Ratha Saptami Puja vidhi and Samagri 2024: रथ सप्तमी के दिन इस विधि से करें सूर्यदेव की पूजा, जाने पूजन विधि

(Ratha Saptami Puja vidhi and Samagri 2024) आज रथ सप्तमी है। इस दिन सूर्यदेव की पूजा विशेष रूप से की जाती है। रथ सप्तमी माघ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को आता है। इस दिन सूर्यदेव की उपासना विशेष रूप से की जाती है। बता दें, इस दिन को माघ सप्तमी और माघ जयंती के नाम से भी जाना जाता है।
यह पर्व बसंत पंचमी के दो दिन बाद मनाया जाता है। इस दिन पवित्र नदी में स्नान करने से व्यक्ति को सभी रोग दोष से छुटकारा मिल सकता है। साथ ही सभी पापों का भी नाश हो सकता है। इसी कारण इस दिन को आरोग्य सप्तमी के नाम से भी जाना जाता है। अब ऐसे में आज के दिन सूर्यदेव की पूजा किस विधि से करना शुभ माना जाता है। इसके बारे में ज्योतिषाचार्य पंडित अरविंद त्रिपाठी से विस्तार से जानते हैं।
क्या है पूजन सामग्री? (Surya Dev Pujan Samagri 2024)

रथ सप्तमी के दिन सूर्यदेव की तस्वीर, घी, दीपक, बत्ती, लाल रंग के फूल, दूध, दही, गुड़, तिल, हल्दी, केसर आदि से सूर्यदेव की पूजा की जाती है।
इस विधि से करें सूर्यदेव की पूजा (Surya Dev Puja Vidhi)
रथ सप्तमी के दिन सबसे पहले सूर्यदेव (सूर्यदंव मंत्र) की तस्वीर को एक आसन पर विराजित करें।
उसके बाद उन्हें लाल रंग की मिठाई का भोग लगाएं।
सूर्यदेव को रोली, चंदन (चंदन के उपाय) और केसर से तिलक करें। उसके बाद सूर्यदेव के मंत्रों का जाप करें।
मंत्रों का जाप करने के बाद कपूर से आरती करें।
आखिर में आरती करने के बाद सूर्यदेव के स्तोत्र का पाठ करें। इससे आरोग्य और मान-सम्मान की प्राप्ति हो सकती है।
भगवान सूर्य के सामने मिट्टी के दीए जलाना चाहिए।
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इस दिन संध्या के समय पीपल के पेड़ की परिक्रमा अवश्य करें। इससे सुख-सौभाग्य की प्राप्ति हो सकती है।
रथ सप्तमी के दिन इन मंत्रों का करें जाप (Surya Dev Mantra)
- ॐ घृणिं सूर्य्य: आदित्य:
- ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय नमः ।
- ॐ सूर्याय नम: ।
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- ॐ घृणि सूर्याय नम: ।
- ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय सहस्रकिरणराय मनोवांछित फलम् देहि देहि स्वाहा।।
- ॐ ऐहि सूर्य सहस्त्रांशों तेजो राशे जगत्पते, अनुकंपयेमां भक्त्या, गृहाणार्घय दिवाकर:।
- ॐ ह्रीं घृणिः सूर्य आदित्यः क्लीं ॐ ।
सूर्य कवच का करें जाप (Surya Dev Kawach)

श्रणुष्व मुनिशार्दूल सूर्यस्य कवचं शुभम्।
शरीरारोग्दं दिव्यं सव सौभाग्य दायकम्।।
देदीप्यमान मुकुटं स्फुरन्मकर कुण्डलम।
ध्यात्वा सहस्त्रं किरणं स्तोत्र मेततु दीरयेत्।।
शिरों में भास्कर: पातु ललाट मेडमित दुति:।
नेत्रे दिनमणि: पातु श्रवणे वासरेश्वर:।।
ध्राणं धर्मं धृणि: पातु वदनं वेद वाहन:।
जिव्हां में मानद: पातु कण्ठं में सुर वन्दित:।।
सूर्य रक्षात्मकं स्तोत्रं लिखित्वा भूर्ज पत्रके।
दधाति य: करे तस्य वशगा: सर्व सिद्धय:।।
सुस्नातो यो जपेत् सम्यग्योधिते स्वस्थ: मानस:।
सरोग मुक्तो दीर्घायु सुखं पुष्टिं च विदंति।।
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