Sat Sep 12, 2026 | Updated 02:15 PM IST

मजबूरी में बनी थी भारत की पहली 'टॉय ट्रेन', अंग्रेजों से जुड़ा है इसका द‍िलचस्‍प किस्सा

ह‍िल स्‍टेशनों पर ट्र‍िप पर जाने वाले लोग टॉय ट्रेन का मजा जरूर लेते हैं, लेक‍िन क्‍या आप जानती हैं क‍ि भारत की पहली टॉय ट्रेन कब, कहां और कैसे बनी थी?
Updated:- 2026-09-12, 12:55 IST
history of toy train

आज के समय में जब भी हम टॉय ट्रेन का नाम सुनते हैं तो आंखों के सामने पहाड़ों के शानदार नजारे और उसके बीच धीरे-धीरे चलती हुई छोटी ट्रेन का ही ख्‍याल आता है। पर क्या आप जानती हैं कि इसका इतिहास अंग्रेजों से जुड़ा है? उस जमाने में पहाड़ों पर जाना बहुत मुश्किल होता था। सिर्फ पैदल, घोड़े या पालकी का ही ऑप्शन था। ऐसे में पहाड़ों को काटकर रेल लाइन बनाना बहुत बड़ी बात थी।

इसी कोशिश में इस छोटी रेल लाइन का जन्म हुआ, जिसे आगे चलकर टॉय ट्रेन कहा गया। बताया जाता है क‍ि भारत की पहली टॉय ट्रेन दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे सिलीगुड़ी से दार्जिलिंग के बीच चली थी, जो आज भी कायम है। आज हम आपको अपने इस लेख में इसकी कहानी बताने जा रहे हैं। आइए जानते हैं-

history of toy train (1)

Image Credit- Adobe stock

भारत में टॉय ट्रेन की शुरुआत कैसे हुई?

भारत में ट्रेन की शुरुआत 1853 में हुई थी। इसके बाद देश के कोने-कोने को रेल नेटवर्क से जोड़ने का काम तेजी से शुरू हुआ, लेकिन सबसे बड़ी सिरदर्दी पहाड़ों को लेकर थी। पहाड़ी इलाकों में पटरियां बिछाना कोई बच्चों का खेल नहीं था। उस जमाने में पहाड़ों पर आने-जाने के लिए सिर्फ घोड़े, पालकी या पैदल चलने का ही ऑप्शन था। इसी प्रॉब्लम को सॉल्व करने के लिए ब्रिटिश इंजीनियर्स ने पहाड़ों को काटकर रेल लाइन निकालने का प्लान बनाया और बस यहीं से भारत में खूबसूरत टॉय ट्रेनों का दौर शुरू हुआ।

यह भी पढ़ें- Bharat Gaurav Train: भारतीयों के लिए बेहद खास है भारत गौरव ट्रेन, जानें इससे जुड़े कुछ दिलचस्प तथ्य

पहाड़ों के बीच बनाई गई छोटी रेल लाइन

आपको बता दें क‍ि जहां नॉर्मल रेल लाइन बनाना लगभग नामुमकिन था, वहां छोटी यानी नैरो गेज की पटरियां बिछाई गईं। ये ट्रेनें ढलानों पर आसानी से चढ़ सकें, इसके लिए रास्ते में जि‍ग-जैग ट्रैक, लूप्स और ढेरों पहाड़ काटकर बनाई गई सुरंगें शामिल की गईं। इनकी स्पीड बहुत ही स्‍लो रखी गई और रास्ते में छोटे-छोटे स्टेशन बनाए गए, ताकि सफर सुरक्षित रहे। ऐसे में पहाड़ों के खूबसूरत नजारों के बीच जब ये ट्रेन चली तो लोगों को सहूल‍ियत हुई। इस तरह भारत को अपनी पहली टॉय ट्रेन मिल गई जिसे हम दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे (Darjeeling Himalayan Railway) के नाम से जानते हैं।

यह भी पढ़ें- इस पक्षी की चोंच जैसा है बुलेट ट्रेन का डिजाइन, क्या आप जानती हैं इसका नाम?

