महिलाएं जब अपने सामने आने वाली बड़ी-बड़ी चुनौतियों से हार मानने के बजाय उनका डटकर सामना करती हैं और कामयाबी हासिल करती हैं, तो वे अन्य महिलाओं के लिए एक बड़ी इंस्पिशन बन जाती हैं। ऐसी ही इंस्पायरिंग लेडी हैं जागरण प्रकाशन लिमिटेड की प्रेसिडेंट अपूर्वा पुरोहित। पैशनेट और अपने काम में पूरी तरह से डेडिकेटेड। अपूर्वा पुरोहित बिजनेस वर्ल्ड की सबसे पावरफुल 50 महिलाओं की लिस्ट में शुमार होने के साथ देश की सबसे कद्दावर महिलाओं में से एक हैं। एंटरटेनमेंट वर्ल्ड के टॉप ब्रांड्स के साथ काम कर चुकी अपूर्वा पुरोहित 30 वर्षों से इस फील्ड में हैं। अपूर्वा लीडर, थिंकर, ऑथर, पायनियर और सही मायनों में एक रोल मॉडल हैं। अपूर्वा के सहयोगी उनके काम करने के स्टाइल के मुरीद हैं। अपूर्वा जिस भी प्रोजेक्ट में लगती हैं, उसके लिए 100 फीसदी कमिटमेंट शो करती हैं। अपूर्वा के कलीग्स की राय में वह बहुत ईमानदार हैं, उनकी इंटीग्रिटी काबिले-तारीफ है। जागरण प्रकाशन लिमिटेड की सीओओ मिस रचना कुमार बताती हैं, 'जिस तरह से वह लोगों से और सिचुएशन्स से डील करती हैं, वह अपने आप में अद्भुत है।' रेडियो सिटी की वीपी, प्रोग्रामिंग मिस अनुरीता पटेल कहती हैं, 'बहुत सारे लोगों में बहुत क्रिएटिविटी होती है और अपूर्वा क्रिएटिविटी को पूरा मौका देती है, लेकिन साथ में वह रिजल्ट पर भी पूरी तरह से फोकस्ड होती हैं। संदीप खोसला, जो मिड डे के सीईओ हैं बताते हैं, '10 डिपार्टमेंट हेड्स में से 3 महिलाएं हैं, ऐसा अपूर्वा जी की डायनेमिक लीडरशिप में ही संभव है। उन्होंने यहां ऐसा माहौल बनाया है, जिसमें हर किसी के लिए आगे बढ़ने का पूरा मौका है। 

अपूर्वा पुरोहित में हर काम के लिए एक जज्बा नजर आता है, फिर चाहे वह छोटा हो या बड़ा और उनकी यही चीज बहुत इंस्पायर करती है। हर जिंदगी डॉट कॉम की कंटेंट हेड मेघा ममगेन ने अपूर्वा पुरोहित के साथ खास बातचीत की। इस बातचीत के खास अंश:

मेघा ममगेन का सवाल: क्या वुमन लीडर होने को बैच ऑफ ऑनर की तरह लेना चाहिए या नेतृत्व करने के मामले में यह गौड़ हो जाता है?

अपूर्वा पुरोहित का जवाब: मेरे खयाल से जब बात लीडरशिप की आती है तो यह बात उतनी महत्वपूर्ण नहीं रह जाती। अच्छी या बुरी लीडरशिप में जेंडर का फर्क नहीं होता, इसीलिए सामान्य तौर पर इसे अवॉइड किया जाता है। इस समय में देश में महिला नेतृत्व की भारी कमी है। ऐसे में फीमेल लीडर्स के होने से महिलाएं इंस्पायर होती हैं और लीडरशिप रोल लेने के आगे आती हैं। अगर लीडर का रोल निभाते हुए महिलाएं इसे सम्मान के प्रतीक के तौर पर लेती हैं तो भी यह महिलाओं को आगे बढ़ा सकता है। जब वुमन लीडर यह कहती है कि मैं महिला होते हुए यह चीज हासिल कर सकती हूं तो यह आपके लिए भी मुश्किल नहीं है और यह चीज महिलाओं को विशेष रूप से अपील करती है। 

मेघा ममगेन का सवाल: अक्सर लीडरशिप रोल में होने वाली महिलाओं से सवाल किया जाता है कि वे इतना कुछ कैसे कर लेती हैं, घर भी संभालना और ऑफिस की जिम्मेदारियां भी निभाना। लेकिन ऐसा सवाल पुरुषों से नहीं किया जाता। क्या यह चीज आपको अखरती है?

