जिंदगी में कई अनुभव हुए है। पर मेरा यह अनुभव कल्पना से बाहर था। जिंदगी का दूसरा पड़ाव ....यानी रिटायरमेंट।

पूरे देश में महामारी का प्रकोप चारों तरफ फैला हुआ था, घर में मैं और मेरे पति अकेले थे। सब तरफ आना जाना बंद हो चुका था फोन भी नॉर्मल थे, स्मार्ट फोन नही थे।

ऐसे वक्त में एक स्मार्ट फोन खरीदा। कुछ समझ में नहीं आ रहा था। फोन से बेटियों से पूछ-पूछ कर स्मार्टफोन चलाना सीखा। कुछ घबराहट तो थी, पर हिम्मत नहीं हारी।

घर का सामान ऑनलाइन मंगाना सीखा। बिल भरना, गैस की बुकिंग करवाना सब हमने सीखा। सभी रिश्तेदारों के घर आना-जाना बंद हो गया था। उन लोगों से दिल की बात फोन में ही होने लगी। फिर तो ऐसा लगा हम अकेले नहीं हैं।

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स्मार्टफोन में कहानियां पढ़ती जिससे मुझे प्रेरणा मिली और मैंने भी कहानियां लिखना शुरु कर दिया। कहानियां लिखना अच्छा लगने लगा। लोग मुझे पहचानने लगे। लेखन से मेरी पहचान बन गई। अब मैं कागज कलम लेकर कुछ ना कुछ लिखती रहती हूं।

बागबानी पर भी मैने अपना समय बिताया और अब मेरे पास बहुत सारे सुंदर पौधे है। जिन्हे देख मन प्रसन्न हो जाता है। प्रकृति से सदा मुस्कुराने की प्रेरणा मिलती है।

इस पड़ाव पर भी मुझे बहुत खुशी मिल रही है और वक्त कैसे निकल जाता है पता ही नहीं चलता। ऐसे कई ऐप है जिसे मैं चलाना सीख गई हूं। जिंदगी जीना है तो उम्र को ना देखें, अनुभव को प्राथमिकता दें और नित नई चीजों को सीखने के लिए सदा तैयार रहे।

लेखक- मंजू गोरसिया, बड़ौदा ( गुजरात)

मंजू गोरसिया, अपने परिवार की जिम्मेदारियां निभाते और बेटियों को अच्छी परवरिश देते हुए एक ब्यूटीशियन बन आगे बढ़ीं और जिंदगी के दूसरे पड़ाव में अपने अनुभवों को लेखन के माध्यम से सृजित कर रही हैं।