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Image credit- Freepik

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