सफेद रंग और चौड़ा लाल बॉर्डर... सिंदूर खेला में क्यों चमकती है यह बंगाली साड़ी? दुर्गा पूजा से जुड़ी है अनोखी कहानी

कल यानी 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्रि 2026 की शुरुआत हो रही है। इस दौरान देशभर में मां दुर्गा की पूजा होगी, लेकिन वेस्ट बंगाल की दुर्गा पूजा की रौनक ही कुछ अलग होती है। यहां बड़े-बड़े पंडाल सजाए जाते हैं, ढाक की आवाज गूंजती है और हर तरफ त्योहार की रौनक देखने को मिलती है। इस खास मौके पर बंगाली महिलाओं का एक रूप सबसे ज्यादा आकर्षित करता है और वह है सफेद साड़ी पर चौड़ा लाल बॉर्डर और माथे पर लाल सिंदूर।
खासकर दुर्गा पूजा की अष्टमी और दशमी पर (सिंदूर खेला के दौरान) महिलाएं इस तरह की साड़ी पहनती हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर इस साड़ी का रंग ऐसा क्यों होता है और बंगाली महिलाओं के लिए इसका क्या मतलब है? इसके पीछे बंगाल की पुरानी परंपरा और मां दुर्गा से जुड़ी आस्था है। हम आपको इसके बारे में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं। आइए जानत हैं-
image credit- pinterest
आखिर क्या होती है बंगाल की लाल बॉर्डर वाली साड़ी?
आपको बता दें कि बंगाल में व्हाइट या क्रीम कलर की साड़ी, जिसके किनारे पर चौड़ी लाल पट्टी होती है, काफी खास मानी जाती है। इसे वहां पर आम बोलचाल में लाल पार वाली साड़ी कहा जाता है। दुर्गा पूजा के दौरान इस साड़ी को पहनने का चलन खास तौर पर देखने को मिलता है। इस साड़ी की पहचान सिर्फ इसके कलर से नहीं बल्कि इसे पहनने के तरीके से भी होती है। इसकी कुछ खास बातें हैं-
- व्हाइट या ऑफ-व्हाइट कलर: साड़ी का पूरा कलर बहुत ही लाइट होता है, जो इसे एक अलग और सिंपल लुक देता है।
- चौड़ा लाल बॉर्डर: किनारे पर बनी लाल पट्टी साड़ी की खास पहचान है।
- रेड कलर का पल्लू: साड़ी के पल्लू पर भी लाल रंग और सुंदर डिजाइन देखने को मिलते हैं।
- पहनने का अंदाज: महिलाएं इसे खास तरीके से पहनती हैं, जिससे बंगाली संस्कृति की झलक दिखाई देती है।
यह भी पढ़ें- ₹1500 में Navratri लुक को बनाएं स्टाइलिश, नोट करें पॉकेट फ्रेंडली फैशन गाइड
दुर्गा पूजा में क्यों पहनी जाती है लाल पार वाली साड़ी?
बंगाली संस्कृति में दुर्गा पूजा सिर्फ मां दुर्गा की पूजा करने का त्योहार नहीं है। इसे मां के घर आने और फिर विदा होने के मौके पर खासतौर से पहना जाता है। माना जाता है कि बंगाल में नवरात्रि के दाैरान मां दुर्गा अपने मायके आती हैं और लोग उनका स्वागत घर की बेटी की तरह करते हैं। इस दौरान लाल पार वाली साड़ी पहनने के पीछे भी खास भावनाएं जुड़ी हैं।
- मां दुर्गा से जुड़ी आस्था: रेड कलर को मां दुर्गा से जोड़कर देखा जाता है। इसे शक्ति और जोश का रंग भी माना जाता है।
- व्हाइट और रेड कलर का कॉम्बिनेशन: सफेद रंग के साथ लाल बॉर्डर इस साड़ी को खास पहचान देता है। बंगाली परंपरा में इन रंगों को खास महत्व है।
- पुरानी परंपरा को आगे बढ़ाना: इस साड़ी को पहनकर महिलाएं अपनी संस्कृति और रीति-रिवाजों को दिखाती हैं।
- दशमी की खास रस्म: दुर्गा पूजा के आखिरी दिन महिलाएं लाल पार वाली साड़ी पहनकर सिंदूर खेला में हिस्सा लेती हैं। यह इस त्योहार की सबसे खास रस्मों में से एक है।
image credit- pinterest/GeTS Holidays
सिंदूर खेला में क्यों यह साड़ी पहनती हैं महिलाएं?
