300 साल पुराना इतिहास और पारसी-मुगल आर्ट का फ्यूजन, इस वजह से खास है 'कच्छ की एम्ब्रॉयडरी'
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गुजरात का कच्छ सिर्फ अपने सफेद रण, ऊंट और रंग-बिरंगी संस्कृति के लिए ही नहीं फेमस है बल्कि यहां की एम्ब्रॉयडरी भी दुनिया भर में अपनी एक अलग पहचान रखती है। कच्छ की कढ़ाई को देखकर पहली नजर में ही समझ आ जाता है कि यह कोई आम हस्तकला (हैंडमेड) नहीं है। चमकते शीशे, बारीक टांके, गहरे रंग और बहुत ही खूबसूरत डिजाइन इसकी खासियत को और बढ़ा देते हैं।
दिलचस्प बात तो यह है कि कच्छ की एम्ब्रॉयडरी सिर्फ एक कला नहीं बल्कि यहां रहने वाले अलग-अलग समुदायों की पहचान भी है। हर पैटर्न, हर रंग और हर टांका अपने साथ एक कहानी लेकर चलता है। माना जाता है कि यह परंपरा सैकड़ों साल पुरानी है और समय के साथ इसमें कई संस्कृतियों की कहानी भी जुड़ती चली गई। यही वजह है कि आज कच्छ की एम्ब्रॉयडरी को भारत की सबसे अनोखी टेक्सटाइल कलाओं में गिना जाता है। आइए इसका खूबसूरत और दिलचस्प इतिहास जानते हैं-
300 साल से भी पुरानी है यह कला
कच्छ एम्ब्रॉयडरी, जिसे गुजरात के लोग 'कच्छी भरत' भी कहते हैं, का इतिहास करीब 300 साल या उससे भी ज्यादा पुराना बताया जाता है। हालांकि इसके कुछ डिजाइन और प्रतीकों की जड़ें इससे भी पुराने हैं। अगर आप गुजरात गईं होंगी तो मालूम होगा कि कच्छ हमेशा से बिजनेस और संस्कृति का केंद्र रहा है। समुद्री रास्तों से यहां अफ्रीका, मिडिल एशिया, सिंध और मिडिल ईस्ट के लोगों का आना-जाना होता था। इसी वजह से यहां की कला में अलग-अलग संस्कृतियों की झलक देखने को मिलती है।
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पारसी और मुगल कला का भी दिखता है असर
कच्छ की कढ़ाई में सिर्फ गुजरात की संस्कृति ही नहीं, बल्कि पारसी और मुगल कला की छाप भी साफ दिखाई देती है। कई डिजाइन फूल-पत्तियों, महलों, मेहराबों और सजावटी से प्रेरित हैं। यही कारण है कि कच्छ की एम्ब्रॉयडरी में ट्रेडिशनल और रॉयल दोनों की ही झलक दिखती है। इसके लिए ऐसे रंगों का इस्तेमाल किया जाता है जो इसकी खूबसूरती को चार गुना बढ़ा देते हैं। इनमें डार्क रेड, हरा, इंडिगो, पीला, काला और आइवरी जैसे रंग शामिल हैं।
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शीशे का काम होता है सबसे अलग
कच्छ की एम्ब्रॉयडरी की सबसे बड़ी पहचान उसका मिरर वर्क ही है। छोटे-छोटे शीशों को कपड़े पर बहुत ही खूबसूरत तरीके से सजाया जाता है। पहले गांव की महिलाएं इन शीशे वाली कढ़ाइयों को अपने परिवार और खास मौकों के लिए बनाती थीं। अगर यहां काेई शादी-ब्याह, त्योहार या कोई धार्मिक कार्यक्रम है तो इन्हीं कपड़ों का इस्तेमाल किया जाता था। खास बात तो यह है कि शुरू में यह कला व्यापार के लिए नहीं बनाई गई थी बल्कि परिवार और समाज की जरूरतों को देखकर बनाई गई थीं।

हर समुदाय की है अपनी अलग पहचान
