टमाटर को भारत में क्यों कहा जाता था 'विलायती बैंगन'? दिलचस्प है रसोई तक पहुंचने की कहानी
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हमारे यहां भारतीय घरों में टमाटर का इस्तेमाल खूब होता है। चाहे ग्रेवी को स्वादिष्ट बनाना हो, सब्जी में अच्छा फ्लेवर लाना हाे या सलाद की प्लेट सजानी हो, टमाटर हर जगह नजर आता है, लेकिन क्या आप जानती हैं कि एक समय ऐसा भी था जब लोग टमाटर खाने से डरते थे? इतना ही नहीं, इसे जहरीला सेब तक कहा जाता था। इंडिया में भी सह कोई देसी फल नहीं थी बल्कि विदेश से आई एक चीज थी, इसलिए कई जगहों पर इसे विलायती बैंगन या विलायती टमाटर भी कहा जाता था।
आज जाे टमाटर हमारी रसोई की शान बन चुका है, उसका भारत आने का सफर काफी दिलचस्प रहा है। साउथ अमेरिका से शुरू हुई इसकी कहानी यूरोप पहुंची थी और इसके बाद जाकर टमाटर भारत पहुंचा था। आइए जानते हैं इसका इतिहास-
कहां से शुरू हुई टमाटर की कहानी?
आपको बता दें कि टमाटर को लेकर अलग-अलग तरह की बातें बताई जाती हैं, लेकिन ऐसा कहा जाता है कि इसकी जड़ें साउथ अमेरिका से जुड़ी हुईं हैं। आज जिसे हम मेक्सिको और पेरू कहते हैं, सबसे पहले टमाटर की खेती यहीं की गई थी। वहीं पर आलू, मिर्च और तंबाकू जैसी फसलें भी उगाई जाती थीं। ऐसा भी कहा जाता है कि उस समय टमाटर आज जैसा नहीं था। उसका रंग लाल नहीं बल्कि पीला हुआ करता था। इसका साइज भी काफी छोटा होता था।
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फिर यूरोप कैसे पहुंचा टमाटर?
15वीं सदी के आखिरी में जब यूरोपियन खोजकर्ता अमेरिका पहुंचे, तब उन्हें कई नई फसलें देखने को मिलीं। माना जाता है कि क्रिस्टोफर कोलंबस के जरिए यूरोप के लोगों को टमाटर के बारे में जानकारी मिली थी इसके बाद धीरे-धीरे यह फसल यूरोप के अलग-अलग देशों तक पहुंच गई। हालांकि, शुरुआत में लोगों को यह समझ नहीं आ रहा था कि इसका इस्तेमाल कैसे किया जाए। इसलिए कई जगह इसे खाने की बजाय सजावट के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा।
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अलग-अलग देशों में मिले अलग नाम
टमाटर सिर्फ अपनी यात्रा की वजह से नहीं, बल्कि अपने नामों की वजह से भी चर्चा में रहा था। इटली और स्पेन में इसे पीला सेब कहा जाता था, क्योंकि शुरुआती टमाटरों का रंग पीला हुआ करता था। जबकि फ्रांस में इसे लव एप्पल कहा जाता था। वहीं जर्मनी में इसे स्वर्ग का सेब कहा जाता था। इससे पता चलता है कि अलग-अलग देशों ने इसे अपने हिसाब से पहचान दी।
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आखिर क्यों कहा गया 'जहरीला सेब'?
टमाटर के इतिहास का सबसे दिलचस्प हिस्सा यही है कि इसे जहरीला सेब भी कहा जाता था। 17वीं सदी में यूरोप के कई लोग टमाटर खाने से डरने लगे थे। उन्हें लगता था कि इसे खाने से बीमारी हो सकती है। असल में उस समय अमीर लोग जस्ते और सीसे वाली मेटल की प्लेटों में खाना खाते थे। दरअसल, टमाटर में नेचुरली एसिड होता है, ऐसे में जब इसे ऐसी प्लेटों में रखा जाता था, तो प्लेट के तत्व खाने में मिल जाता था।
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इससे लोग बीमार पड़ने लगे। लोगों को लगा कि परेशानी टमाटर की वजह से हो रही है, जबकि असली कारण प्लेट में मौजूद तत्व थे। इसी गलतफहमी के कारण टमाटर को जहरीला सेब कहा जाने लगा। दूसरी ओर, लकड़ी के बर्तनों में खाना खाने वाले लोगों को ऐसी समस्या नहीं हुई।
लोगों की सोच कब बदली?
समय के साथ इटली और स्पेन में टमाटर की बेहतर किस्में उगाई जाने लगीं। लोगों ने इसे अपने खाने में शामिल करना शुरू किया। धीरे-धीरे यह साफ हो गया कि टमाटर जहरीला नहीं है। इसके बाद इसकी पॉपुलैरिटी बढ़ती चली गई। यह यूरोप के कई देशों के खाने का अहम हिस्सा बन गया।
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भारत कैसे पहुंचा टमाटर?
भारत में टमाटर के आने का श्रेय आम तौर पर पुर्तगालियों को दिया जाता है। माना जाता है कि 16वीं सदी में जब पुर्तगाली व्यापारी भारत आए, तो वे अपने साथ टमाटर भी लेकर आए। भारत का मौसम इसफसल के लिए काफी अच्छा था। यहां टमाटर अच्छी तरह उगने लगा और धीरे-धीरे इसकी खेती बढ़ती गई।
आज रसोई की शान बन चुका है टमाटर
हालांकि, यह स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है कि भारत में सबसे पहले इसकी खेती कहां हुई थी, लेकिन कहा जाता है कि 19वीं सदी में टमाटर की खेती अंग्रेजों की जरूरतों को ध्यान में रखकर की जाती थी। अब आज टमाटर हमारी रसोई की पहचान बन चुका है।
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तो अगर आप भी अभी तक टमाटर को भारतीय मानती थीं, तो बता दें कि यह विलायती था। साथ ही अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।
डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी ऐतिहासिक संदर्भों, मीडिया रिपोर्टों और लोककथाओं से एकत्र की गई है। टमाटर के इतिहास और इसके विभिन्न नामों के बारे में दी गई सामग्री केवल ज्ञानवर्धक और मनोरंजनात्मक उद्देश्य के लिए है। हरजिंंदगी इसकी पुष्टि नहीं करती हे।
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