Chandra Grahan 2026: क्या चंद्र ग्रहण में मृत्यु होने पर बदल जाता है अंतिम संस्कार का तरीका?

हिंदू धर्म और ज्योतिष में चंद्र ग्रहण को एक संवेदनशील समय माना जाता है क्योंकि ऐसी मान्यता है कि इस दौरान प्रकृति में नकारात्मक ऊर्जा बढ़ जाती है। इसी कारण ग्रहण के समय 'सूतक' के नियमों का पालन किया जाता है और शुभ कार्यों पर रोक लगा दी जाती है। अगर इस दौरान किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो परिवार के लिए यह चिंता का विषय बन जाता है कि क्या इस अशुभ समय में अंतिम संस्कार करना सही होगा क्योंकि दाह संस्कार का मुख्य उद्देश्य आत्मा की शांति और मोक्ष सुनिश्चित करना होता है। आइये जानते हैं इस बारे में वृंदावन के ज्योतिषाचार्य राधाकांत वत्स से।
क्या ग्रहण काल में दाह संस्कार वर्जित है?
शास्त्रों के अनुसार, चंद्र ग्रहण के सूतक काल या ग्रहण की अवधि के दौरान दाह संस्कार करना पूरी तरह से वर्जित माना गया है। माना जाता है कि ग्रहण के समय यमलोक के द्वार और दैवीय शक्तियां एक विशेष स्थिति में होती हैं।
अगर इस नकारात्मक समय में अग्नि संस्कार किया जाए तो जीवात्मा को कष्ट हो सकता है और उसे उत्तम गति प्राप्त करने में बाधा आती है। इसलिए, अगर किसी की मृत्यु ग्रहण के दौरान होती है तो शव को सुरक्षित रखा जाता है और ग्रहण समाप्त होने की प्रतीक्षा की जाती है।

ग्रहण समाप्त होने के बाद की प्रक्रिया
जैसे ही चंद्र ग्रहण समाप्त होता है और मोक्ष काल आता है, उसके बाद ही अंतिम संस्कार की तैयारी शुरू की जाती है। लेकिन सीधे दाह संस्कार नहीं किया जाता। सबसे पहले पूरे घर और उस स्थान की शुद्धि की जाती है जहां शव रखा गया है। गंगाजल का छिड़काव करना अनिवार्य होता है ताकि ग्रहण की नकारात्मकता दूर हो सके। इसके बाद ही शव को अंतिम यात्रा के लिए ले जाया जाता है।
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पंचक और ग्रहण का विशेष मेल
कई बार चंद्र ग्रहण के साथ-साथ 'पंचक' का नक्षत्र भी लगा होता है। अगर ग्रहण और पंचक दोनों एक साथ हों, तो अंतिम संस्कार के नियम और भी कड़े हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में दाह संस्कार से पहले आटे या कुश के पांच पुतले बनाकर उनका भी शव के साथ विधि-विधान से पूजन और दाह किया जाता है। यह प्रक्रिया परिवार के अन्य सदस्यों को दोष से बचाने और मृतक की आत्मा को शांति दिलाने के लिए की जाती है।

सूतक काल में क्या करें?
सूतक काल में जब तक ग्रहण समाप्त नहीं होता तब तक परिवार के सदस्य मृतक के पास बैठकर भगवत गीता का पाठ या महामृत्युंजय मंत्र का जाप कर सकते हैं। यह वातावरण को शुद्ध रखता है और जीवात्मा को संबल प्रदान करता है।
ग्रहण के बाद नदी में स्नान करना या घर में शुद्धिकरण के बाद ही अग्नि संस्कार की अग्नि प्रज्वलित की जाती है। शास्त्रों में स्पष्ट है कि धैर्य और शुद्धि के साथ किया गया अंतिम संस्कार ही मोक्षदायी होता है।
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image credit: herzindagi
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