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Buddha Purnima Vrat Katha 2025: बुद्ध पूर्णिमा पर पढ़ें ये व्रत कथा, मिलेगी सुख-शांति

बुद्ध पूर्णिमा के दिन व्रत कथा का अनुसरण करना बहुत शुभ माना जाता है। ऐसे में आइये जानते हैं बुद्ध पूर्णिमा से जुड़ी दोनों व्रत कथा के बारे में विस्तार से। 
Updated:- 2025-05-12, 05:40 IST
buddha purnima 2025 ki vrat katha

बुद्ध पूर्णिमा इस साल 12 मई, सोमवार के दिन मनाई जाएगी। इस दिन भगवान बुद्ध और मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना एवं आराधना का विधान है। ऐसा माना जाता है कि बुद्ध पूर्णिमा के दिन जहां एक ओर मां लक्ष्मी पूजन से घर में धन-धान्य बढ़ता है और सुख-समृद्धि का वास बना रहता है, वहीं दूसरी ओर इस दिन महात्मा बुद्ध की पूजा करने से आध्यात्मिक शक्ति बढ़ती है और व्यक्ति में ज्ञान का संचार होता है। इसके अलावा, ज्योतिषाचार्य राधाकांत वत्स ने हमें बताया कि बुद्ध पूर्णिमा के दिन व्रत कथा का अनुसरण करना भी बहुत शुभ माना जाता है। ऐसे में आइये जानते हैं बुद्ध पूर्णिमा की व्रत कथा के बारे में विस्तार से।

बुद्ध पूर्णिमा की पहली व्रत कथा (Buddha Purnima Vrat Katha 2025)

buddha purnima katha

एक समय की बात है, धनेश्वर नाम का एक बहुत अमीर आदमी था, लेकिन उसे कोई संतान नहीं थी। इस वजह से वह हमेशा उदास रहता था। एक दिन उसे एक साधु मिले। साधु ने उसे वैशाख पूर्णिमा का व्रत रखने की सलाह दी। धनेश्वर ने पूरे विधि-विधान से वैशाख पूर्णिमा का व्रत किया और भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा की। कुछ समय बाद, उसकी पत्नी सुशीला गर्भवती हुई और उन्हें एक सुंदर बेटा हुआ। इसलिए, यह माना जाता है कि यह व्रत पुत्र की प्राप्ति के लिए बहुत अच्छा फल देता है।

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एक और कहानी के अनुसार, गौतम ऋषि ने अपनी पत्नी अहिल्या को श्राप दे दिया था क्योंकि इंद्र ने उसे धोखा दिया था। श्राप के कारण अहिल्या पत्थर की बन गई थी। वैशाख पूर्णिमा के दिन, जब भगवान राम अपने वनवास के दौरान गौतम ऋषि के आश्रम पहुंचे, तो ऋषि ने उनका स्वागत किया और उन्हें भोजन कराया। भोजन करने के बाद, भगवान राम ने अहिल्या को पत्थर के रूप से मुक्त होने का वरदान दिया। ऐसा माना जाता है कि जो व्यक्ति इस दिन व्रत रखता है, उसे अपने सभी पापों से मुक्ति मिल सकती है।

बुद्ध पूर्णिमा की दूसरी व्रत कथा

buddha purnima ki katha

कहा जाता है कि एक वैशाख पूर्णिमा की रात, रानी मायादेवी लुंबिनी के जंगल में फूलों से सजी सेज पर सो रही थीं। तभी आकाश से एक बहुत तेज रोशनी आई और उनके गर्भ में प्रवेश कर गई, जिसके कारण वे गर्भवती हो गईं। समय आने पर, उन्होंने भगवान बुद्ध को जन्म दिया। जन्म के समय, देवताओं ने आकाश से फूलों की वर्षा की और चारों ओर मधुर संगीत बजने लगा।

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राजकुमार सिद्धार्थ, जो बाद में भगवान बुद्ध के नाम से प्रसिद्ध हुए, एक आरामदायक जीवन जी रहे थे। लेकिन 29 साल की उम्र में, उन्होंने जीवन के दुखों और सच्चाइयों को महसूस किया, जिससे उनका मन संसार से विरक्त हो गया और वे ज्ञान की तलाश में निकल पड़े। छह साल तक उन्होंने कठोर तपस्या की और अंत में बोधगया में एक पीपल के पेड़ के नीचे उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई। तभी से वे भगवान बुद्ध कहलाए। 80 वर्ष की आयु में, कुशीनगर में भगवान बुद्ध ने अपना शरीर त्याग दिया, जिसे महापरिनिर्वाण कहा जाता है। यह भी वैशाख पूर्णिमा के दिन ही हुआ था।

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image credit: herzindagi 

FAQ
बुद्ध पूर्णिमा के दिन पीपल के पेड़ की पूजा क्यों होती है? 
माना जाता है कि भगवान बुद्ध को पीपल के पेड़ के नीचे ही पूर्णिमा के दिन ज्ञान प्राप्त हुआ था, इसी कारण से इस दिन पीपल की पूजा का विधान है।
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