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    फैशन की दुनिया में धूम मचाने वाली जरदोजी एंब्रॉयडरी का रोचक इतिहास जानें

    जानें सिंपल से आउटफिट को डिजाइनर बनाने वाली जरदोजी एंब्रॉयडरी का रोचक सफर, पढ़ें यह आर्टिकल। 
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    Updated at - 2022-11-07,19:50 IST
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    zardozi embroidery history hindi

    हुनर की रंगत, हाथ का करिश्‍मा और मेहनत का पसीना, इन तीनों की चमक नजर आती है इस खास एंब्रॉयडरी में, जिसे जरदोजी के नाम से जाना जाता है। इस विश्व प्रसिद्ध एंब्रॉयडरी के चाहने वाले तो बहुत हैं, मगर इस कारीगरी को करने वाले हुनरमंद लोगों की अब बहुत किल्लत है। 

    शाही परंपराओं का हिस्सा रह चुका जरदोजी का काम, आज फैशन के गलियारों में सबसे ज्यादा प्रचलित है। इस शानदार कढ़ाई के दाम आसमान की ऊंचाई जितने ऊंचे हैं। हालांकि, वक्त के साथ आधुनिकता के बिखरे रंगों ने इस ऐतिहासिक कला को भी नहीं बख्‍शा। सोने और चांदी के तारों से की जाने वाली यह कढ़ाई अब चमकीले धागों से की जाती है। अफसोस की बात तो यह है कि युवाओं ने इस हुनर से मुंह मोड़ा तो कल-पुर्जों ने अपनी नकली बनावट से इस जादुई कला का सारा करिश्‍मा चुरा लिया। 

    चलिए आज हम आपको कपड़े पर करिश्‍मा बुनने वाली इस कला के इतिहास के बारे में बताते हैं, जो न केवल आपको हैरत में डाल देगा बल्कि आपको पुराने समय में ले जाएगा। 

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    जरदोजी का इतिहास 

    भारत में जरदोजी की कला 12वीं शताब्दी में दिल्ली में हुकूमत करने वाले तुर्की सुल्तानों द्वारा लाई गई। वैसे यह एक फारसी शब्द है। जर का मतलब सोना होता है और दोजी का अर्थ कढ़ाई। इतिहासकारों के इस कढ़ाई को लेकर अनेकों मत मिलते हैं। कहा जाता है, जरदोजी को ईरान से भारत लाने वाला शख्स कोई और नहीं बल्कि मुगल बादशाह अकबर ही था। 

    मुगल काल में ईरान के कारिगर शाही परिवार के सदस्यों के लिए जरी-जरदोजी कढ़ाई वाले महंगे और खूबसूरत कपड़े तैयार करते थे। भारत में आज भी कई म्यूजियम हैं, जहां इतिहास में दफन हो चुके लोगों की चुनिंदा चीजों में उनके कपड़े भी मिलते हैं, जिन पर आप जरदोजी का काम देख सकते हैं। इसे जादुई कढ़ाई इसलिए भी कहा जाता है क्योंकि हजारों वर्ष पुरानी होने के बाद भी यह आज भी उन शाही कपड़ों की रौनक बढ़ा रही है। 

    भारत में सबसे पहले यह कला दिल्‍ली और फिर लखनऊ में आई। मगर जैसे-जैसे हुकूमत बदली वैसे-वैसे जरदोजी की तकदीर भी बदलती गई। औरंगजेब के राज्य में इस कला को सबसे ज्यादा नजरअंदाज किया गया। वजह थी औरंगजेब का कंजूस स्‍वभाव। इस महंगी कला पर पैसे खर्च करना औरंगजेब को व्यर्थ लगा। मगर भारत के आजाद होने के बाद इस कला को एक बार फिर से नई जिंदगी मिली और केवल लखनऊ ही नहीं बल्कि फर्रुखाबाद , आगरा हरदोई और रायबरेली तक इस कला ने अपने पैर पसार लिए। 

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    zardozi embroidery fabric

    क्‍या है जरदोजी की खासियत 

    जरदोजी में अब जर तो नहीं रहा मगर इसकी जगह चमकीले धागे, मोती, सेमी प्रेशियस स्‍टोंस आदि आ गए हैं। जरदोजी कला में करदाना मोती, कोरा नक्काशी, सादी कसब आदि कई तरह के काम किए जाते हैं। पहले यह केवल रेश्‍मी कपड़ों पर किया जाता था, मगर अब आप इसे सिल्‍क और रॉ सिल्‍क के साथ-साथ वेल्‍वेट, शिफॉन आदि कपड़ो पर भी देख सकती हैं। 

    आपको बता दें कि आज भी जरदोजी का काम बड़े-बड़े डिजाइनर्स द्वारा आउटफिट्स पर किया जाता है। हालांकि, लखनऊ , फर्रुखाबाद और रायबरेली आदि जगहों पर इस कला के हुनरमंद आपको कारखानों में काम करते हुए मिल जाएंगे। 

    बहुत कम लोगों को ही पता है कि आज भी फर्रुखाबाद के जरी-जरदोजी वाले लहंगे पूरे देश में फेमस हैं। लहंगों के साथ-साथ साड़ी, सलवार सूट, दुपट्टों और यहां तक कि इंडो-वेस्टर्न ड्रेसेस में भी जरदोजी का काम हो रहा है। 

    लखनऊ के चौक इलाके में आपको ढेरों दुकानें मिल जाएंगी जहां चिकनकारी और जरदोजी की कला के अलावा आपको कुछ और नजर ही नहीं आएगा। आपको बता दें कि पहले के जमाने जितना अब जरदोजी का काम महंगा भी नहीं रहा। अब आपको 5000 रुपये तक में ही बढ़िया जरदोजी का काम किया गया कपड़ा मिल जाएगा। बल्कि आपको इससे भी कम दामों में जरदोजी की कला बिकती नजर आ जाएगी। मगर आज भी असली जरदोजी के काम की कीमत आसमान छूती हैं। 

     

    नए रंग में रंगी जरदोजी की कला को आप भी एक बार जरूर अपना कर देखें और शाही लुक पाएं। उम्‍मीद है कि आपको यह आर्टिकल पसंद आया होगा। इस आर्टिकल को शेयर और लाइक जरूर करें। इसी तरह के और आर्टिकल पढ़ने के लिए हमें कमेंट करके बताएं और हरजिंदगी के साथ जुड़े रहें। 

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