रक्षाबंधन पर हर साल बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं। इस त्योहार पर भाई-बहन के एक-दूसरे के लिए प्रेम और समर्पण के भाव को सेलिब्रेट किया जाता है। इस बार रक्षाबंधन स्वतंत्रता दिवस के साथ पड़ रहा है और यह एक खूबसूरत संयोग बना रहा है। रक्षाबंधन जहां भाई के साथ प्यार के बंधन को मजबूत बनाता है, वहीं स्वतंत्रता दिवस हमें देश की आजादी के साथ खुद अपनी आजादी के बारे में सोचने के लिए प्रेरित करता है। इस खास दिन के मद्देनजर हम आपके लिए एक स्पेशल सीरीज लेकर आए हैं 'बंधन नहीं आजादी' और इसके तहत हमने मशहूर थियेटर आर्टिस्ट और बॉलीवुड एक्ट्रेस लिलिट दुबे से खास बातचीत की। लिलिट से हमने रक्षाबंधन और महिलाओं की आजादी से जुड़े कई अहम सवाल किए। आइए जानते हैं उनके सवालों के जवाब-

सवाल: क्या अब रक्षाबंधन के बारे में नए नजरिए से सोचने का वक्त आ गया है? 

मैं सोच में बहुत पारंपरिक सोच की नहीं हूं। मैं अंधविश्वास और कर्मकांड में यकीन नहीं करती। मैं स्पिरिचुअल हूं, लेकिन मंदिर नहीं जाती हूं। मेरा मानना है कि हमें नए सिरे से सोचने की जरूरत है। हमारी परंपराएं 5000 साल पहले बनाई गईं। अगर हम इन्हें आज अपना रहे हैं तो चीजों को देखने का नजरिया भी आज का होना चाहिए। आमतौर पर जिस तरह लोग रक्षाबंधन के बारे में सोचते हैं, वैसे मैं नहीं सोचती। लेकिन मैं अपने भाई से बहुत प्यार करती हूं। मैं और मेरा भाई हम दोनों एक-दूसरे के बहुत क्लोज हैं, हम हर तरह की बात एक-दूसरे से शेयर करते हैं। मैं अपने भाई को राखी बांधती हूं तो इसका अर्थ ये नहीं है कि मैं पुराने तरीके से सोच रही हूं। राखी एक प्रतीक के तौर पर मुझे बहुत अपीलिंग लगती है।

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lillite dubey with aparna sen inside

मुझे राखी बांधना अच्छा लगता है, मेरा भाई मेरी बांधी राखी नहीं उतारता है। वह हमेशा मेरा साथ देने के लिए मेरा साथ खड़ा होता है। मैं उसे अपने रक्षक के तौर पर नहीं देखती हूं, खुद को एक कमजोर महिला के तौर पर नहीं देखती हूं। रक्षाबंधन ही नहीं, करवाचौथ है और भी बहुत सारे त्योहार हैं, जिन्हें मनाया जाता है। लेकिन महिलाओं को इन्हें अपने अनुसार देखने की जरूरत है। जरूरी नहीं कि वे परंपरागत तरीके से इसे देखें और वैसा ही नजरिया रखें। ये पूरी तरह से महिलाओं पर निर्भर करता है कि वे त्योहार किस तरह से मनाना चाहती हैं, रिश्तों को किस तरह से आगे ले जाना चाहती हैं। इन चीजों पर महिलाएं खुद अपने फैसले ले सकती हैं और उनके ऊपर किसी तरह का बंधन नहीं है। 

 
 
 
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सवाल: आपकी नजर में महिलाओं की आजादी के क्या मायने हैं?

lillete dubey bollywood actress inside

महिलाओं को सिर्फ एक चीज के बारे में सोचने की जरूरत है और वो है उनकी आर्थिक आजादी। जिस दिन महिला आर्थिक तौर पर आजाद होती है, उसे अपने फैसले के लिए किसी पर निर्भर होने की जरूरत नहीं होती। महिलाएं अपने खर्च खुद उठाएं। भाई-बहन, पिता, पति, किसी पर भी निर्भर नहीं रहें। आप सोच भी नहीं सकतीं कि अपने खर्च उठाने से महिलाएं किस हद तक आजाद महसूस करती हैं। लेकिन देश की आधी से ज्यादा महिलाओं के पास ये आजादी नहीं है।

lillete dubey bollywood actress with late husband inside

चाहें बात रिलेशनशिप की हो या काम की, हर जगह महिलाएं जो कदम उठाती हैं, वे मजबूरी में उठाती हैं, उनके पास कोई च्वॉइस नहीं है। अगर एक गरीब महिला को उसका पति शराब पीकर पीटता है तो वह पूरी तरह से असहाय हो जाती है। उसके मां-बाप उसे वापस नहीं लेते। उसके पास अपनी तरह से रहने के लिए पैसे नहीं है, इसीलिए वह ऐसी स्थितियों में रहने के लिए मजबूर हो जाती है। इसीलिए पढ़ाई-लिखाई और फाइनेंशियल इंडिपेंडेंस आजादी का आधार हैं। हालांकि इसके साथ भी कुछ समस्याएं आ जाती हैं, लेकिन इसमें महिलाएं मजबूर नहीं होतीं। 

सवाल: आपकी नजर में खुशी के मायने क्या हैं?

