History of Maang Tikka: सदियों पुराना है माथे की शान मांग टीका का इतिहास, जानिए भारत में कहां से हुई थी इसकी शुरुआत?

माथे की बिंदी से लटकता एक टीका सिर्फ गहना नहीं, सदियों की कहानी है। जानिए कैसे प्राचीन मूर्तियों से लेकर मुगल के शाही दरबार और राजस्थान के बोरला तक पहुंचा मांग टीके का सफर।
Updated:- 2026-11-03, 15:24 IST
Maang Tikka History

शादी के दिन दुल्हन का सोलह शृंगार हो और माथे पर मांग टीका न हो, ऐसा बहुत ही कम देखने को मिलता है। यह छोटा-सा गहना दुल्हन की खूबसूरती में चार चांद लगा देता है। सोने, मोती, कुंदन और हीरे से बने मांग टीके आज भी महिलाओं की पहली पसंद हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि बालों की मांग के बीच पहना जाने वाला यह गहना आखिर आया कहां से? इसकी परंपरा कितनी पुरानी है और क्या मुगल काल में इसे नया रूप मिला था?

क्या है मांग टीका का इतिहास?

कभी फूलों और मोतियों से सजने वाला माथा आज खूबसूरत मांग टीकों से चमकता है। दुल्हन के लुक में खास जगह रखने वाला यह गहना सिर्फ फैशन का हिस्सा नहीं है, बल्कि भारतीय परंपराओं और क्षेत्रीय कलाओं से भी जुड़ा है। राजस्थान के बोरला से लेकर पंजाब और दक्षिण भारत के अलग-अलग डिजाइन तक, मांग टीके का रूप हर जगह थोड़ा अलग नजर आता है। आइए Indian Women Traditions Jewels and ritual की रिसर्च से मांग टीके के बदलते अंदाज की कहानी जानते हैं।

2 (90)

Photo Credit: Pinterest (Discription)

मांग टीका की शुरुआत कहां से हुई?

मांग टीका की शुरुआत भारत के किसी एक खास शहर या राज्य से हुई थी, इसका कोई पक्का ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता है। हालांकि, माथे और सिर को सजाने वाले गहनों का चलन भारतीय संस्कृति में बहुत पुराना रहा है। प्राचीन कलाकृतियों और मूर्तियों में महिलाओं के सिर और माथे पर पहने जाने वाले आभूषणों के संकेत मिलते हैं।

समय के साथ बालों की बीच वाली मांग में पहना जाने वाला गहना अलग-अलग रूपों में सामने आया। इसका आधुनिक रूप उत्तर भारत में खास तौर पर लोकप्रिय हुआ। पुराने समय में इसे सोने, चांदी, मोतियों और दूसरे कीमती पत्थरों से बनाया जाता था।

मुगल काल में मिला शाही अंदाज

मांग टीका के डिजाइन को भव्य बनाने में मुगल काल का भी बड़ा योगदान माना जाता है। इस दौर में आभूषणों पर बारीक नक्काशी, रंगीन पत्थरों, कुंदन और मीनाकारी का काम खूब लोकप्रिय हुआ। इन कलाओं का असर माथे के गहनों पर भी दिखाई देने लगा।

मुगल काल के आभूषणों के विवरण में माथे पर पहने जाने वाले गहनों का जिक्र मिलता है। उस समय राजपूताना में मांग के बीच पहने जाने वाले आभूषण को 'टीका' कहा जाता था। वहीं, मोतियों की लड़ियों और बीच में लटकते आभूषण वाले डिजाइन भी प्रचलित थे। धीरे-धीरे ये गहने शाही परिवारों से निकलकर आम लोगों के बीच भी लोकप्रिय हुए।

3 (44)

Photo Credit: Pinterest (Tarinika Jewellary)

अलग-अलग राज्यों में अलग है मांग टीका का अंदाज

भारत के अलग-अलग हिस्सों में मांग टीका पहनने और बनाने का तरीका अलग है।

राजस्थान
यहां बोरला काफी लोकप्रिय है। इसका आकार गोल और गुंबद जैसा होता है। इसे कुंदन, पोल्की और मीनाकारी से सजाया जाता है।

पंजाब
यहां दुल्हनें अक्सर चांद के आकार वाले मांग टीके पसंद करती हैं। मोती और चमकदार पत्थरों से सजे डिजाइन भी काफी लोकप्रिय हैं।

उत्तर प्रदेश
यहां जड़ाऊ और कुंदन के काम वाले मांग टीके देखने को मिलते हैं। खासकर लखनऊ की जड़ाऊ कला अपने बारीक काम के लिए जानी जाती है।

दक्षिण भारत
यहां सोने के भारी आभूषण और मंदिरों की कलाकृतियों से प्रेरित डिजाइन पसंद किए जाते हैं।

यह भी पढ़ें- Indian Culture: भारत में महिलाओं के माथे पर बिंदी लगाने की प्रथा कैसे शुरू हुई? जानिए इसका इतिहास

माथे के बीच में ही क्यों पहना जाता है मांग टीका?

