आषाढ़ गुप्त नवरात्रि के छठे दिन करें छिन्नमस्ता स्तोत्र का पाठ, मां का मिलेगा आशीर्वाद

गुप्त नवरात्रि के छठे मां छिन्नमस्ता की पूजा की जाती है, इस दिन पूजन के बाद पूरे मन से छिन्नमस्ता स्तोत्र का पाठ करने मनुष्यों को अनकों लाभ मिलते हैं।

 
Chinnamasta Worship
Chinnamasta Worship

आज गुप्त नवरात्रि का छठवां दिन है और इस दिन मां छिन्नमस्ता की पूजा की जाती है। पूरे विधि विधान से पूजा करने के बाद मां छिन्नमस्ता को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद पाने के लिए छिन्नमस्ता स्तोत्र का पाठ जरूर करें। हमारे एस्ट्रो एक्सपर्ट शिवम पाठक ने बताया है कि मां छिन्नमस्ता करुणामयी हैं और नीचे बताए गए विधि से पाठ करने से मां अपने भक्तों पर प्रसन्न होती हैं।

छिन्नमस्ता स्तोत्र पाठ विधि

Chinnamasta Puja Vidhi

तैयारी:

स्नान कर साफ कपड़े पहनें।

एक शांत स्थान पर छिन्नमस्ता देवी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। फूल, धूप, और दीपक रखें।

संकल्प (प्रण लेना):

पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।

मन को शांत कर एक संकल्प लें कि आप विशेष उद्देश्य से पाठ कर रहे हैं।

आवाहन:

भगवान गणेश का आवाहन करें: "ॐ गण गणपतये नमः" तीन बार उच्चारण करें।

ध्यान:

छिन्नमस्ता देवी के स्वरूप का ध्यान करें।

स्तोत्र पाठ:

पूरे मनोयोग और भक्ति के साथ छिन्नमस्ता स्तोत्र का 11, 21, या 108 बार पाठ करें।

समापन:

देवी को धन्यवाद दें, आरती करें और प्रसाद अर्पित करें। ध्यान में कुछ क्षण बिताएं।

इसे भी पढ़ें: Ashadha Gupt Navratri 2024 Laung Ke Upay: आषाढ़ गुप्त नवरात्रि में करें लौंग के ये उपाय, क्रोधी ग्रहों का नहीं पड़ेगा बुरा असर

