झारखंड का पारंपरिक 'महुआ लड्डू', जिसे कभी चाव से खाते थे लोग; आज हो रहा है गायब

भारत अपनी सांस्कृतिक विविधताओं और समृद्ध खान-पान के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है। हालांकि, समय के साथ हमारी जीवनशैली में काफी बदलाव आया है। पहले जहां लोग शुद्ध और पारंपरिक भोजन करते थे, वहीं आज खासकर घर से दूर रहने वाले लोग फास्ट फूड और चाइनीज व्यंजनों पर निर्भर हो गए हैं। इसके बावजूद, जब भी हम अपने पुराने खान-पान की बातें सुनते या उनका स्वाद याद करते हैं, तो एक अलग ही खुशी महसूस होती है। बदलते दौर के साथ कई चीजें इतनी तेजी से बदली हैं कि हमारी कई पुरानी विरासतें गुम हो चुकी हैं। इनमें हमारे वे पारंपरिक व्यंजन भी शामिल हैं। आज के इस लेख में हम झारखंड के 'महुआ लड्डू' के बारे में बताने जा रहे हैं, जो आज की मॉर्डन फूड लिस्ट से लगभग गायब हो चुका है।
महुआ से क्या-क्या व्यंजन बनाए जाते हैं?
आमतौर पर जब भी महुआ का नाम आता है कि लोगों के दिमाग में पहली तस्वीर शराब की आती है। हम में से अधिकतर लोगों को लगता है कि इससे केवल शराब बनाई जा सकती हैं। मगर ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। बता दें कि झारखंड में महुआ के फूल से कई स्थानीय व्यंजन बनाए जाते हैं।

भारत सरकार के वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट के अनुसार, झारखंड के लातेहार में महुआ के फूलों से पारंपरिक पेय और मिठाइयां बनाई जाती हैं। महुआ के बीज से तेल भी निकाला जाता है। मतलब महुआ ग्रामीण अर्थव्यवस्था, भोजन और स्थानीय संस्कृति से जुड़ा एक बहुउपयोगी पेड़ है।
इसे भी पढ़ें- कभी यूपी की शान थी गुल्लू की सब्जी, आज नाम भूल गई नई पीढ़ी; जानें खासियत
महुआ लड्डू के गायब होने के कारण
समय के साथ महुआ के फूलों का व्यावसायिक इस्तेमाल मुख्य रूप से शराब बनाने के लिए अधिक होने लगा। इसके औषधीय और पारंपरिक खान-पान वाले गुणों को नजरअंदाज कर दिया गया, जिससे इसका घरेलू रसोईघरों से नाता कम होता चला गया। शहरीकरण और फास्ट फूड के दौर में लोग अपनी पारंपरिक और स्थानीय व्यंजनों की शैली को भूलते जा रहे हैं। धूप में महुआ सुखाना, उसे भूनकर पीसना और गुड़-तिल के साथ लड्डू तैयार करने की यह लंबी प्रक्रिया अब आमचलन में नहीं रही।

महुआ लड्डू की खासियत
महुआ लड्डू प्राकृतिक रूप से आयरन, कैल्शियम, विटामिन और मिनरल्स से भरपूर होते थे। पुराने समय में ग्रामीण इसे ऊर्जा का मुख्य स्रोत मानते थे, जो सर्दियों के दिनों में शरीर को गर्म रखने और जोड़ों के दर्द जैसी समस्याओं में राहत देने का काम करते थे। इन्हें बनाने के लिए सूखे महुआ को अच्छी तरह साफ करके धीमी आंच पर भून लिया जाता था। इसके बाद भुने हुए महुआ और सफेद तिल या मूंगफली को दरदरा पीसकर पिघले हुए गुड़ में मिलाया जाता था। हल्का गर्म रहने पर ही इसके पौष्टिक लड्डू बांधे जाते थे।
इस विरासत को बचाने में लगा है झारखंड का यह गांव
भले ही यह व्यंजन बड़े शहरों या आम बाजारों से गायब हो गया हो, लेकिन झारखंड के बोकारो और गुमला के कुछ गांवों ने इस धरोहर को दोबारा जिंदा करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

महुआ से लड्डू, खीर और अचार बनाकर ग्रामीण महिलाओं द्वारा इसे आजीविका का साधन भी बनाया जा रहा है, ताकि यह अनमोल परंपरा फिर से लोगों की थाली तक पहुंच सके।
इसे भी पढ़ें- फास्ट फूड की भीड़ में गुम हो रही बुंदेलखंड की ठडूला, स्वाद ऐसा जिसे भूलना मुश्किल
अगर आप पारंपरिक व्यंजनों के बारे में जानना चाहते हैं, जो गुमनाम जायका सीरीज को जरूर पढ़ें। अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।
Image Credit- Shutterstock
हमारा उद्देश्य अपने आर्टिकल्स और सोशल मीडिया हैंडल्स के माध्यम से सही, सुरक्षित और विशेषज्ञ द्वारा वेरिफाइड जानकारी प्रदान करना है। यहां बताए गए उपाय, सलाह और बातें केवल सामान्य जानकारी के लिए हैं। किसी भी तरह के हेल्थ, ब्यूटी, लाइफ हैक्स या ज्योतिष से जुड़े सुझावों को आजमाने से पहले कृपया अपने विशेषज्ञ से परामर्श लें। किसी प्रतिक्रिया या शिकायत के लिए, compliant_gro@jagrannewmedia.com पर हमसे संपर्क करें।