शारदीय नवरात्रि के दूसरे दिन देवी दुर्गा के दूसरे स्वरूप ब्रह्मचारिणी देवी की पूजा की जाती है। देवी दुर्गा के इस स्वरूप का संबंध मंगल से है। शारदीय नवरात्रि 2021 अब शुरू हो चुकी है और इस समय सभी 9 दिनों का खास महत्व है और इनकी खासियत के बारे में हम आपसे चर्चा भी करेंगे। अगर आपकी कुंडली में मंगल दोष है तो देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा करने से आपके समस्त मंगल दोष दूर हो जाते हैं। 

नवरात्रि के दूसरे दिन की सिर्फ इतनी ही खासियत नहीं है। अगर आपको कोई रोग बहुत समय से सता रहा है तो वह भी दूर हो जाता है। आपके अंदर आत्मविश्वास, आत्मबल बढ़ता। इसके लिए मां की पूजा की सही विधि के बारे में आपको पता होना चाहिए और शुभ मुहूर्त के बारे में भी जानकारी होनी चाहिए। तो चलिए हम आपको बताते हैं कि नवरात्रि के दूसरे दिन यानि 8 अक्‍टूबर 2021 को आपको क्या करना चाहिए। 

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maa brahmacharini

किस राशि के लिए है लाभदायक 

अगर आपकी राधि वृषभ या तुला है तो आपको तो आपको देवी ब्रह्मचारिणी की अराधना जरूर करनी चाहिए। आपको हमेशा देवी को पंचामृत का भोग लगाना चाहिए। साथ ही देवी जी को पान-सुपाड़ी खिलानी चाहिए। इससे देवी प्रसन्न होती हैं। अगर आप देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा करती हैं तो इससे आपको लंबी आयु का वरदान प्राप्त होता है। माता के कौन से रूप को कौन सा भोग लगाया जाता है

शुभ मुहूर्त 

देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा का शुभ मुहूर्त 8 अक्टूबर 2021, शुक्रवार को राहु काल प्रात: 10 बजकर 40 मिनट से दोपहर 12 बजकर 08 मिनट तक रहेगा। 

नवरात्रि 2021 के दूसरे दिन का शुभ रंग- 

अगर आप देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा कर रही हैं तो आपको हमेशा नीले रंगे कपड़े पहन कर देवी जी की पूजा करनी चाहिए। इससे आपको बहुत लाभ मिलेगा। 

कैसे करें पूजा 

देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा फूल, अक्षत, रोली, चंदन आदि से होती है। आप देवी ब्रह्मचारिणी की तस्वीर को पहले दूध, दही, घृत, मधु व शर्करा स्नान कराएं। इसके बाद आपको देवी जी को पिस्ते की बनी मिठाई भोग में चढ़ानी चाहिए। अगर आप पूरी आस्था के साथ देवी जी की पूजा अर्चना करेंगी तो आपका मन हमेशा ही शांत और प्रसन्न रहेगा। पूजा के साथ ही आपको देवी जी का मंत्र भी जपना चाहिए। नवरात्रि में सेंधा नमक क्‍यों खाना चाहिए?

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ॐ देवी ब्रह्मचारिणी नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

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मां ब्रह्मचारिणी की कथा

पूर्वजन्म में देवी ब्रह्मचारिणी ने हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया था। तब उन्हें शैलपुत्री कहा गया था। अपने दूसरे जन्म में नारदजी के उपदेश से भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए देवी ब्रह्मचारिणी ने  घोर तपस्या की थी। इस कठिन तपस्या के कारण उन्हें नाम से जाना गया। देवी ब्रह्मचारिणी एक हजार वर्ष तक केवल फल-फूल रहीं। इतना ही नहीं उन्होंने खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के घोर कष्ट सहे।

कठिन तपस्या के कारण देवी का शरीर एकदम क्षीण हो गया। तब भगवान शिव जी प्रकट हुए और उन्हें वरदान दिया कि अगले जन्म में वह उन्हे पत्नी के रूप में स्वीकार करेंगे।  मां की इस कथा का यही सार है कि जीवन के कठिन संघर्षों में भी मन विचलित नहीं होना चाहिए। तब ही आप अपने लक्ष्य को प्राप्त कर पाएंगे।

आपकी नवरात्रि मंगलमय हो इसकी हम कामना करते हैं। अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़े रहें हरजिंदगी से।