छिन्नमस्ता स्तोत्र

Chinnamasta Benefits

आनन्दयित्रि परमेश्वरि वेदगर्भे मातः पुरन्दरपुरान्तरलब्धनेत्रे ।

लक्ष्मीमशेषजगतां परिभावयन्तः सन्तो भजन्ति भवतीं धनदेशलब्ध्यै ॥ 1॥

लज्जानुगां विमलविद्रुमकान्तिकान्तां कान्तानुरागरसिकाः परमेश्वरि त्वाम् ।

ये भावयन्ति मनसा मनुजास्त एते सीमन्तिनीभिरनिशं परिभाव्यमानाः ॥ 2॥

मायामयीं निखिलपातककोटिकूटविद्राविणीं भृशमसंशयिनो भजन्ति ।

त्वां पद्मसुन्दरतनुं तरुणारुणास्यां पाशाङ्कुशाभयवराद्यकरां वरास्त्रैः ॥ 3॥

ते तर्ककर्कशधियः श्रुतिशास्त्रशिल्पैश्छन्दोऽ- भिशोभितमुखाः सकलागमज्ञाः ।

सर्वज्ञलब्धविभवाः कुमुदेन्दुवर्णां ये वाग्भवे च भवतीं परिभावयन्ति ॥ 4॥

वज्रपणुन्नहृदया समयद्रुहस्ते वैरोचने मदनमन्दिरगास्यमातः ।

मायाद्वयानुगतविग्रहभूषिताऽसि दिव्यास्त्रवह्निवनितानुगताऽसि धन्ये ॥ 5॥

वृत्तत्रयाष्टदलवह्निपुरःसरस्य मार्तण्डमण्डलगतां परिभावयन्ति ।

ये वह्निकूटसदृशीं मणिपूरकान्तस्ते कालकण्टकविडम्बनचञ्चवः स्युः ॥ 6॥

कालागरुभ्रमरचन्दनकुण्डगोल- खण्डैरनङ्गमदनोद्भवमादनीभिः ।

सिन्दूरकुङ्कुमपटीरहिमैर्विधाय सन्मण्डलं तदुपरीह यजेन्मृडानीम् ॥ 7॥

चञ्चत्तडिन्मिहिरकोटिकरां विचेला- मुद्यत्कबन्धरुधिरां द्विभुजां त्रिनेत्राम् ।

वामे विकीर्णकचशीर्षकरे परे तामीडे परं परमकर्त्रिकया समेताम् ॥ 8॥

कामेश्वराङ्गनिलयां कलया सुधांशोर्विभ्राजमानहृदयामपरे स्मरन्ति ।

सुप्ताहिराजसदृशीं परमेश्वरस्थां त्वामाद्रिराजतनये च समानमानाः ॥ 9॥

लिङ्गत्रयोपरिगतामपि वह्निचक्र- पीठानुगां सरसिजासनसन्निविष्टाम् ।

सुप्तां प्रबोध्य भवतीं मनुजा गुरूक्तहूँकारवायुवशिभिर्मनसा भजन्ति ॥ 10॥

शुभ्रासि शान्तिककथासु तथैव पीता स्तम्भे रिपोरथ च शुभ्रतरासि मातः ।

उच्चाटनेऽप्यसितकर्मसुकर्मणि त्वं संसेव्यसे स्फटिककान्तिरनन्तचारे ॥ 11॥

त्वामुत्पलैर्मधुयुतैर्मधुनोपनीतैर्गव्यैः पयोविलुलितैः शतमेव कुण्डे ।

साज्यैश्च तोषयति यः पुरुषस्त्रिसन्ध्यं षण्मासतो भवति शक्रसमो हि भूमौ ॥ 12॥

जाग्रत्स्वपन्नपि शिवे तव मन्त्रराजमेवं विचिन्तयति यो मनसा विधिज्ञः ।

संसारसागरसमृद्धरणे वहित्रं चित्रं न भूतजननेऽपि जगत्सु पुंसः ॥ 13॥

इयं विद्या वन्द्या हरिहरविरिञ्चिप्रभृतिभिः पुरारातेरन्तः पुरमिदमगम्यं पशुजनैः ।

सुधामन्दानन्दैः पशुपतिसमानव्यसनिभिः सुधासेव्यैः सद्भिर्गुरुचरणसंसारचतुरैः ॥ 14॥

कुण्डे वा मण्डले वा शुचिरथ मनुना भावयत्येव मन्त्री संस्थाप्योच्चैर्जुहोति प्रसवसुफलदैः पद्मपालाशकानाम् ।

हैमं क्षीरैस्तिलैर्वां समधुककुसुमैर्मालतीबन्धुजातीश्वेतैरब्धं सकानामपि वरसमिधा सम्पदे सर्वसिद्ध्यै ॥ 15॥

अन्धः साज्यं समांसं दधियुतमथवा योऽन्वहं यामिनीनां मध्ये देव्यै ददाति प्रभवति गृहगा श्रीरमुष्यावखण्डा ।

आज्यं मांसं सरक्तं तिलयुतमथवा तण्डुलं पायसं वा हुत्वा मांसं त्रिसन्ध्यं स भवति मनुजो भूतिभिर्भूतनाथः ॥ 16॥

इदं देव्याः स्तोत्रं पठति मनुजो यस्त्रिसमयं शुचिर्भूत्वा विश्वे भवति धनदो वासवसमः ।

वशा भूपाः कान्ता निखिलरिपुहन्तुः सुरगणा भवन्त्युच्चैर्वाचो यदिह ननु मासैस्त्रिभिरपि ॥ 17॥

॥ इति श्रीशङ्कराचार्यविरचितः प्रचण्डचण्डिकास्तवराजः समाप्तः ॥

इसे भी पढ़ें: Ashadha Gupt Navratri 2024: गुप्त नवरात्रि के नौ दिन जलाएं ये नौ तरह के दीए, मिलेंगे शुभ परिणाम

छिन्नमस्ता स्तोत्र पाठ का लाभ

  • आध्यात्मिक उन्नति: उच्च आध्यात्मिक अवस्थाएँ प्राप्त होती हैं।
  • सुरक्षा: नकारात्मक ऊर्जाओं और दुष्ट बलों से रक्षा होती है।
  • साहस और शक्ति: आंतरिक शक्ति और साहस बढ़ता है।
  • इच्छाओं पर नियंत्रण: आत्म-संयम और पवित्रता में वृद्धि होती है।
  • स्वास्थ्य लाभ: शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है।
  • सफलता और समृद्धि: जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सफलता और समृद्धि प्राप्त होती है।
  • मानसिक शक्तियों में वृद्धि: अंतर्ज्ञान और मानसिक क्षमताओं में वृद्धि होती है।

अगर आपको यह स्टोरी अच्छी लगी हो तो इसे फेसबुक पर शेयर और लाइक जरूर करें। इसी तरह के और भी आर्टिकल पढ़ने के लिए जुड़े रहें हर जिंदगी से। अपने विचार हमें आर्टिकल के ऊपर कमेंट बॉक्स में जरूर भेजें।

Image Credit: saitharunvs

HerZindagi Video

HzLogo

HerZindagi ऐप के साथ पाएं हेल्थ, फिटनेस और ब्यूटी से जुड़ी हर जानकारी, सीधे आपके फोन पर! आज ही डाउनलोड करें और बनाएं अपनी जिंदगी को और बेहतर!

GET APP