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ओपन एयर आर्ट गैलरी क्यों कहे जाते हैं दुर्गा पूजा के पंडाल, जानें इनके अनोखे थीम और क्राफ्ट की कहानी

आज से नवरात्रि‍ की शुरुआत हो चुकी है। वेस्‍ट बंगाल में इसकी रौनक खासतौर से देखने को म‍िलती हैं, लेक‍िन क्‍या आपने कभी साेचा है क‍ि इन्‍हें ओपन एयर आर्ट गैलरी क्‍यों कहा जाता है?
Updated:- 2026-10-11, 14:58 IST
durga puja pandals unique story

दुर्गा पूजा का नाम सुनते ही हमारे मन में ढोल-ढाक की आवाज, नए कपड़े, स्वादिष्ट खाना और बड़े-बड़े खूबसूरत पंडालों की तस्वीर ही घूमने लगती है। खासतौर पर वेस्‍ट बंगाल में दुर्गा पूजा की रौनक देखने लायक होती है। यहां पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है बल्कि यह कला, संस्कृति और खुशियों का एक बहुत बड़ा त्योहार है।

यहां पर दुर्गा पूजा के दौरान पूरा शहर एक खुली कला प्रदर्शनी (Open Air Art Gallery) जैसा दिखने लगता है। सड़कों पर चलते हुए आपको ऐसा लगेगा जैसे आप किसी बड़ी आर्ट गैलरी में घूम रही हैं। यही वजह है कि दुर्गा पूजा के इन खूबसूरत पंडालों को ओपन एयर आर्ट गैलरी कहा जाता है। इसकी खास बात यह है क‍ि UNESCO ने इसे अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (Intangible Cultural Heritage) का दर्जा भी दिया है। आज हम आपको अपने इस लेख में इसी बात की जानकारी दे रहे हैं। आइए जानते हैं-

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image credit- pexels

क्‍यों ओपन आर्ट गैलरी कहे जाते हैं दुर्गा पूजा के पंडालघ्‍

आमतौर पर जब हम किसी आर्ट गैलरी या म्यूजियम में जाते हैं, तो हमें पेंटिंग्स और मूर्तियां देखने के लिए टिकट खरीदना पड़ता है, लेकिन दुर्गा पूजा एक ऐसा त्योहार है जहां कोई अमीर हो या गरीब, हर कोई बिना एक भी पैसा खर्च किए दुनिया की सबसे बेहतरीन मूर्तियों को देख सकता है। लाखों लोग रातों को जगकर सड़कों पर पैदल घूमते हैं और खूबसूरत पंडालों और मां दुर्गा की मूर्तियों का दीदार करते हैं। इस दौरान पूरा शहर रोशनी से जगमगाया हुआ नजर आता है। हर गली कला का केंद्र बन जाती है।

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पारंपरिक पूजा से 'थीम पूजा' की अनोखी शुरुआत

पहले के समय में पंडाल बहुत नॉर्मल तरीके से कपड़े और बांस से बनाए जाते थे, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतती गया, 'थीम बेस्‍ड पूजा' का ट्रेंड बहुत तेजी से बढ़ा है। अब हर साल अलग-अलग क्लब और समितियां महीनों पहले से एक खास थीम ड‍िसाइड कर लेती हैं। यह थीम किसी सामाजिक मुद्दे, भारत की पुरानी ऐतिहासिक इमारतों, लोक कलाओं या फिर किसी काल्पनिक दुनिया पर हो सकती है। कलाकार इस थीम को ध्यान में रखकर ही दुर्गा पूजा के पंडाल की डेकोरेशन करते हैं और मूर्तियां भी इसी ह‍िसाब से बनाई जाती हैं।

नेचुरल और देसी चीजाें का होता है अनोखा इस्तेमाल

दुर्गा पूजा के पंडालों की सबसे खास बात यही है क‍ि इन्हें बनाने में इको-फ्रेंडली चीजों का ही इस्‍तेमाल होता है। कलाकार

  • बांस
  • जूट
  • सूती धागे
  • नारियल के छिलके
  • मिट्टी के मटके
  • लकड़ी
  • कांच
  • अनाज के दानों

से इतने सुंदर पंडाल तैयार करते हैं कि देखने वाले हैरान रह जाते हैं।

हजारों कलाकारों की मेहनत का र‍िजल्‍ट

आपको बता दें क‍ि एक खूबसूरत पंडाल के पीछे सैकड़ों कलाकार, मूर्तिकार, डिजाइनर और मजदूरों की महीनों की दिन-रात की मेहनत होती है। कारीगर महीनों पहले से मिट्टी से मां दुर्गा की भव्य मूर्तियां बनाने लगते हैं।

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यूनेस्को की सांस्कृतिक विरासत की मान्यता

दुर्गा पूजा की इसी कलात्मकता, भव्यता और लोगों के आपसी कनेक्‍शन को देखते हुए UNESCO ने इसे अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (Intangible Cultural Heritage) की सूची में शामिल किया है।

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