4 जुलाई 1881 को पटरी पर उतरी थी पहली ट्रेन

बताया जाता है क‍ि दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे की शुरुआत 4 जुलाई 1881 को सिलीगुड़ी से दार्जिलिंग के बीच हुई थी। यह पहाड़ों में बनी भारत की सबसे पहली रेल लाइनों में से एक है। इसके शुरू होने से पहाड़ों का मुश्किल सफर आसान हो गया था। जिस रास्ते पर जाने के लिए कभी लोगों को पैदल, घोड़े या पालकी का सहारा लेना पड़ता था, वहां लोग आराम से ट्रेन से जाने लगे। सिलीगुड़ी और दार्जिलिंग के बीच चलने वाली यह ऐतिहासिक ट्रेन आज भी उतनी ही खास है।

history of toy train (2)

Image Credit- Shutterstock

अंग्रेजों ने अपने फायदे के लिए बनाई थी यह ट्रेन

टॉय ट्रेन के इत‍िहास की बात करें तो यह भी काफी द‍िलचस्‍प है। इसे वहां के लोगों की भलाई के लिए नहीं बल्कि अंग्रेजों ने अपनी जरूरतों के लिए बनाया था। बताया जाता है क‍ि मैदानी इलाकों की भीषण गर्मी से बचने के लिए अंग्रेज दार्जिलिंग जैसे हिल स्टेशनों पर भागते थे। इसके अलावा चीन से ब‍िजनेस बंद होने के बाद ब्रिटिश सरकार ने असम और दार्जिलिंग में बड़े पैमाने पर चाय के बागान लगाए। इन बागानों से चाय की सप्लाई और आने-जाने का रास्ता आसान बनाने के लिए पहाड़ों पर रेल लाइन ब‍िछाई गई थी।

यह भी पढ़ें- रेलवे के वो ऐतिहासिक स्टेशन जहां से सुलगी थी आजादी की चिंगारी

नाम पड़ा 'टॉय ट्रेन', पर क्यों?

अब सवाल यह आता है कि इसे 'टॉय ट्रेन' क्यों कहा जाने लगा? दरअसल, आम ट्रेनों के मुकाबले इन ट्रेनों के डिब्बे, इंजन और पटरियां बहुत छोटी थीं। दिखने में यह बिल्कुल खिलौने जैसी लगती थी। इसी वजह से वहां के लोगों ने इसे मजाक-मजाक में टॉय ट्रेन कहना शुरू कर दिया था। धीरे-धीरे यही नाम पॉपुलर हो गया और आज पूरी दुनि‍या में इन पहाड़ी ट्रेनों को टॉय ट्रेन के नाम से ही जाना जाता है।

न्यू जलपाईगुड़ी से दार्जिलिंग तक होता है रोमांचक सफर

दार्जिलिंग टॉय ट्रेन की राइड न्यू जलपाईगुड़ी से शुरू होती है, जो समुद्र तल से सिर्फ 100 मीटर की ऊंचाई पर है। यहां से ट्रेन धीरे-धीरे पहाड़ों पर चढ़ना शुरू करती है और 2,200 मीटर की ऊंचाई पर बसे दार्जिलिंग तक जाती है। जैसे-जैसे ट्रेन सुकना स्टेशन पहुंचती है, नजारे खूबसूरत होते चले जाते हैं। इसके बाद घने जंगलों, ऊंचे पेड़ों और हसीन वादियों से होती हुई ट्रेन रंगटोंग पहुंचती है।

यह भी पढ़ें- कांच की छत और 180 डिग्री व्यू, पढ़ें रेलवे का 'Vistadome Coach' क्यों है खास?

अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।

Image Credit- Magnific

FAQ
भारत में कुल कितनी टॉय ट्रेन हैं?
भारत में दार्जिलिंग के अलावा नीलगिरी, कालका-शिमला, माथेरान और कांगड़ा घाटी में कुल 5 प्रमुख टॉय ट्रेन चलती हैं, जो काफी मशहूर हैं।
दार्जिलि‍ंग टॉय ट्रेन को यूनेस्को टैग कब मिला?
दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे को उसकी अनोखी बनावट और इतिहास के कारण साल 1999 में यूनेस्को (UNESCO) ने वर्ल्ड हेरिटेज साइट घोषित किया था।
दार्जिलिंग टॉय ट्रेन का सबसे ऊंचा स्टेशन कौन सा है?
इस रूट पर 'घूम' (Ghoom) स्टेशन सबसे ऊंचाई पर है। यह समुद्र तल से लगभग 2,258 मीटर ऊपर स्थित भारत का सबसे ऊंचा रेलवे स्टेशन है।
Disclaimer

हमारा उद्देश्य अपने आर्टिकल्स और सोशल मीडिया हैंडल्स के माध्यम से सही, सुरक्षित और विशेषज्ञ द्वारा वेरिफाइड जानकारी प्रदान करना है। यहां बताए गए उपाय, सलाह और बातें केवल सामान्य जानकारी के लिए हैं। किसी भी तरह के हेल्थ, ब्यूटी, लाइफ हैक्स या ज्योतिष से जुड़े सुझावों को आजमाने से पहले कृपया अपने विशेषज्ञ से परामर्श लें। किसी प्रतिक्रिया या शिकायत के लिए, compliant_gro@jagrannewmedia.com पर हमसे संपर्क करें।