आपको बता दें कि कच्छ में अलग-अलग समुदायों के लोग रहते हैं। इन सभी की अपनी खास एम्ब्रॉयडरी शैली है। रबारी, अहीर, जाट, मुतवा और कई दूसरे समुदायों की कढ़ाई एक-दूसरे से अलग ही होती है। इनमें ये शामिल हैं-
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- सूफ एम्ब्रॉयडरी: सूफी एम्ब्राॅयडरी को बनाना सबसे कठिन माना जाता है। इसमें डिजाइन पहले से नहीं बनाया जाता। जो भी कारीगर होते हैं, वह अपने एक्सपीरियंस से कपड़े के पीछे कढ़ाई करते हैं।
- खारके एम्ब्रॉयडरी: यह पूरी तरह से ज्यामितीय पैटर्न पर बना होता है। इसमें चौकोर और सीधी लाइने बनाई जाती हैं और पूरे कपड़े को कढ़ाई से भर दिया जाता है।
- पाको एम्ब्रॉयडरी: पाको का मतलब होता है मजबूत या ठोस। इसमें फूल और नेचुरल डिजाइन बनाए जाते हैं। यह शैली अपने साफ-सुथरे और घने टांकों के लिए पहचानी जाती है।
- रबारी एम्ब्रॉयडरी: रबारी समुदाय की कढ़ाई अपने बड़े मिरर वर्क और चमकीले रंगों के लिए फेमस है। इस शैली में समय के साथ बदलाव भी देखने को मिले हैं और आज भी इसमें नए-नए डिजाइन जुड़ते रहे हैं।
मोची समुदाय से भी जुड़ी है कहानी
माना जाता है कि कच्छ एम्ब्रॉयडरी को इतना फेमस बनाने में मोची समुदाय का सबसे बड़ा हाथ था। यह समुदाय खासतोर से जूते बनाने का काम करता था, लेकिन बाद में उन्होंने शाही परिवारों के लिए कपड़े और सजावटी सामान भी तैयार करनी शुरू कर दीं। इसी दौरान कढ़ाई की यह कला और निखरती चली गई।
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सिर्फ कढ़ाई ही नहीं, पूरा टेक्सटाइल हब है कच्छ
आपको बता दें कि कच्छ की पहचान केवल एम्ब्रॉयडरी से ही नहीं है। यहां अजरख प्रिंट, बंधनी, बाटिक प्रिंट, काला कॉटन बुनाई और मशरू जैसे कई पारंपरिक टेक्सटाइल भी बनाए जाते हैं। अजरख प्रिंट की ज्यामितीय डिजाइन (Geometric Design) और नेचुरल कलर आज भी दुनिया भर में पसंद किए जाते हैं। वहीं बंधनी की कला 12वीं सदी से चली आ रही है।
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महिलाओं ने संभालकर रखी है यह विरासत
कच्छ की एम्ब्रॉयडरी को आगे बढ़ाने में महिलाओं की सबसे बड़ी भूमिका रही है। गांवों की महिलाएं अपने एक्सपीरियंस, कल्पना और हुनर से हर कढ़ाई को अलग पहचान देती हैं। यही वजह है कि यहां पर सभी कारीगरों का काम अलग दिखाई देता है। आज कच्छ की एम्ब्रॉयडरी भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी पसंद की जाती है।
कच्छ की एम्ब्रॉयडरी सिर्फ धागों और कपड़े का खेल नहीं है। यह इतिहास, संस्कृति, समुदाय और कला का ऐसा मेल है जो 300 साल बाद भी अपनी चमक बनाए हुए है। शायद यही वजह है कि कच्छ की इस रंगीन कढ़ाई को देखकर हर कोई इसकी खूबसूरती का दीवाना हो जाता है।
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Source-
- https://www.incredibleindia.gov.in/en/gujarat/dwarka/kutch-embroidery
- https://kachchh.nic.in/handicraft/
Image Credit- gemini/incredible india
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