गणित के 'शून्य' से क्या है ग्वालियर के इस मंदिर का कनेक्शन? दीवार पर दर्ज है Zero का सबूत

जब भी हम गणित यानी मैथ्स पढ़ते हैं तो शून्य (Zero) का इस्तेमाल जरूर होता है, लेकिन आज जिस शून्य के बिना प्लस-माइनस से लेकर कंप्यूटर और साइंस तक की कल्पना करना मुश्किल है, उसके पीछे भारत का बहुत पुराना योगदान रहा है। इसी वजह से मध्य प्रदेश के ग्वालियर का एक छोटा सा मंदिर खास माना जाता है। ग्वालियर किले के अंदर बने चतुर्भुज मंदिर की दीवार पर करीब 876 ईस्वी का एक शिलालेख है।
इस पर एक गोल निशान दिखाई देता है, जिसे शून्य का सबसे पुराना सबूत माना जाता है। खास बात यह है कि शून्य का यह निशान किसी किताब में नहीं, बल्कि आज भी मंदिर की दीवार पर देखा जा सकता है। इसी वजह से चतुर्भुज मंदिर को 'जीरो टेंपल' भी कहा जाता है। आज हम आपको इसके बारे में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं।
कहां है चतुर्भुज मंदिर?
चतुर्भुज मंदिर मध्य प्रदेश के ग्वालियर में बने ऐतिहासिक ग्वालियर किले के अंदर है। इस मंदिर को 9वीं सदी में बनाया गया था। बताया जाता है कि यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। किले के अंदर ऐसी कई मशहूर इमारतें हैं, उनकी तुलना में यह मंदिर आकार में काफी साधारण सा है, लेकिन इसकी दीवार पर मौजूद एक खास शिलालेख गणित के इतिहास से जुड़ा है।
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क्यों कहा जाता है इसे 'Zero Temple'?
चतुर्भुज मंदिर की सबसे खास बात यह है कि इसकी दीवार पर सन 876 (साल 876) की एक पुरानी लिखावट पत्थरों पर खोदी गई है। यह जानकारी संस्कृत भाषा में और नागरी लिपि (अक्षरों) में लिखी गई है। इसमें मंदिर को दिए गए एक फूलों के बगीचे का जिक्र भी है। साथ ही बगीचे की लंबाई-चौड़ाई (साइज) और कुछ संख्याएं भी दर्ज हैं। इन्हीं संख्याओं में गोल आकार का एक निशान दिखाई देता है। यही निशान शून्य यानी Zero का लिखित रूप माना जाता है।
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शिलालेख में क्या लिखा है?
इस लिखावट में गिनती के तौर पर 270 और 50 नंबर लिखे गए हैं। सबसे खास बात यह है कि इन दोनों संख्याओं में जीरो के लिए गोल निशान बनाया गया है। आज हम सब भी जीरो को इसी तरह लिखते हैं।
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क्या यहीं से शून्य की शुरुआत हुई थी?
शून्य (Zero) की खोज तो इससे भी बहुत पहले हो चुकी थी, लेकिन इस मंदिर की खास बात यह है कि यहां पत्थर पर बना हुआ जीरो का एक बहुत पुराना गोल निशान आज भी देखा जा सकता है। यानी इस मंदिर का महत्व इसलिए है, क्योंकि यहां पुराने जमाने का लिखा हुआ जीरो पत्थर पर आज भी बिल्कुल सुरक्षित मौजूद है। इतने सालों तक खुले आसमान के नीचे रहने की वजह से धूप, हवा, ठंड और बारिश के कारण पत्थर का रंग थोड़ा बदल गया, फिर भी जीरो साफ दिखाई देता है।
फूलों के बगीचे से कैसे जुड़ा है शून्य?
मंदिर की इस लिखावट में एक फूलों के बगीचे के बारे में भी बताया गया है, जो मंदिर को दान में दिया गया था। इसी जानकारी के साथ कुछ नंबर भी लिखे गए थे। इन नंबरों में जीरो (0) का इस्तेमाल किया गया है। इसका मतलब है कि उस जमाने में लोगों को न सिर्फ जीरो के बारे में पता था, बल्कि वे गिनती लिखते समय इसका इस्तेमाल भी कर रहे थे।
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ग्वालियर किले में और क्या-क्या देख सकती हैं?
अगर आप चतुर्भुज मंदिर देखने ग्वालियर किले जाती हैं तो सिर्फ इस मंदिर को ही एक्सप्लोर न करें। किले के अंदर कई पुराने महल, मंदिर और म्यूजियम भी हैं। इसलिए आप इन जगहों को भी कवर कर सकती हैं।
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ग्वालियर में और कहां-कहां घूमें?
अगर आप ग्वालियर जा रही हैं, तो ग्वालियर फोर्ट में बने चतुर्भुज मंदिर के अलावा और भी जगहें एक्सप्लोर कर सकती हैं। जैसे-
- जय विलास महल (Jai Vilas Palace)
- मानसिंह महल या मान मंदिर पैलेस (Man Singh Palace)
- सास-बहू मंदिर (Sas Bahu Temple)
- तेली का मंदिर (Teli Ka Mandir)
- तानसेन का मकबरा (Tomb of Tansen)
- मोहम्मद गौस का मकबरा (Tomb of Mohammad Ghaus)
- सूर्य मंदिर (Sun Temple)
- तिघरा बांध (Tigra Dam)
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तो अगर आप भी ग्वालियर जा रही हैं तो इस 'Zero Temple' को अपनी लिस्ट में जरूर शामिल करें। साथ ही अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।
Image Credit- Freepik
- ग्वालियर का चतुर्भुज मंदिर क्यों प्रसिद्ध है?
- यहां दुनिया में शून्य (0) को लिखित रूप में दर्ज करने का सबसे पुराना सबूत मौजूद है।
- ग्वालियर किला किसने बनवाया था?
- 8वीं शताब्दी में राजा सूरज सेन ने इस ऐतिहासिक और अभेद्य किले का निर्माण कराया था।
- चतुर्भुज मंदिर ग्वालियर कहां स्थित है?
- यह मंदिर ग्वालियर किले के परिसर में ही ऊपरी पैदल रास्ते (ग्वालियर गेट) पर बना है।
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