Thu Oct 8, 2026 | Updated 07:35 PM IST
शिव चालीसा

शिव चालीसा

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॥ दोहा ॥

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान ।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान ॥

॥ चौपाई ॥

जय गिरिजा पति दीन दयाला ।
सदा करत सन्तन प्रतिपाला ॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके ।
कानन कुण्डल नागफनी के ॥
अंग गौर शिर गंग बहाये ।
मुण्डमाल तन क्षार लगाए ॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे ।
छवि को देखि नाग मन मोहे ॥
मैना मातु की हवे दुलारी ।
बाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी ।
करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥
नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे ।
सागर मध्य कमल हैं जैसे ॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ ।
या छवि को कहि जात न काऊ ॥
देवन जबहीं जाय पुकारा ।
तब ही दुख प्रभु आप निवारा ॥
किया उपद्रव तारक भारी ।
देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥
तुरत षडानन आप पठायउ ।
लवनिमेष महँ मारि गिरायउ ॥
आप जलंधर असुर संहारा ।
सुयश तुम्हार विदित संसारा ॥
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई ।
सबहिं कृपा कर लीन बचाई ॥
किया तपहिं भागीरथ भारी ।
पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥
दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं ।
सेवक स्तुति करत सदाहीं ॥
वेद नाम महिमा तव गाई।
अकथ अनादि भेद नहिं पाई ॥
प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला ।
जरत सुरासुर भए विहाला ॥
कीन्ही दया तहं करी सहाई ।
नीलकण्ठ तब नाम कहाई ॥
पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा ।
जीत के लंक विभीषण दीन्हा ॥
सहस कमल में हो रहे धारी ।
कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी ॥
एक कमल प्रभु राखेउ जोई ।
कमल नयन पूजन चहं सोई ॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर ।
भए प्रसन्न दिए इच्छित वर ॥
जय जय जय अनन्त अविनाशी ।
करत कृपा सब के घटवासी ॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै ।
भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै ॥
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो ।
येहि अवसर मोहि आन उबारो ॥
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो ।
संकट से मोहि आन उबारो ॥
मात-पिता भ्राता सब होई ।
संकट में पूछत नहिं कोई ॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी ।
आय हरहु मम संकट भारी ॥
धन निर्धन को देत सदा हीं ।
जो कोई जांचे सो फल पाहीं ॥
अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी ।
क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥
शंकर हो संकट के नाशन ।
मंगल कारण विघ्न विनाशन ॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं ।
शारद नारद शीश नवावैं ॥
नमो नमो जय नमः शिवाय ।
सुर ब्रह्मादिक पार न पाय ॥
जो यह पाठ करे मन लाई ।
ता पर होत है शम्भु सहाई ॥
ॠनियां जो कोई हो अधिकारी ।
पाठ करे सो पावन हारी ॥
पुत्र हीन कर इच्छा जोई ।
निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई ॥
पण्डित त्रयोदशी को लावे ।
ध्यान पूर्वक होम करावे ॥
त्रयोदशी व्रत करै हमेशा ।
ताके तन नहीं रहै कलेशा ॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे ।
शंकर सम्मुख पाठ सुनावे ॥
जन्म जन्म के पाप नसावे ।
अन्त धाम शिवपुर में पावे ॥
कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी ।
जानि सकल दुःख हरहु हमारी ॥

॥ दोहा ॥

नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा।
तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश ॥
मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान ।
अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण ॥
भगवान शिव को समर्पित प्रमुख दिन और व्रत
महाशिवरात्रि सबसे प्रमुख शिव पर्व
सावन सोमवार  सावन में शिव भक्ति
प्रदोष व्रत त्रयोदशी का व्रत
मासिक शिवरात्रि हर महीने शिव आराधना
सोलह सोमवार 16 सोमवार का व्रत
सोमवती अमावस्या सोमवार को पड़ने वाली अमावस्या

श्रावण मास के विशेष दिन

सावन सोमवार शिव पूजा और व्रत
नाग पंचमी नाग देवता और शिव पूजा
श्रावण शिवरात्रि  जलाभिषेक और रात्रि पूजा
श्रावण प्रदोष शिव-पार्वती की स्‍पेशल पूजा
श्रावण पूर्णिमा श्रावण मास का समापन

भगवान शिव के व्रत के नियम


स्नान करके भगवान शिव की पूजा करें।
सबसे पहले शिवलिंग पर जल, दूध और बेलपत्र अर्पित करें।
''ॐ नमः शिवाय'' का जाप करें।
अपनी परंपरा के अनुसार फलाहार या सात्विक भोजन करें।
व्रत के दौरान मांसाहार और नशे से बचें।
मन, वचन और कर्म में संयम बनाए रखें।
कोई भी स्वास्थ्य संबंधी समस्या होने पर कठोर उपवास न करें।
व्रत का पारण अपनी परंपरा के अनुसार करें।

FAQ

सावन में शिव चालीसा का पाठ करने से भगवान शिव की भक्ति, कृपा और आशीर्वाद प्राप्‍त होता है। धार्मिक मान्‍यता के अनुसार, ऐसा करने से मन को शांति, सकारात्‍मकता और आध्‍यात्मिक संतोष मिलता है।
श्रद्धा से शिव चालीसा का पाठ करने से मन को शांति और सकारात्मकता मिलती है। इससे भगवान शिव के प्रति भक्ति और विश्वास बढ़ता है और भक्त को आध्यात्मिक शक्ति और संतोष का अनुभव होता है। पाठ से संकट और बाधाओं से मुक्ति की प्रार्थना की जाती है। ऐसा भगवान शिव की भक्ति और स्मरण के लिए किया जाता है।

शिव चालीसा में भगवान शिव के अनेक स्वरूपों, गुणों और महिमा का वर्णन मिलता है:

  • नीलकंठ और जटाधारी शिव: भगवान के दिव्य स्वरूप का वर्णन
  • चंद्रशेखर: मस्तक पर चंद्रमा धारण करने वाले
  • नागभूषण: सर्प को आभूषण के रूप में धारण करने वाले
  • गंगाधर: जटाओं में मां गंगा को धारण करने वाले
  • त्रिनेत्रधारी: तीन नेत्रों वाले शिव
  • योगी और तपस्वी: ध्यान और तप में लीन रहने वाले
  • करुणामय और भक्तवत्सल: भक्तों पर कृपा करने वाले
  • संकटमोचन और विघ्नहर्ता: संकट और बाधाओं को दूर करने वाले
  • रौद्र और संहारक स्वरूप: अधर्म और बुराई का नाश करने वाले
  • कल्याणकारी और मंगलकारी: भक्तों का कल्याण करने वाले
शिव चालीसा का पाठ सुबह स्रान के बाद या शाम को प्रदोष काल में करना शुभ माना जाता है। हालांकि, भगवान शिव की भक्ति में श्रद्धा और नियमितता को महत्व दिया जाता है, इसलिए अपनी सुविधानुसार किसी भी समय में पाठ कर सकते हैं।
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गणेश जी से हनुमान जी तक, सभी प्रसिद्ध चालीसाओं का पावन संग्रह अब एक ही स्थान पर। इनके पाठ से भक्ति का अनुभव करें, मन को शांति दें और अपनी श्रद्धा को दें एक नया आयाम।

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