Sita Navami 2024: भारत में यहां स्थित है माता सीता के फेमस मंदिर, दर्शन के लिए हर दिन लगती है श्रद्धालुओं की भीड़

देशभर में मां सीता के कई ऐसे मंदिर हैं, जो इतिहास को दर्शाते हैं। यह मंदिर ऐसे हैं, जहां आपको हर दिन हजारों लोग दर्शन के लिए आते हैं। इन मंदिरों से आपको रामायण के रहस्यों को भी जानने का मौका मिलेगा। इसी तरह भारत में एक ऐसा खास मंदिर भी है, जहां मां सीता के साथ उनके जुड़वे पुत्र लव-कुश की भी पूजा होती है।
ऐसे ही कई खास मंदिरों के बारे में हम आज के इस आर्टिकल में विस्तार से जानकारी देंगे। सीता नवमी 2024 पर आप यहां जा सकते हैं। इस साल सीता नवमी 16 मई को मनाई जाएगी।
सीता देवी मंदिर, केरल

वायनाड में स्थित मां सीता का यह खास मंदिर हरे-भरे पौधों और पेड़ों से गिरा हुआ है। यह भारत के सबसे दुर्लभ मंदिरों में से एक है। यहां मंदिर में आपको लव और कुश की मूर्तियां भी देखने को मिलेंगी। इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यह शांत वातावरण में स्थित इसिलए। यहां पूजा के लिए आने वाले भक्तों को बेहद सुकून का अहसास होता है। मंदिर को सीता देवी लव कुश मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।
- समय- सुबह 5:00 बजे - दोपहर 12:30 बजे तक
- शाम 5:30 बजे - शाम 7:30 बजे
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सीता गुफा, महाराष्ट्र
नासिक में स्थित माता सीता के इस मंदिर के बारे में आप रामायण कथा में भी पढ़ सकते हैं। नासिक के पंचवटी में स्थित इस मंदिर को सीता गुफा के नाम से इसलिए जाना जाता है, क्योंकि यहां माता सीता वनवास के दौरान भगवान राम के साथ रही थीं। इस जगह पर आपको पांच पवित्र बरगद के पेड़ भी देखने को मिलेंगे। इसलिए ही इस जगह को पंचवटी के नाम से जाना जाता है। गुफा में जाने के लिए आपको सीढ़ियों से होकर गुजरना होगा।
- समय- सुबह 6:00 बजे से शाम 9:00 बजे तक।
- कैसे पहुंचे- नासिक रेलवे स्टेशन गुफा केवल 5 किमी दूर है।
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इस मंदिर मे भगवान राम के बिना होती है मां सीता की पूजा

मध्यप्रदेश के अशोकनगर जिले के करीला में स्थित मां सीता को समर्पित एक सबसे खास मंदिर है। भारत में यह सबसे अलग और खास मंदिर इसलिए माना जाता है, क्योंकि यहां श्री राम के बिना ही माता सीता को पूजा जाता है। इस मंदिर में माता सीता अपने दोनों पुत्रों के साथ विराजमान हैं। यह भारत में फेमस माता सीता के मंदिर में से एक है।
माना जाता है कि जब भगवान राम ने माता सीता का त्याग कर दिया था, तब वह यही आकर रह रही थी। माता सीता ने अपने आगे का जीवन, वन में स्थित महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में गुजारा था।
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