Thu Oct 8, 2026 | Updated 12:25 AM IST
चंद्रघंटा चालीसा

चंद्रघंटा चालीसा

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चंद्रघंटा मां कल्याणी पावन है शुभ नामगौरा गिरजा रूप हैतीसरा सुन लो ज्ञानचंद्रघंटा माता कल्याणी।ममतामई माता वरदानी।।गिरजा का ही रूप कहावे।मैया भक्तों को अति भावे।।साहस सब में देवी भरती।संत जनों की रक्षा करती।।देवों को विपदा से बचाया।हाथों में था शस्त्र उठाया।।वाहन सिंह की करे सवारी।रौद्र रूप की महिमा भारी।।कर में चक्र सुदर्शन धारी।पापी रण में सकल पछाड़े।।दुर्गा का भी रूप कहावे।भक्तों की रक्षा को आवे।।रण में भरती मा हुंकारा।बल जग में है जिसका न्यारा।।त्रेता में जब संकट छाया।रौद्र रूप तब तुमने दिखाया।।इंद्र सिंहासन असुरन छीना।सोर बहुत सब हीने कीन्हा।।महिषासुर दानव एक भारी।देवों की सेना थी पछाड़ी।।देवों ने तब ध्यान लगाया।शिव ने शक्ति पुंज बनाया।।गौरा ने तब रूप था धारा।दुर्गा का कीन्हा विस्तारा।।कर में तब घंटी थी सुहाई।चंद्र घंटा मां तब कहलाई।।घंटा रण में मात बजाया।असुरन को तब मार गिराया।।देवी ने हुंकार भरी थी।साहस की ललकार भरी थी।।महिषासुर का मर्दन कीन्हा।मैया ने संकट हर लीन्हा।।धर्म ध्वजा जग में लहरावे।देवता सार थे हरसावे।।चंद्रघंटा देवी थी कहावे।दुर्गा बनके शक्ति दिखावे।।रण में सारे असुर पछाड़े।अस्त्र शस्त्र से दानव मारे।।ग्रंथ कहे ऐसी भी कहानी।संतो मुनियों ने है जानी।।शिव जो हिमालय नगरी आए।।भूत प्रेत और गण भी लाए।अति भयंकर रूप विशाला।।कोई मोटा और कोई काला।देख के मुर्च्छित हो गई मैना।भय से व्याकुल रोते नैना।।देवी को ढंग समझ ना आया।गौरा धारी थी तब काया।।गौरा ने तब शक्ति दिखाई।चंद्र घंटा तब बनी महामाई।।घंटा भारी तब था बजाया।शिव के गणों को डरा भगाया।।शिव ने जब था रूप निहारा।जाना शक्ति सकल पसारा।।तब देवी चंद्रघंटा कहावे।वार इनका सुहावे।।कर में घंटी शोभित इनकी।रूप पे सब है मोहित जिनकी।।सिंह सवारी मात को प्यारी।शोभित वृषभ की भी है सवारी।।तीसरे दिन जो व्रत को धारे।मैया सारे काज संवारे।।देवी दुर्गा मात कहावे।अभय मुद्रा में बड़ी सुहावे।।जन-जन चोला लाल चढ़ावे।मैया से आशीष भी पावे।।फल फूलों से सजता द्वारा।लगता द्वारा सबसे न्यारा।।चंद्र घंटा देवी कल्याणी।सुख से भरती मां वरदानी।।मैया मंगल करने वाली।सुख से झोली भरने वाली।।करती सबकी पूर्ण आशा।मन में भरती है विश्वासा।।चालीसा जो इनका गाता।वो जन तो भव से तर जाता।।देवी सबके दुखड़े हरती।सुख से सबकी झोलियां भरती।।चंद्र घंटा चालीसा का इतना ही है सारयप्रेम से जो पड़ता जन है मैया कर भव से पार।।
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