अपरा एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा करना हितकारी माना जाता है। ऐसी मानयता है कि इस एकादशी पर श्री हरि नारायण की पूजा करने से पाप कर्मों से मुक्ति मिल जाती है और भगवान विष्णु की कृपा बरसती है। वहीं, एकादशी व्रत का पूर्ण फल तभी मिलता है जब व्रत कथा पढ़ी या सुनी जाए। ऐसे में ज्योतिषाचार्य राधाकांत वत्स से आइये जानते हैं कि क्या है अपरा एकादशी की व्रत कथा।
अपरा एकादशी व्रत कथा (Apara Ekadashi Vrat Katha 2025)
प्राचीन काल में महिष्मती नामक एक नगर था, जहां मांधाता नाम का एक धर्मात्मा राजा राज करता था। उसी नगर में एक धनी राजा का एक छोटा भाई था, जिसका नाम 'अपरा' था। वह बहुत ही क्रूर, पापी और अधर्मी था। वह अपने बड़े भाई से ईर्ष्या करता था और उसे मारना चाहता था। अपरा अपने बड़े भाई का सम्मान नहीं करता था और हमेशा उसे नीचा दिखाने की कोशिश करता था। वह जुआ खेलता था, दूसरों का धन हड़पता था और कई तरह के बुरे काम करता था।
एक दिन, उस क्रूर अपरा ने अपने ही बड़े भाई को धोखे से मार डाला और उसके शव को एक पीपल के वृक्ष के नीचे दबा दिया। इस जघन्य पाप के कारण वह प्रेत बनकर पीपल के पेड़ पर रहने लगा। प्रेत बनकर वह बहुत दुखी था और उसे अपने किए पर पछतावा होने लगा। वह लोगों को परेशान करने लगा और नगर में उत्पात मचाने लगा।
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संयोगवश, उस समय धौम्य नामक एक महान ऋषि उस पीपल के पेड़ के पास से गुजर रहे थे। अपनी दिव्य दृष्टि से उन्होंने पहचान लिया कि यह प्रेत पहले एक इंसान था और अपने पापों के कारण इस दुर्दशा को प्राप्त हुआ है। ऋषि को उस प्रेत पर दया आ गई। उन्होंने अपनी तपस्या और ज्ञान के बल पर उस प्रेत की मुक्ति का उपाय सोचा।
ऋषि ने उस प्रेत को पीपल के पेड़ से उतारा और उसे अपरा एकादशी का व्रत करने की विधि बताई। ऋषि ने कहा कि इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और व्रत करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है। अपरा को ऋषि की बातों पर विश्वास हुआ और उसने पूरी श्रद्धा के साथ अपरा एकादशी का व्रत किया। उसने विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा की और रात्रि जागरण किया।
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इस व्रत के प्रभाव से अपरा के सभी पाप धुल गए। उसका प्रेत शरीर समाप्त हो गया और उसे वैकुंठ धाम की प्राप्ति हुई। अपरा एकादशी के व्रत के प्रभाव से वह सभी बंधनों से मुक्त होकर भगवान विष्णु के परमधाम चला गया।
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