अपूर्वा पुरोहित का जवाब: जब लोग मुझे एक ऑर्गनाइजेशन लीड करने और घर मैनेज करने को लेकर सवाल करते हैं तो मुझे कई चीजें अखरती हैं, लेकिन यह चीज नहीं अखरती। मैं इसे एक कॉम्प्लीमेंट के तौर पर लेती हूं क्योंकि मैं जानती हूं कि महिलाएं घर और ऑफिस दोनों को संभाल सकती हैं और ये काम वो बेहतरीन तरीके से कर सकती हैं। पुरुष इस मामले में यूनी-डायमेंशनल होते हैं, ज्यादातर पुरुष जब अपने करियर पर फोकस्ड होते हैं, तो उस दौरान कुछ ही अपने घर की चीजों पर ध्यान दे पाते हैं।

मेघा ममगेन का सवाल: आपका 30 साल का अनुभव है और आप देश की सबसे पावरफुल 30 महिलाओं में शुमार की जाती हैं। इस मुकाम तक पहुंचने के लिए किन चीजों की जरूरत होती है?

अपूर्वा पुरोहित का जवाब: पावरफुल होना लक्ष्य नहीं होना चाहिए। पावरफुल होने से थोड़ा नेगेटिव फील आता है, लेकिन हाल ही में एक स्टेटमेंट आया, जो मेरे विचारों से काफी मिलता-जुलता है। पावर से किसी भी चीज का प्रभाव बहुत ज्यादा बढ़ जाता है। यानी आप जो भी करती हैं, अगर उसका प्रभाव बढ़ जाता है और वह बड़े स्केल पर किया जाता है तो पावर भी उतना ही ज्यादा बढ़ जाता है। यह पावर के बारे में सोचने का एक पॉजिटिव तरीका है। अगर मैं अपने ऑफिस में काम करने वालों को बेहतर प्रोफेशनल बना सकी या फिर मैंने जो किताब लिखी, उसके जरिए महिलाओं को इंस्पायर कर सकी तो मुझे लगता है कि यह मेरी पावर है। अरुंधती भट्टाचार्य ने हाल ही में कहा था कि ऐसा पावरफुल होने का क्या फायदा कि आप दूसरों को सशक्त ना बना सकें।    

