Thu Oct 8, 2026 | Updated 12:26 AM IST
मां शैलपुत्री चालीसा

मां शैलपुत्री चालीसा

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श्री गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल। विघ्न हरण मंगल मूरति, जय जय गिरिजा लाल॥

॥ चौपाई ॥

जय गिरिराजकुमारि जगत जननी।   सकल सृष्टि पालक भवानी भवानी॥   जय शैलपुत्री माता महिमा अपार।   जो कोई तुमको ध्यावत भव भव पार॥   चंद्रार्ध मस्तक विराजत सुभ गंगा।   तुमहि देखि हरषत हिय शिव संगा॥   वाहन वृषभ राजत छवि निराली।   सोहत रूप मातु शिव की ललाली॥   कहत अष्टमां महिमा अमृत वाणी।   महिमा अपरम्पार विधि न जानी॥   कली कालक पाप हटावनि हरता।   संतन प्रभु प्रीति प्रभु भवानी करता॥   जो कोई तुहि ध्यावत रुधि रासि भवानी।   सकल सृष्टि पालक दुर्गा भवानी॥   गौरी शंकर संग विराजति सुहावनि।   मंगल कारण काली माई कहलावनि॥   ध्यान धरत जो कोई नर भवानी।   सकल सृष्टि में होत सुबानी॥   श्री शैलपुत्री चालीसा का पाठ।   करत ध्यान जस आपनि दास॥   विनय राम दास मनु प्रीतम भवानी।   तासु ध्यान से सकल सृष्टि भवानी॥

नवरात्रि के पहले दिन (प्रतिपदा) देवी दुर्गा के पहले रूप मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है।  

||1. मां शैलपुत्री के रंग, भोग और मंत्र||

  • प्रिय रंग: देवी के इस रूप का प्रिय रंग ‘पीला’ है। यह रंग उत्साह, समृद्धि और आनंद का प्रतीक है। 
  • भोग: माता शैलपुत्री को शुद्ध गाय का घी या गाय के घी से बनी मिठाइयां जैसे हलवा या पेड़ा चढ़ाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि घी अर्पण करने से आरोग्य और निरोगी शरीर का आशीर्वाद मिलता है।
  • स्वरूप: देवी का यह स्वरूप अर्धचंद्र के साथ सजा रहता है। इनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं में कमल का फूल होता है। माता शैलपुत्री का वाहन वृषभ (बैल) है और इसी वजह से इन्हें  'वृषारूढ़ा' कहते हैं। 
  • विशेषता: ऐसी मान्यता है कि देवी के इस स्वरूप को शुद्ध घी चढ़ाने से बीमारियां दूर होती हैं। इनकी पूजा से पर्वत चुनौतियों व संकटों के दौरान मन पर्वत की तरह शांत रहता है। वहीं, इनकी साधना करने से मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति मिलती है। मनचाहे जीवनसाथी के लिए भी इनकी पूजा लाभदायक मानी जाती है

2. पूजा का शुभ मुहूर्त 

  • कलश स्थापना की तारीख:  11 अक्टूबर 2026 (रविवार)
  • घटस्थापना का मुहुर्त: सुबह 06:10 बजे से लेकर 10:09 बजे तक

अभिजीत मुहूर्त (वैकल्पिक): सुबह 11:45 बजे से लेकर दोपहर 12:33 बजे तक

3. कलश स्थापना और पूजा की विधि‍ 

  • स्नान- सुबह जल्दी उठकर नहा लें और पीले या लाल रंग के नए या साफ कपड़े पहनें।
  • सफाई- पूजा घर या जिस जगह कलश स्थापना करनी है उसकी सफाई करके गंगाजल से शुद्ध करें। कोशिश करनी चाहिए कि कलश स्थापना घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) में हो। 
  • चौकी स्थापना- एक लकड़ी की चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछा लें और उसपर मां दुर्गा की मुर्ति या फोटो रखें। 
  • जौ बोन- मिट्टी के साफ बर्तन में मिट्टी भरकर उसमें जो बोएं।
  • कलश स्थापना- तांबे या मिट्टी के कलश में गंगाजल, सुपारी, सिक्के, अक्षत और दुर्वा डालें। कलश के ऊपर आम या अशोक की पत्तियां रखें। एक नारियल पर लाल चुनरी या कलावा बांधकर उसे कलश के ऊपर रखें। 
  • अखंड दीपक व आरती- देवी के सामने देसी घी का दिया जलाएं, धूप-दीप दिखाकर भोग लगाएं। फल-फूल चढ़ाकर आरती करें।

4. देवी के मंत्र 

  • मूल मंत्र

ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः॥

  • प्रार्थना एवं ध्यान मंत्र
  • प्रार्थना:

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।

वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥-

  • ध्यान:

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।

वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥

पुण्याम्बरपरिधानां नवदुर्गा रूपाम्।

ललाट वरदाप्रदां शैलपुत्रीं नामाभ्यहम्॥

5. व्रत के नियम 

क्या करें?

  • सात्विक जीवन: 9 दिनों तक मन, वचन और कर्म से शुद्धता और ब्रह्मचर्य का पालन करें।

  • सात्विक आहार: फलाहार में कूटू का आटा, सिंघाड़े का आटा, साबूदाना, मखाना, दूध, दही, फल और सेंधा नमक का सेवन करें।
  • जमीन पर सोना: व्रत के दौरान जमीन पर बिस्तर लगाकर सोना अच्छा माना जाता है।

क्या न करें?

  • तामसिक भोजन वर्जित: लहसुन, प्याज, मांस, मदिरा और साधारण नमक का सेवन न करें।
  • बाल व नाखून काटना: नवरात्रि के दौरान बाल, दाढ़ी और नाखून काटने से बचें।
  • अन्न का सेवन: यदि आप निर्जला या फलाहारी व्रत हैं, तो अनाज (गेहूं, चावल, दाल) न खाएं।
  • क्रोध व निंदा: घर में कलह, झूठ बोलना या किसी की बुराई करने से बचें।
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