Maha Ashtami Ke Upay 2025 : महा अष्टमी के दिन बन रहे हैं ऐसे योग, जो खोल देंगे भाग्य के ताले...इन अचूक उपायों से दूर होगी आर्थिक तंगी

इस वर्ष महा अष्टमी की पूजा 30 सितंबर को की जाएगी और इस दिन बहुत ही शुभ शोभन योग बन रहा है। इस योग में किया गया देवी जी का हवन और कन्या पूजन आपके सभी कष्टों को दूर कर देगा। इस योग में आप और भी कई उपाय कर सकती हैं। इस विषय में हमारी बातचीत पंडिता सौरभ त्रिपाठी से हुई वह कहते हैं, "शोभन योग को ज्योतिष शास्त्र में एक शुभ योग माना जाता है। इसका संबंध बृहस्पति ग्रह से होता है। इसलिए यह व्यक्ति को न केवल धनवान बनाता है बल्कि शक्तिशाली राजयोग भी बनाता है, जिससे जीवन सुख-समृद्धि से भर जाता है। "
महा अष्टमी पर इस बार यही योग पड़ रहा है। ऐसे में कुछ छोटे-छोटे उपाय करने से आपको बहुत सारे फायदे हो सकते हैं। खासतौर पर धन से जुड़ी जो भी समस्याएं हैं, वह इन उपायों को करने से कम हो जाएगी।
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महा अष्टमी के उपाय
- अष्टमी पर देवी महागौरी की पूजा होती है और उन्हें नारियल का भोग अतिप्रिय है। यह भोग चढ़ाया तो जाता है, मगर इसे भक्त लोग ग्रहण नहीं कर सकते हैं। ऐसा करने बुद्धि की हानि होती है। इतना ही नहीं कद्दू और लौकी भी इस दिन नहीं खाना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि इन चीजों की अष्टमी के दिन बलि दी जाती है।
- महा अष्टमी के दिन आप माता रानी का हवन करने के साथ-साथ कन्या पूजन भी अवश्य करें। आप 2 से 10 वर्ष की आयु तक की कन्याओं को पूज सकती हैं। आपको बता दें कि 2 वर्ष की कन्या को कुमारी और 3 वर्ष की कन्या को त्रिमूर्ति और 10 वर्ष की आयु की कन्या को सुभद्रा माना जाता है।
- पति-पत्नी के संबंधों को मजबूत बनाने के दिन आप महा अष्टमी के दिन गौरी शंकर रुद्राक्ष को यदि गंगजल में डुबोकर रखते हैं और अगले दिन धारण करते हैं, तो निश्चित ही इससे आपको फायदा मिलता है।
- जिन कन्याओं की शादी नहीं हो पा रही है या विवाह में कोई रुकावट आ रही है, तो उन्हें देवी माता को अष्टमी के दिन इलायची का भोग लगा सकती हैं।
- अपनी नौकरी, व्यापार आदि में तरक्की चाहते हैं, तो अष्टमी के दिन माता रानी को हलवे पूरी का भोग अवश्य चढ़ाएं। इसके साथ चने का भोग भी माता रानि को अर्पित करें। यह भोग माता रानि को अति प्रिय है।
- अष्टमी वाले दिन देवी दुर्गा के 108 नाम ले कर हवन करें और इस मंत्र का कम से कम 21 बार जाप करें। 'विधेहि देवी कल्याणं विधेहि परमां श्रियम। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।।'
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