मऊ में जहां कभी महकती थी गुड़-सोंठ की खुशबू, अब इतिहास में सिमट गई 'गोंठा की भेली'

उत्तर प्रदेश के मऊ जिले में एक समय ऐसा भी था जब सर्दियों की हवाओं में गुड़ और सोंठ की सोंधी खुशबू दूर-दूर तक महकती थी। यहां के रानीपुर क्षेत्र में स्थित गोंठा गांव अपनी विशेष गोंठा की भेली के लिए पूरे इलाके में जाना जाता था। गन्ने के रस में सोंठ और मसालों का यह अनूठा मेल न सिर्फ खाने में बेहद स्वादिष्ट होता था बल्कि सेहत के लिए भी किसी वरदान से कम नहीं था। पारंपरिक कोल्हू और मिट्टी की भट्टियों पर पकने वाला यह शुद्ध गुड़ अपने अनोखे स्वाद के कारण लोगों की पहली पसंद हुआ करता था। मगर आज यह प्रसिद्ध परंपरा और इसकी मिठास धीरे-धीरे समय के आगोश में गुम होकर इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह गई है। नीचे लेख में जानें खासियत-
गोंठा गांव और गुड़ उद्योग की पुरानी रौनक
गोंठा गांव में गुड़ और भेली बनाने का काम किसी एक परिवार का नहीं बल्कि पूरे गांव का मुख्य व्यवसाय हुआ करता था। सर्दियों के आते ही यहां के किसानों के खेत गन्ने की लहलहाती फसल से भर जाते थे। बैल से चलने वाले पारंपरिक कोल्हू और बड़े-बड़े कड़ाकों में गन्ने के रस को उबालकर गुड़ तैयार किया जाता था।

इस प्रक्रिया में सोंठ और अन्य पारंपरिक मसालों का सही अनुपात मिलाया जाता था, जिससे बनने वाली सोंठ वाली भेली की खुशबू पूरे इलाके में फैल जाती थी। इसमें किसी भी तरह के हानिकारक केमिकल्स या रंग का इस्तेमाल नहीं होता था, जिसकी वजह से इसकी शुद्धता की चर्चा दूर-दूर के जिलों तक होती थी।
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आसपास के बाजारों में थी भारी मांग
उस दौर में गोंठा की भेली की मांग केवल मऊ जिले तक सीमित नहीं थी बल्कि पड़ोसी जिलों के व्यापारी भी विशेष तौर पर इसे खरीदने आते थे। स्थानीय बाजारों और साप्ताहिक हाटों में इस गुड़ की अलग ही मांग रहती थी। लोग सर्दियों के दिनों में खांसी-जुकाम और सेहत को दुरुस्त रखने के लिए खासतौर पर इसी सोंठ वाली भेली को प्राथमिकता देते थे।
इस उद्योग से जुड़े किसानों और स्थानीय कारीगरों को अच्छी आमदनी हो जाती थी, जिससे गोंठा गांव की आर्थिक स्थिति और पहचान दोनों मजबूत थीं। यह उत्पाद स्थानीय संस्कृति और स्वाद की एक अनमोल पहचान बन चुका था।
क्यों बंद हो गईं गुड़ की भट्ठियां?
समय के बदलाव के साथ आधुनिकता की आंधी ने इस पारंपरिक कुटीर उद्योग को चोट पहुंचाई। बड़े पैमाने पर स्थापित आधुनिक चीनी मिलों और बाजार में सस्ते, सफेद चीनी के आने से लोगों का रुझान बदला। इसके अलावा, गुड़ पकाने के लिए जरूरी ईंधन यानी खोई और लकड़ी की बढ़ती कीमतों ने उत्पादन लागत को बढ़ा दिया।

गन्ने की खेती के तरीकों में बदलाव और भारी मेहनत के मुकाबले उचित मुनाफा न मिलने के कारण स्थानीय किसानों और कारीगरों का इस काम से मोहभंग होने लगा। नई पीढ़ी ने इस पुश्तैनी और थकाऊ काम को आगे बढ़ाने से किनारा कर लिया, जिसके चलते धीरे-धीरे एक-एक करके सारी भट्ठियां हमेशा के लिए शांत हो गईं।
यादों में सिमट कर रह गया इतिहास
आज स्थिति यह है कि गोंठा की भेली का वह अतीत केवल बुजुर्गों की यादों या कहानियों में ही जिंदा बचा है। जहां कभी गुड़ की मिठास और खुशबू से पूरा गांव महकता रहता था। वहां अब पुरानी और टूटी-फूटी भट्ठियों के अवशेष ही नजर आते हैं। हालांकि, आज भी जब पुराने लोग उस दौर के स्वाद को याद करते हैं, तो उनकी जुबान पर गोंठा की सोंधी भेली की मिठास तैर जाती है।
यदि समय रहते इस तरह की पारंपरिक और स्वदेशी विधाओं को बचाने के लिए सरकारी प्रोत्साहन या सहायता नहीं मिली, तो हमारी आने वाली पीढ़ियां इस बेहतरीन सांस्कृतिक और खान-पान की विरासत को कभी जान नहीं पाएंगी।
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