आज हर नुक्कड़ पर मिलता है बर्गर, क्या आप जानती हैं भारत में कैसे हुई इसकी एंट्री?

आज भारत के हर शहर, छोटे-बड़े कस्बे और यहां तक कि हर नुक्कड़ की दुकान पर बर्गर बहुत आसानी से मिल जाता है। बच्चों की बर्थडे पार्टी हो, दोस्तों के साथ हैंगआउट करना हो या हल्की-फुल्की भूख मिटानी हो, बर्गर हर किसी की पहली पसंद बन चुका है। मगर क्या आपने कभी सोचा है कि अमेरिका और पश्चिमी देशों की पहचान माना जाने वाला बर्गर भारत में कब और कैसे आया?
भारत में बर्गर की एंट्री कैसे हुई?
बर्गर का इतिहास 1970 के दशक से शुरू हुआ है। दिल्ली के प्रसिद्ध निरूलाज रेस्तरां को भारत में पहला देसी फास्ट-फूड और बर्गर लाने का श्रेय दिया जाता है। 1977 में निरूलाज ने अपने मेन्यू में बर्गर शामिल किया। उस समय यह अमीरों और युवाओं के लिए नया और विदेशी स्नैक हुआ करता था।

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भारत में मैकडॉनल्ड्स की एंट्री कब हुई?
भारत में बर्गर को हर आम नागरिक तक पहुंचाने और इसे घर-घर का नाम बनाने का काम मैकडॉनल्ड्स ने किया। 13 अक्टूबर 1996 को मैकडॉनल्ड्स ने अपना पहला भारतीय आउटलेट दिल्ली में खोला। यह पहला मौका था जब किसी बड़े इंटरनेशनल फास्ट-फूड जायंट ने भारत के बाजार में इसे लेकर आया।
भारत में बर्गर का सफर
भारत में बर्गर का सफर कई दशकों में तय हुआ। नीचे दी गई टेबल से आसानी से समझिए कि विदेशी फास्ट फूड कैसे आज मशहूर व्यंजन बन गया है।
साल |
क्या हुआ? |
1980 के दशक |
बड़े शहरों में बर्गर की पहचान बढ़नी शुरू हुई |
1996 |
भारत में पहला आउटलेट खोला |
2000 के बाद |
कई अंतरराष्ट्रीय और भारतीय ब्रांड बाजार में आए |
2010 के बाद |
ऑनलाइन फूड डिलीवरी से बर्गर की लोकप्रियता बढ़ी |
आज |
बर्गर छोटे शहरों और स्थानीय दुकानों तक पहुंच चुका है |
विदेशी बर्गर में कब आया देसी अवतार?
विदेशों में बर्गर की पहचान मुख्य रूप से बीफ और पॉर्क पैटी से होती है। मगर भारत में कदम रखते ही विदेशी कंपनियों के सामने दो सबसे बड़ी मुश्किल का सामना किया है। पहला ये कि भारत में हिंदू समुदाय में गाय को पवित्र माना जाता है और मुस्लिम समुदाय में सूअर का मांस प्रतिबंधित है।
दूसरा भारत में एक बहुत बड़ी आबादी पूरी तरह शाकाहारी है। इस वजह से मैकडॉनल्ड्स ने अपनी ग्लोबल पॉलिसी में इतिहास का सबसे बड़ा बदलाव किया और भारत में बिना बीफ और पॉर्क के मेन्यू लॉन्च किया।

आलू टिक्की ने बदली बर्गर की कहानी
भारतीय खान-पान के चटपटे और मसालेदार स्वाद को ध्यान में रखते हुए मैकालू टिक्की बर्गर पेश किया गया। भारत के हर नुक्कड़ पर बिकने वाले समोसे और आलू की टिक्की के स्वाद को बर्गर के बन के बीच में रखा गया। साथ ही शाकाहारी और मांसाहारी खाना पकाने के लिए किचन, बर्तन और तेल तक पूरी तरह अलग कर दिए गए। यह स्ट्रटैजी इतनी कामयाब रही कि आलू टिक्की बर्गर भारत का सबसे लोकप्रिय स्नैक बन गया।

स्ट्रीट फूड से लेकर नुक्कड़ तक कैसे पहुंचा बर्गर?
अब सवाल आता है कि जब बड़े ब्रांड ने अपना दबदबा बना रखा था, तो फिर बर्गर स्ट्रीट फूड में कैसे शामिल हुआ? मैकडॉनल्ड्स और निरूलाज के बाद कई और बड़े ब्रांड्स भारत आए। मगर असली बदलाव तब आया जब स्थानीय रेस्तरां और स्ट्रीट फूड वालों ने इसे अपना लिया। स्थानीय दुकानों ने 20 से 40 रुपये में स्ट्रीट स्टाइल बर्गर बेचना शुरू किया। फिर क्या था बर्गर में इंडियन और वेस्टर्न टच देकर पूरी तरह देसी जायका दे दिया।
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विदेशी संस्कृति से आया बर्गर आज भारत के स्ट्रीट फूड का अहम हिस्सा बन चुका है। भारत की जरूरतों और स्वाद के हिसाब से खुद को ढालने के कारण ही यह पश्चिमी स्नैक आज हर नुक्कड़ पर आसानी से और कम दाम में मिल जाता है।
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