दुर्गा पूजा के आखिरी दिन यानी विजयादशमी पर बंगाल में सिंदूर खेला की रस्म होती है। इस दौरान विवाहित महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर चढ़ाती हैं और फिर एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं। कई जगहों पर महिलाएं इस रस्म के लिए खास तौर पर यह साड़ी पहनती हैं। इस रस्म के पीछे सुहाग, खुशहाली और मां दुर्गा के प्रति श्रद्धा की भावना होती है। महिलाएं मां से अपने परिवार की सुख-शांति की कामना करती हैं। एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर त्योहार की खुशियां भी बांटती हैं।
गोरद से लेकर कोरियाल तक, कई तरह की होती हैं ये साड़ियां
लाल पार वाली साड़ी का मतलब सिर्फ एक ही तरह की साड़ी नहीं है। इसे अलग-अलग कपड़ों और बुनाई में तैयार किया जाता है। बंगाल में गोरद और कोरियाल जैसी साड़ियां इस परंपरा से जुड़ी हुई हैं।
- गोरद साड़ी की बात करें तो यह आमतौर पर मुलायम रेशम से बनाई जाती है। इसे बनाने में मलबेरी सिल्क का इस्तेमाल किया जाता है। इसका कपड़ा बहुत ही हल्का होता है और इसमें नेचुरल चमक दिखाई देती है। दुर्गा पूजा जैसे खास मौकों पर इसे पहनना पसंद किया जाता है।
- कोरियाल साड़ी का लुक गोरद के मुकाबले ज्यादा सजा हुआ होता है। इसके सफेद रेशमी कपड़े पर लाल बॉर्डर होता है, जिस पर बारीक कढ़ाई या जरी का काम भी होता है।
- रेशम के अलावा सूती साड़ियों में भी लाल बॉर्डर का यह डिजाइन देखने को मिलता है। तांत की सूती साड़ियां बंगाल में काफी पसंद की जाती हैं।
लाल पार वाली साड़ी पहनने का तरीका भी है खास
इस साड़ी को पहनने का पारंपरिक अंदाज इसे और खास बनाता है। बंगाली महिलाओं के साड़ी पहनने के तरीके में पल्लू को खास तरह से संभाला जाता है। इसे कुछ जगहों पर आठपौरे या आठ पोर स्टाइल के नाम से भी जाना जाता है। इस अंदाज में साड़ी पहनते समय इन बातों का ध्यान रखा जाता है-
- साड़ी को कमर के चारों ओर लपेटकर नीचे की तरफ अच्छी तरह जमा लें।
- पल्लू को खास तरीके से यानी बंगाली स्टाइल में कंधे पर रखें, जिससे साड़ी का लाल बॉर्डर साफ दिखाई दे।
- कुछ जगहों पर पल्लू के कोने पर चाबियों का गुच्छा भी बांधा जाता है।
हालांकि, हर महिला साड़ी को बिल्कुल एक ही तरीके से नहीं पहनती। समय के साथ इस स्टाइल में भी बदलाव आए हैं।
अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।
यह भी पढ़ें: दुर्गा जी की आरती की लिरिक्स
Cover Image Credit- AI
हमारा उद्देश्य अपने आर्टिकल्स और सोशल मीडिया हैंडल्स के माध्यम से सही, सुरक्षित और विशेषज्ञ द्वारा वेरिफाइड जानकारी प्रदान करना है। यहां बताए गए उपाय, सलाह और बातें केवल सामान्य जानकारी के लिए हैं। किसी भी तरह के हेल्थ, ब्यूटी, लाइफ हैक्स या ज्योतिष से जुड़े सुझावों को आजमाने से पहले कृपया अपने विशेषज्ञ से परामर्श लें। किसी प्रतिक्रिया या शिकायत के लिए, compliant_gro@jagrannewmedia.com पर हमसे संपर्क करें।