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झारखंड का पारंपरिक 'महुआ लड्डू', जिसे कभी चाव से खाते थे लोग; आज हो रहा है गायब

झारखंड का पारंपरिक महुआ लड्डू, जो कभी पोषण का स्रोत था, आधुनिक जीवनशैली के कारण लुप्त हो रहा है। बोकारो और गुमला के कुछ गांवों में इसे पुनर्जीवित करने और आजीविका का साधन बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं।
Updated:- 2026-08-14, 21:36 IST
Mahua Ladoo

भारत अपनी सांस्कृतिक विविधताओं और समृद्ध खान-पान के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है। हालांकि, समय के साथ हमारी जीवनशैली में काफी बदलाव आया है। पहले जहां लोग शुद्ध और पारंपरिक भोजन करते थे, वहीं आज खासकर घर से दूर रहने वाले लोग फास्ट फूड और चाइनीज व्यंजनों पर निर्भर हो गए हैं। इसके बावजूद, जब भी हम अपने पुराने खान-पान की बातें सुनते या उनका स्वाद याद करते हैं, तो एक अलग ही खुशी महसूस होती है। बदलते दौर के साथ कई चीजें इतनी तेजी से बदली हैं कि हमारी कई पुरानी विरासतें गुम हो चुकी हैं। इनमें हमारे वे पारंपरिक व्यंजन भी शामिल हैं। आज के इस लेख में हम झारखंड के 'महुआ लड्डू' के बारे में बताने जा रहे हैं, जो आज की मॉर्डन फूड लिस्ट से लगभग गायब हो चुका है।

महुआ से क्या-क्या व्यंजन बनाए जाते हैं?

आमतौर पर जब भी महुआ का नाम आता है कि लोगों के दिमाग में पहली तस्वीर शराब की आती है। हम में से अधिकतर लोगों को लगता है कि इससे केवल शराब बनाई जा सकती हैं। मगर ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। बता दें कि झारखंड में महुआ के फूल से कई स्थानीय व्यंजन बनाए जाते हैं।

mahua ladoo

भारत सरकार के वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट के अनुसार, झारखंड के लातेहार में महुआ के फूलों से पारंपरिक पेय और मिठाइयां बनाई जाती हैं। महुआ के बीज से तेल भी निकाला जाता है। मतलब महुआ ग्रामीण अर्थव्यवस्था, भोजन और स्थानीय संस्कृति से जुड़ा एक बहुउपयोगी पेड़ है।

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महुआ लड्डू के गायब होने के कारण

समय के साथ महुआ के फूलों का व्यावसायिक इस्तेमाल मुख्य रूप से शराब बनाने के लिए अधिक होने लगा। इसके औषधीय और पारंपरिक खान-पान वाले गुणों को नजरअंदाज कर दिया गया, जिससे इसका घरेलू रसोईघरों से नाता कम होता चला गया। शहरीकरण और फास्ट फूड के दौर में लोग अपनी पारंपरिक और स्थानीय व्यंजनों की शैली को भूलते जा रहे हैं। धूप में महुआ सुखाना, उसे भूनकर पीसना और गुड़-तिल के साथ लड्डू तैयार करने की यह लंबी प्रक्रिया अब आमचलन में नहीं रही।

mahuwa ladoo recipe

महुआ लड्डू की खासियत

महुआ लड्डू प्राकृतिक रूप से आयरन, कैल्शियम, विटामिन और मिनरल्स से भरपूर होते थे। पुराने समय में ग्रामीण इसे ऊर्जा का मुख्य स्रोत मानते थे, जो सर्दियों के दिनों में शरीर को गर्म रखने और जोड़ों के दर्द जैसी समस्याओं में राहत देने का काम करते थे। इन्हें बनाने के लिए सूखे महुआ को अच्छी तरह साफ करके धीमी आंच पर भून लिया जाता था। इसके बाद भुने हुए महुआ और सफेद तिल या मूंगफली को दरदरा पीसकर पिघले हुए गुड़ में मिलाया जाता था। हल्का गर्म रहने पर ही इसके पौष्टिक लड्डू बांधे जाते थे।

इस विरासत को बचाने में लगा है झारखंड का यह गांव

भले ही यह व्यंजन बड़े शहरों या आम बाजारों से गायब हो गया हो, लेकिन झारखंड के बोकारो और गुमला के कुछ गांवों ने इस धरोहर को दोबारा जिंदा करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

jharkhand mahua ladoo

महुआ से लड्डू, खीर और अचार बनाकर ग्रामीण महिलाओं द्वारा इसे आजीविका का साधन भी बनाया जा रहा है, ताकि यह अनमोल परंपरा फिर से लोगों की थाली तक पहुंच सके।

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अगर आप पारंपरिक व्यंजनों के बारे में जानना चाहते हैं, जो गुमनाम जायका सीरीज को जरूर पढ़ें।  अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।

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