Fri Sep 11, 2026 | Updated 11:47 PM IST

अंगूठी के छेद से गुजर जाती थी 6 गज की यह साड़ी, शाही घराने की पहली पसंद था यह कपड़ा

अंगूठी के छेद से बाहर निकल जाने वाली ढाका की मखमली मलमल कभी दुनिया भर के शाही घरानों की पहली पसंद हुआ करती थी। 6 गज की यह साड़ी अपनी अद्भुत महीनता और बनावट के लिए जानी जाती थी।
Updated:- 2026-07-16, 08:36 IST
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साड़ी के कपड़े की वैरायटी की बात आने पर बनारसी सिल्क, कांजीवरम, चंदेरी, जॉर्जेट, शिफॉन, कॉटन, ओर्गेंजा और बांधनी का नाम लिया जाता है। मगर क्या आपको ढाका मलमल के बारे में पता है? इस कपड़े की खास बात यह थी कि इसे पूरी तरह समेटकर एक अंगूठी के छेद से निकाला जा सकता था। इसी बनावट और कोमलता के कारण यह कपड़ा दुनिया भर के शाही घरानों की पहली पसंद बना हुआ था। मुगल सम्राटों से लेकर यूरोप के राजा-रानी तक इसके दीवाने थे। आज के इस लेख में हम आपको इस कपड़े के बारे में बताने जा रहे हैं।

अंगूठी से गुजरने वाला कपड़ा कौन सा है?

अगर कोई यह कहे कि यह कपड़ा अंगूठी के अंदर से पूरा निकल जाता है, तो इस बात पर यकीन करना मुश्किल हो जाता है। मगर यह सच है, इस कपड़े का नाम ढाका की मलमल यानी ढाका मुसलीन है। ढाका की मलमल इतनी बारीक होती थी कि 6 गज लंबी पूरी साड़ी को समेटकर हाथ की एक अंगूठी के छेद से आसानी से पार कराया जा सकता था। पूरी की पूरी साड़ी इतनी कोमल और हल्की होती थी कि इसे मोड़कर एक छोटी सी माचिस की डिब्बी में भी बंद किया जा सकता था।

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मुगलों से लेकर यूरोपीय राजघरानों तक का सफर

इस मलमल की इसी खूबी के कारण दुनिया भर के शाही घरानों में इसकी भारी मांग थी। मुगल काल में तो यह कपड़ा प्रतिष्ठा और अमीरी का प्रतीक बन चुका था। इसकी तरलता और खूबसूरती को देखकर इसे बहती हवा, ओस की बूंदें और बहता पानी जैसे शायराना नाम दिए गए थे। आगे चलकर यह यूरोप के शाही घरानों की भी पहली पसंद बना। फ्रांस की महारानी जोसफिन (नेपोलियन की पत्नी) इस मलमल की मुरीद थीं।

मलमल को बनाने के लिए खास कपास का किया जाता है इस्तेमाल

मलमल को बनाने के लिए ढाका में मेघना नदी के किनारे उगने वाली एक खास कपास फूटी कार्पास का इस्तेमाल किया जाता था। इसके रेशे इतने महीन होते थे कि मशीनों से इनकी कताई असंभव थी। बुनकर केवल सुबह और शाम के समय, जब हवा में सबसे ज्यादा नमी होती थी। इसके बाद इन नाजुक धागों की कताई करते थे और एक-एक साड़ी को बनाने में कई महीनों का वक्त और मेहनत लगती थी।

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लुप्त हो गया यह कपड़ा

ब्रिटिश शासन के दौरान, मशीनी कपड़ों को बढ़ावा देने और भारतीय वस्त्र उद्योग को खत्म करने की दमनकारी नीतियों के कारण यह दुर्लभ कला धीरे-धीरे लुप्त हो गई। आज भले ही वह मूल मलमल हमारे बीच नहीं है, लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप के वस्त्र इतिहास में इसके किस्से सुनने को मिल जाते हैं।

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Image Credit- Gemini

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