Maa Brahmcharini Vrat Katha: कैसे हुआ था मां ब्रह्मचारिणी का जन्म? जानें रोचक कथा

नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा का विधान है। मां ब्रह्मचारिणी को ज्ञान और तपोबल की देवी माना जाता है। मां ब्रह्मचारिणी की पूजा करने से व्यक्ति का बुद्धि कौशल बढ़ता है। ऐसी मान्यता है कि जितना आलौकिक मां ब्रह्मचारिणी का रूप है उतनी ही रोचक है मां ब्रह्मचारिणी के जन्म की कथा। ऐसे में ज्योतिषाचार्य राधाकांत वत्स से आइये जानते हैं कि कैसे और क्यों प्रकट हुई थीं मां ब्रह्मचारिणी।
मां ब्रह्मचारिणी की व्रत कथा (Maa Brahmcharini Ki Vrat Katha)

माता सती ने अपने अगले जन्म में राजा हिमालय के घर में पुत्री रूप में जन्म लिया था। एक बार वन में भ्रमण करते हुए जब उन्होंने भगवान शिव को देखा तो उन्हें अपने पति रूप में पाने की इच्छा जताई। तब देवर्षि नारद के कहे गए वचनों के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को अपने पति रूप में प्राप्त करने के लिए अत्यंत कठिन तपस्या की।
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इस दुष्कर तपस्या के कारण माता को तपस्चारिणी नाम से पुकारा गया। कथा के अनुसार एक हज़ार वर्ष उन्होंने केवल फल, मूल खाकर व्यतीत किए थे और सौ वर्षों तक केवल शाक पर निर्वाह किया था। कुछ दिनों तक तो माता ने उपवास भी रखा था। बिना अन्न और जल को ग्रहण किये माता तप में लीन रहीं। माता पार्वती की तापस्या से शिव जी प्रसन्न हुए।
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जब माता पार्वती को दर्शन देने के लिए भगवान शिव उनके सामने पहुंचे तब उन्होंने माता पार्वती को ब्रह्मचारिणी नाम से संबोधित किया और तभी से माता के शांत और तपो रूप को ब्रह्मचारिणी कहा जाने लगा। माता के इस रूप की पूजा से व्यक्ति को असीमित ज्ञान की प्राप्ति होती है। व्यक्ति का बुद्धि कौशल चौगुना बढ़कर कार्य करता है।
आप भी इस लेख में दी गई जानकारी के माध्यम से यह जान सकते हैं कि नवरात्रि के दूसरे दिन पूजी जाने वाली मां ब्रह्मचारिणी का जन्म कैसे हुआ था। अगर हमारी स्टोरीज से जुड़े आपके कुछ सवाल हैं, तो वो आप हमें आर्टिकल के नीचे दिए कमेंट बॉक्स में बताएं। हम आप तक सही जानकारी पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे। अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।
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- मां ब्रह्मचारिणी का प्रिय भोग क्या है?
- मां ब्रह्मचारिणी का प्रिय भोग दूध, चीनी और पंचामृत है।
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