आजकल के घरों में बेडरूम, किचन और बाथरूम के अलावा एक कमरा ऐसा जरूर होता है, जहां मेहमानों को बिठाया जाता है। यहीं पर हम सब मिलकर चाय-नाश्ता करते हैं, बातें करते हैं और हंसी ठठ्ठा करते हैं। इसे हम ड्रॉइंग रूम कहते हैं, लेकिन क्या कभी सोचा है कि इसे ड्रॉइंग रूम ही क्यों कहते हैं, जबकि ड्रॉइंग का पेंटिंग या स्केचिंग से कोई लेना-देना नहीं है?
ड्राॅइंग रूम की कहानी कबकी है?
दरअसल, इस नाम के पीछे एक दिलचस्प कहानी है, जो कि 18वीं सदी के ब्रिटेन से जुड़ी है। आज जिस कमरे में मेहमानों का स्वागत होता है, उसका इस्तेमाल कभी खाने के बाद महिलाएं अलग बैठने के लिए करती थीं। यही वजह है कि इस कमरे का नाम भी एक खास तरीके से पड़ा। तो चलिए जानते हैं ड्रॉइंग रूम के नाम के पीछे की यह कहानी।
पहले घरों में नहीं होते थे इतने कमरे
पुराने समय में यूरोप के घर आज के घरों जैसे नहीं होते थे। खासतौर पर मध्यकालीन यूरोप में घर के अंदर हर काम के लिए अलग कमरा नहीं हुआ करता था। एक बड़ा हॉल ही घर का सबसे जरूरी हिस्सा होता था। खाना खाने से लेकर मेहमानों के आने और लोगों के आपस में मिलने-जुलने तक के कई काम इसी जगह पर हुआ करते थे। धीरे-धीरे समय बदलता गया और लोगों ने अपने कामों के हिसाब से अलग-अलग कमरे बनाने शुरू कर दिए। इसी दौरान डाइनिंग रूम भी बना।
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डाइनिंग रूम के बाद आई एक नई परेशानी
डाइनिंग रूम का मकसद साफ था। घर के लोग एक जगह बैठकर खाना खाएं और उसके लिए एक अलग से कमरा हो, लेकिन खाना खत्म होने के बाद एक ऐसा होता था कि पुरुष वहीं जमे रहते थे। उठने का नाम भी नहीं लेते थे। वे वहीं आपस में बातचीत करते और सिगार पीते थे। ऐसे में महिलाओं को दिक्क्त होती थी। महिलाएं इस बैठक का हिस्सा नहीं बन पाती थीं।
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यहीं से हुई ड्रॉइंग रूम के बनने की कहानी
इस परेशानी से गुजरने के बाद ही ड्राॅइंग रूम के बनने की कहानी शुरू हुई। दरअसल, खाना खत्म होने के बाद महिलाएं डाइनिंग रूम से निकलकर घर के किसी दूसरे कमरे में चली जाती थीं। यानी वे डाइनिंग रूम से एक तरह Withdraw करती थीं। इसी वजह से उस कमरे को विड्रॉइंग रूम कहा जाने लगा। यह रूम महिलाओं के लिए खाने के बाद बैठने, बातचीत करने और चाय-कॉफी पीने की जगह बन गया था। यानी आज जिस ड्रॉइंग रूम में परिवार मेहमानों के साथ बैठता है, उसका पुराना इस्तेमाल इससे काफी अलग था।
विड्रॉइंग रूम’ से बना ड्रॉइंग रूम
समय के साथ विड्रॉइंग रूम का नाम छोटा होता गया और इसे ड्रॉइंग रूम कहा जाने लगा। यानी नाम में मौजूद ड्रॉइंग का मतलब किसी भी पेंटिंग या स्केचिंग से नहीं है। यह नाम उस पुराने नाम विड्रॉइंग रूम से ही बना है, जब महिलाएं खाना खाने के बाद डाइनिंग रूम से अलग होकर इस कमरे में चली जाती थीं।
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भारत में कैसे पहुंचा ड्रॉइंग रूम?
ड्रॉइंग रूम का यह कॉन्सेप्ट ब्रिटिश दौर में भारत पहुंचा था। ब्रिटिश काल में विक्टोरियन लाइफस्टाइल और घर बनाने का तरीका भारत में भी देखने को मिला। उस समय कई अमीर लोगों ने अपने बंगले विक्टोरियन स्टाइल में बनवाए। इन घरों में बड़े और सुंदर ड्रॉइंग रूम भी बनवाए जाने लगे। धीरे-धीरे यह कमरा मेहमानों को बैठाने और घर की सोशल एक्टिविटीज के लिए बन गया।
ब्रिटेन में बदल गया इस कमरे का नाम
दिलचस्प बात यह है कि जिस नाम का इस्तेमाल आज भी भारत में खूब होता है, वह ब्रिटेन में अब आम नहीं है। समय के साथ ब्रिटेन में भाषा और लोगों के रहन-सहन का तरीका बदला। वहां ड्रॉइंग रूम जैसे शब्द बाेलने कम हो गए और इसकी जगह लिविंग रूम, सिटिंग रूम या लाउंज कहा जाने लगा।
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नोट- यह जानकारी कई इंटरनेशनल बलाॅग्स और मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है।
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