हिंदू परंपरा में माथे के बीच के हिस्से को आज्ञा चक्र यानी तीसरी आंख से जोड़कर देखा जाता है। इसे ज्ञान, एकाग्रता और अंतर्ज्ञान का प्रतीक माना जाता है। इसी वजह से इस स्थान पर पहने जाने वाले गहने को आध्यात्मिक महत्व भी दिया जाता है। हालांकि, मांग टीका पहनने से किसी खास स्वास्थ्य लाभ का वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।

1 (92)

Photo Credit: Pinterest (South Asian Bride)

दुल्हन के शृंगार से फैशन तक पहुंचा मांग टीका

पहले मांग टीका मुख्य रूप से दुल्हन और विवाहित महिलाओं के शृंगार का हिस्सा माना जाता था। इसे सोलह शृंगार में भी जगह मिली, लेकिन अब इसका इस्तेमाल सिर्फ शादी तक सीमित नहीं है। महिलाएं इसे त्योहारों, पूजा, पारिवारिक कार्यक्रमों और खास मौकों पर भी पहनती हैं। आज बाजार में हल्के और मिनिमल डिजाइन से लेकर बड़े स्टोन वाले मांग टीके तक उपलब्ध हैं। कुछ महिलाएं इसे इंडो-वेस्टर्न कपड़ों के साथ भी पहनना पसंद करती हैं। इस तरह सदियों पुराना यह गहना आज भी अपनी परंपरा को संभालते हुए नए फैशन के साथ आगे बढ़ रहा है।

यह भी पढ़ें- History Of Nose Ring: सोलह श्रृंगार ही नहीं, परंपरा भी! जानिए भारत में कब और कैसे शुरू हुआ नाक में नथ पहनने का रिवाज

मांग टीका सिर्फ सोने या हीरे का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि भारत के इतिहास का आईना है। जिसकी चमक में प्राचीन मंदिरों की कला, मुगलों की शाही नक्काशी और राजस्थान-पंजाब की लोक संस्कृति एक साथ दिखती है। कभी सिर्फ दुल्हन के सोलह शृंगार तक सीमित यह गहना, आज हर लड़की की ज्वेलरी बॉक्स में जगह बना चुका है, चाहे वो भारी बोरला हो या एक छोटा सा मिनिमल टीका। अगर आपको यह स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।

FAQ
बोरला और मांग टीका में क्या फर्क है?
बोरला राजस्थान का ट्रेडिशनल मांग टीका है, इसका आकार गोल और गुंबद जैसा होता है, जबकि आम मांग टीका में ऊपर हुक और नीचे एक लटकन होती है। बोरला को मांग टीके का राजस्थानी वर्जन कह सकते हैं।
क्या मांग टीका रोज पहना जा सकता है?
पहले नहीं, लेकिन अब हां। आजकल बाजार में ऑक्सीडाइज्ड, छोटे मोती वाले और सिंगल चेन वाले लाइटवेट मांग टीके आते हैं जो कुर्ते या साड़ी के साथ रोजमर्रा में भी पहने जाते हैं।
मांग टीका खरीदते समय सबसे जरूरी बात क्या देखनी चाहिए?
डिजाइन से ज्यादा उसके पीछे की हुक और चेन की क्वालिटी देखें। अगर चेन पतली या हुक ढीला होगा तो टीका माथे पर टिकेगा नहीं और बार-बार खिसकेगा।
Disclaimer

हमारा उद्देश्य अपने आर्टिकल्स और सोशल मीडिया हैंडल्स के माध्यम से सही, सुरक्षित और विशेषज्ञ द्वारा वेरिफाइड जानकारी प्रदान करना है। यहां बताए गए उपाय, सलाह और बातें केवल सामान्य जानकारी के लिए हैं। किसी भी तरह के हेल्थ, ब्यूटी, लाइफ हैक्स या ज्योतिष से जुड़े सुझावों को आजमाने से पहले कृपया अपने विशेषज्ञ से परामर्श लें। किसी प्रतिक्रिया या शिकायत के लिए, compliant_gro@jagrannewmedia.com पर हमसे संपर्क करें।