महिलाओं को खुद को दूसरों पर निर्भर नहीं बनाना चाहिए। अपनी शादी और दूसरी चीजों में भी आपको यह देखना चाहिए कि आप अपनी छोटी-छोटी जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं रहें। तभी आप खुश रह सकती हैं। हमारे आसपास के लोग हमारे बारे में क्या सोचते हैं, हमें कैसे देखते हैं, उससे इतर हमें ये देखना चाहिए कि हम अपना विकास कैसे करना चाहते हैं। इसी चीज में महिलाओं की खुशी छिपी होती है।

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सवाल: महिलाएं इमोशनल बंधनों से कैसे आजाद हो सकती हैं?

महिलाएं अक्सर अपनी लाइफ और अपनों से जुड़ी छोटी-छोटी चीजों को लेकर काफी ज्यादा इमोशनल होती हैं। महिलाओं को ये देखने की जरूरत है कि वे किसी चीज के लिए इतना भी ज्यादा भावुक ना हों कि उससे उन्हें तकलीफ हो।

सवाल: आप कौन से बंधनों के साथ खुश हैं?

बहुत से बंधन ऐसे भी होते हैं, जो इंसान के दिल के करीब होते हैं और जिनके होने का अहसास खुशी देता है। मेरे लिए प्यार का सबसे बड़ा बंधन है मेरी ग्रेंड डॉटर्स, जो मेरे दिल के करीब हैं। मैं अपनी पोतियों को खूब पैंपर करती हूं। मेरे लिए ये 'बंधन' नहीं है, क्योंकि मैं किसी तरह के दबाव में नहीं हूं। मेरे लिए यह अपनेपन का अहसास है। 

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सवाल: आपको अपनी जिंदगी में कौन से संघर्षों का सामना करना पड़ा?

मेरी मा गायनेकोलॉजिस्ट थीं, मेरे पिता इंजीनियर थे। जब मैंने कहा कि मुझे थियेटर करना है, तो मुझे इसका कोई विरोध नहीं करना पड़ा। थियेटर में चीजें उतनी प्रॉब्लमेटिक नहीं थीं, जितनी कि फिल्मों में। मैंने थियेटर में काम देरी से शुरू किया। मैं बहुत ज्यादा जरूरतमंद नहीं थी। अक्सर देखा जाता है कि महिलाएं जहां खुद को बहुत कमजोर दिखाती हैं, वहीं उनके साथ गलत होने का अंदेशा बढ़ जाता है। कभी लोगों ने कुछ गलत करने की कोशिश की तो मैंने वहीं उन्हें कड़ा संदेश दिया और बात को आगे नहीं बढ़ने दिया। इसीलिए मुझे बहुत ज्यादा संघर्ष नहीं करना पड़ा। हमारा समाज पुरुषवादी रहा है और मैंने इसे स्वीकार किया है। अक्सर परेशानी वहां भी आती है, जहां हम स्थितियों को स्वीकार नहीं कर पाते। जहां मेल एक्टर्स के लिए हमेशा काम आता था, वहीं मुझे काम के लिए काफी ज्यादा वेट करना पड़ता था। लेकिन इस दौरान मैंने बॉलीवुड के साथ-साथ और भी कई तरह का काम किया और मैं अपने काम से खुश हूं। मैं किसी पर निर्भर नहीं रही और यही मेरी खुशी का राज है।

सवाल: 'भारतीय सिनेमा की फर्स्ड लेडी' और महिला सशक्तीकरण की मिसाल देविका रानी पर आप प्ले लेकर आ रही हैं, जिसमें आपकी बेटी इरा दुबे लीड रोल में नजर आएंगे। इसके बारे में बताइए।

पुरुषवादी समाज में देविका रानी शक्ति और साहस का उदाहरण थीं। वह महिलाओं और पुरुष, दोनों के लिए बहुत बड़ी इंस्पिरेशन हैं। देविका रानी अपने समय से कहीं आगे थीं। वे धारा के खिलाफ चलने वालों में से थीं। उन्होंने जिस तरह से आगे बढ़ते हुए महिलाओं को सत्ता के शिखर पर पहुंचने का रास्ता दिखाया, वह अपने आप में काबिले-तारीफ है। उन्होंने उस समय में अपना स्टूडियो स्थापित किया, जब महिलाओं के लिए ऐसा करना कतई आसान नहीं था। देविका रानी ने अपने समय के सफल फिल्म निर्माता हिमांशु राय से शादी की थी। उन्हीं देविका रानी की कहानी को हम थिएटर के जरिए लोगों के सामने लेकर आना चाहते हैं।

सवाल: क्या महिलाओं की जिंदगी में पुरुष का होना जरूरी है?

मेरी मां ने मुझसे कहा था कि बच्चों के लिए लाइफ में पुरुष का होना जरूरी है। लेकिन मैं इसे जरूरी नहीं मानती। ये परंपरागत सोच है, लेकिन अब समय बदल गया है। अगर आपको बच्चा चाहिए तो आप बैंक से स्पर्म लेकर अपने बच्चे खुद पैदा कर सकती हैं और इसके लिए आपको पुरुष की जरूरत नहीं है। अगर आपको पुरुष का साथ अच्छा लगता है, अगर आपको उनके साथ वक्त गुजारना अच्छा लगता है, तब आपको उनके साथ होने के बारे में सोचना चाहिए। लेकिन अगर किसी तरह की मजबूरी हो तो यह चीज सही नहीं है। ये सोचना कि पुरुष के बगैर रहा नहीं जा सकता है, भी सही नहीं है। हालांकि जिंदगी में साथी का होना बहुत खूबसूरत अहसास है, लेकिन इसमें किसी तरह की जोर-जबरदस्ती नहीं है।

तो रिश्तों में प्यार और आजादी पर ये थे लिलिट दुबे के विचार। प्यार और बंधन पर आप और अपडेट्स पाना चाहती हैं तो विजिट करती रहें herzindagi