मेघा ममगेन का सवाल: क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ कि पुरुषों की तरफ से नेगेटिव प्रभाव रहा हो? अगर हां तो आपने इससे कैसे डील किया? 
अपूर्वा पुरोहित का जवाब: ऐसी चीजें कहीं खत्म नहीं होती, चाहें वह घर हो या ऑफिस, चाहें आप जूनियर एक्जिक्यूटिव हों या सीईओ, आपको इन चीजों से गुजरना ही पड़ता है। पुरुषों को अपना वर्चस्व अच्छा लगता है। बोर्ड में ऐसा कई बार हुआ जब मैंने कोई बात कही और तुरंत उस पर रिएक्शन आया, 'मैं अभी इस ग्रेट आइडिया के बारे में सोच रहा था', जहां लोग अक्सर बात बीच में काट देते हैं। घर पर भी ऐसा होता है कि मुझे कहना पड़ता है कि मुझे बीच में मत टोको। मुझे मटन डिश नहीं खानी, जो आपको खानी है। आपको यह संघर्ष रोज करना पड़ता है। आपको पुरुषों को बीच में रोकना पड़ता है और कहना पड़ता है, 'पहले मुझे अपनी बात पूरी करने दो।' 
मेघा ममगेन का सवाल: आपकी किताब 'Lady, You're Not a Man: The Adventures of a Woman at Work' ऐसे लोगों को जरूर पढ़नी चाहिए, जो खुद के लिए एक मुकाम हासिल करना चाहते हैं। यह पुरुष और महिलाओं दोनों के लिए इंस्पायरिंग है। इसकी प्रेरणा आपको कैसे मिली? 
अपूर्वा पुरोहित का जवाब: मैंने महसूस किया कि बाहरी संस्थानों में और मेरे ऑर्गनाइजेशन में भी बहुत सी महिलाएं स्ट्रगल कर रही थीं, यंग जनरेशन की महिलाओं को दोनों ही चीजें चाहिए घर और ऑफिस दोनों जगह वह अच्छा करना चाहती हैं, हमारी जनरेशन में ज्यादातर महिलाएं कंप्रोमाइज का रास्ता अपनाती थीं। या तो वह करियर चुनती थीं, शादी ही नहीं करती थीं या फिर वे शादी करके परिवार की जिम्मेदारियां संभालती थीं। कुछ ही महिलाओं तब कहती थीं कि उन्हें दोनो चाहिए। लेकिन आज की महिलाएं चाहती हैं। उन्हें मुश्किल इसलिए होती है, क्योंकि उन्होंने इसके लिए रास्ता नहीं देखा है, क्योंकि उन्होंने ऐसी मां देखी हैं, जो वर्किंग नहीं थीं या फिर ऐसी चाचियां देखी हैं, जो शादीशुदा नहीं थीं। इसीलिए उन्हें ऐसी महिलाओं के उदाहरण आमतौर पर देखने को नहीं मिलते, जो वर्कलाइफ बैलेंस बनाकर चलें। इसीलिए मैंने ऐसी महिलाओं की परेशानी को ध्यान में रखते हुए यह किताब लिखी। मैंने इसमें वो प्रैक्टिकल तरीके बताए हैं, जिनके जरिए घर और ऑफिस दोनों को बेहतर तरीके से मैनेज किया जा सकता है। यह एक तरह से प्रैक्टिकल गाइड कही जा सकती है। मैंने कई महिलाओं को ऐसी समस्याओं से जूझते हुए देखा और यह भी पाया कि ज्यादातर महिलाओं की समस्याएं एक जैसी हैं। हर महिला कहती है कि उसका पति आलसी है। हर महिला कहती है कि उसकी सास अच्छी नहीं है, यह किसी एक महिला की समस्या नहीं है। इस किताब के जरिए महिलाओं को मैं यह बात जाहिर करना चाहती थी कि वे अकेली इस समस्या से नहीं जूझ रही हैं, उनकी तरह और भी महिलाएं इसे फेस कर रही हैं। और अगर आप इसके बीच में बैलेंस स्थापित कर सकती हैं, तो आप भी कामयाब हो सकती हैं। 
मेघा ममगेन का सवाल: जैसा आपने कहा मुझे भी इसी तरह का दबाव झेलना पड़ता है। क्या यह संभव है कि एक नर्चरिंग लीडर और टास्क मास्टर के बीच बैलेंस स्थापित किया जा सके? 
अपूर्वा पुरोहित का जवाब: यह स्ट्रगल सभी मैनेजर फेस करते हैं, जिसमें उन्हें नर्चरिंग और डिमांडिंग होने के बीच में बैलेंस स्थापित करना पड़ता है। पुरुष और महिलाओं, दोनों को इस स्थिति से गुजरना पड़ता है। मुझे लगता है कि हर मैनेजर को 'टफ लव' के कॉन्सेप्ट को समझना चाहिए, ताकि जब आप अपने इंप्लॉईज और टीम के साथ डील कर रहे हों तो जितना संभव हो अपने मातहतों के साथ सॉफ्ट तरीके से पेश आ सके। इसी के साथ आपके भीतर पैशन होना चाहिए कि आपको अपने काम से प्यार है और यही आपको सर्वश्रेष्ठ होने के लिए इंस्पायर करता है। यह बहुत टफ बैलेंस होता है। कई बार आप जरूरत से ज्यादा नरम पड़ जाते हैं और कभी ज्यादा टफ हो जाते हैं, लेकिन हर दिन इसमें बैलेंस बनाने के लिए प्रयास करने की जरूरत होती है कि टफ लव कैसे स्थापित किया जाए। यानी जहां तक काम का सवाल है, आप बेस्ट से कम में राजी नहीं होने वाले, लेकिन जहां तक इंसानियत की बात है, पर्सनल बेसिस पर आप अपनी टीम का खयाल रखते हैं।
मेघा ममगेन का सवाल: एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में आप हमेशा से लीडर रही हैं, टीवी और रेडियो में आपको विशेष अनुभव है और अब आप डिजिटल विंग को भी लीड कर रही हैं, इस इंडस्ट्री में जहां अपूर्वा पुरोहित का जवाब: लोगों को लोगों से जोड़ा जा रहा है, वहां आप अपनी गट फीलिंग पर चलती हैं या फिर आंकड़ों के हिसाब से?
अपूर्वा पुरोहित का जवाब: शुक्र है कि मैं बॉल बियरिंग्स, गियर्स या ट्रैक्टर सेल नहीं कर रही। यह क्रिएटिविटी का बिजनेस है, जिसे मैं एंजॉय कर रही हूं। इसमें दिमाग के दाएं और बाएं हिस्से का खेल है, एक हिस्सा रिस्क लेने और क्रिएटिविटी में संतुष्ट होता है और दूसरा पूर्व अनुभवों के आधार पर आगे बढ़ने में। मुझे लगता है कि मैं इस काम में अच्छी हूं। मेरा मानना है कि कंटेंट कैसा होना चाहिए, इसके पीछे एक साइंस है। मैं साइंस और प्रोसेसेस में यकीन करती हूं, लेकिन जब कंटेंट क्रिएशन की बात आती है, तो गट के आधार पर फैसला लेना अच्छा रहता है। उदाहरण के लिए किसी कामयाब महिला से पूछना कि उन्हें कामयाबी कैसे हासिल हुई, यह विज्ञान है, लेकिन आप किस तरह के सवाल उस महिला से करती हैं, यह फैसला आप अपनी गट फीलिंग के आधार पर लेती हैं और इसीलिए आप एक अच्छी इंटरव्युअर मानी जाती हैं।