'पीरियड्स की वजह से चिड़ रही हो', ऐसे कमेंट्स का महिलाओं की मेंटल हेल्थ पर क्या असर होता है?

'तुम्हें पीरियड्स आए हैं क्या...'
'पीरियड्स की वजह से चिढ़ रही हो क्या...'
अक्सर जब महिलाएं गुस्सा होती हैं, चिढ़ जाती हैं या किसी बात पर इमोशनल होती हैं, तो उनका पार्टनर या आस-पास के लोग यही सवाल पूछ लेते हैं। बेशक पीरियड्स के दौरान महिलाओं की मूड स्विंग्स होते हैं और कई बार इस दौरान छोटी-छोटी बातों पर रोने का मन करता है या किसी भी बात पर तेज गुस्सा आ जाता है, लेकिन हर बार महिलाओं के इमोशंस को पीरियड्स से जोड़ देना या जब भी हो इमोशनल हों, तो उन्हें पीरियड्स का ताना मार देना सही नहीं है। इसका उनकी मेंटल हेल्थ पर भी असर होता है। कैसे इस तरह के कमेंट्स महिलाओं की मेंटल हेल्थ को प्रभावित करते हैं, चलिए इस बारे में एक्सपर्ट से जानते हैं। इस बारे में Dr. Pragya Rashmi, Consultant Psychologist, Yashoda Hospitals, Secunderabad जानकारी दे रही हैं।
महिलाएं व्यक्त नहीं कर पातीं अपनी बात
पीरियड से पहले होने वाले आम भावनात्मक बदलावों को बस यह कहकर टाल देना कि 'तुम्हें तो पीरियड हो रहा है' या फिर महिलाओं के कभी भी इमोशनल होने को पीरियड्स से जोड़ देना बहुत गलत होता है। बेशक पीरियड्स के दौरान हार्मोनल बदलावों से मूड पर असर पड़ सकता है, लेकिन सभी भावनात्मक प्रतिक्रियाएं बायोलॉजिकल नहीं होतीं और सभी महिलाओं में एक जैसे लक्षण नहीं दिखते। जब महिलाओं के अपनी भावना को व्यक्त करने पर उसे पीरियड्स का लेबल दे दिया जाता है, तो कई बार महिलाएं मदद लेने से हिचकिचा सकती हैं और अपने इमोशंस को मन में रखने की कोशिश करती हैं, जिसका उनकी मेंटल हेल्थ पर असर होता है।
हर बात को हार्मोन से जोड़ देना सही नहीं

महिला की हर जायज नाराजगी या गुस्से को केवल हार्मोन्स से जोड़ देने से उनकी बात की गंभीरता खत्म हो जाती है और इससे वो मन ही मन में बुरा महसूस करने लगती हैं।
आत्मविश्वास होने लगता है कम
कई बार इस तरह से आप उनकी असली परेशानी को नकार देते हैं और खुद भी महिलाओं का आत्मविश्वास कम होने लगता है। उन्हें महसूस होता है कि शायग उनके इमोशंस या गुस्सा सही नहीं है। इसकी वजह से वो खुद को कम आंकने लगती हैं।
इस बात का भी रखें ध्यान

यहां एक बात का और ध्यान रखना चाहिए कि पीरियड्स के दिनों में भी बहुत ज्यादा मूड स्विंग्स होना सही नहीं है। बेशक पीएमएस (प्री मेंस्ट्रुअल सिंड्रोम) नॉर्मल है, लेकिन प्रीमेंस्ट्रुअल डिस्फोरिक डिसऑर्डर या मूड डिसऑर्डर जैसी गंभीर स्थितियां नॉर्मल नहीं हैं। अगर इमोशंस पर काबू करना बहुत मुश्किल हो जाए या रोजमर्रा के कामों को करने में भी तकलीफ होने लगे, तो डॉक्टर की सलाह जरूर लेनी चाहिए।
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