शाम की चाय हो और साथ में कुछ चटपटा खाने को मिल जाए, तो मजा ही आ जाता है। वहीं, त्‍योहारों के मौके पर भी मेहमानों को कुछ चटपटा ही सर्व क‍िया जाता है। उत्तर प्रदेश में ऐसे ही पसंद किए जाने वाले स्नैक्स में दालमोठ का नाम जरूर आता है। यह सिर्फ चाय के साथ खाने वाली नमकीन नहीं है बल्कि यहां के खानपान का पुराना हिस्सा भी है। लखनऊ से लेकर आगरा और फर्रुखाबाद तक, हर शहर में इसका अलग स्वाद चखने को मिलता है, लेकिन क्या आप जानती हैं कि दालमोठ की शुरुआत करीब 150 से 200 साल पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हुई थी?

हालांक‍ि, फर्रुखाबाद को इसका सबसे पुराना ठिकाना माना जाता है। ऐसे में आइए जानते हैं कि घर में बनने वाली एक नॉर्मल सी नमकीन कैसे यूपी के मशहूर स्नैक्स में शामिल हो गई?

आखिर क्या होती है दालमोठ?

आपको बता दें क‍ि दालमोठ एक एकदम कुरकुरी और चटपटी नमकीन है, जो आमतौर पर हर चाय लवर की पहली पसंद होती है। इसे तैयार करने के लिए तली हुई साबुत दाल (जैसे मूंग), बेसन की पतली सेव और ढेर सारे चटपटे मसालों को एक साथ मिलाया जाता है। इसमें आपको हींग, चाट मसाला, लाल मिर्च और नमक का बढ़िया खट्टा-मीठा और तीखा कॉम्बिनेशन मिलेगा। इसे भी खाने का अपना ही अलग मजा है। कोई इसे शाम की चाय के साथ स्नैक की तरह खाता है, तो कोई गरमा-गरम पूड़ी के साथ प्लेट में सजाता है।

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कुछ शौकीन लोग तो इसे ब्रेड-बटर के बीच दबाकर दालमोठ सैंडविच बनाकर भी खाते हैं। वहीं त्‍योहारों पर घर आए मेहमानों को भी इसे सर्व क‍िया जाता है। इसकी सबसे दिलचस्प बात यह है कि हर शहर का अपना अलग स्टाइल होता है। जैसे आगरा की दालमोठ में आपको करारे आलू के लच्छे मिलेंगे, तो किसी और शहर में स्पेशल मसालों का तीखा तड़का। कुल मिलाकर, यह एक ऐसा ऑल-इन-वन स्नैक है जो सभी को खूब पसंद होता है।

फर्रुखाबाद से जुड़ी है दालमोठ की पुरानी कहानी

दालमोठ पहली बार कहां बनी, इसे लेकर भले ही अलग-अलग राय हो, लेकिन फर्रुखाबाद को इसका सबसे पुराना और असली ठिकाना माना जाता है। बताया जाता है क‍ि करीब 150 से 200 साल पहले कुछ परिवारों ने अपने घरों में दालमोठ बनाना शुरू किया था। शुरुआत में तो यह बस घर तक ही सीमित थी, लेकिन जब लोगों को इसका स्वाद पसंद आने लगा और डिमांड बढ़ी, तो इसे दुकानों पर बेचना शुरू कर दिया गया।

कहते हैं कि 1900 की शुरुआत में देशराज नाम के एक लड़के ने घर की बनी दालमोठ को मार्केट में बेचना स्टार्ट किया था। बस फिर क्या था, इसका चटपटा स्वाद लोगों को इतना पसंद आया कि देखते ही देखते फर्रुखाबाद की दालमोठ हर जगह पॉपुलर हो गई।

फर्रुखाबाद की दालमोठ में आलू के लच्छे क्यों डाले जाते हैं?

फर्रुखाबाद की दालमोठ की सबसे बड़ी पहचान ही उसमें मिलने वाले करारे आलू के लच्छे हैं। अब सवाल यह है कि ये आए कहां से? असल में फर्रुखाबाद में आलू की बंपर पैदावार होती थी। बस फिर क्या था, नमकीन बनाने वालों ने दालमोठ का स्वाद और कुरकुरापन बढ़ाने के लिए उसमें तले हुए आलू के पतले-पतले लच्छे मिलाना शुरू कर दिया।

  • क्रंची आलू के लच्छे: इसमें डाले जाने वाले आलू के लच्छे इसे एकदम क्र‍िस्‍पी बनाते हैं।
  • हींग का जबरदस्त फ्लेवर: दालमोठ के स्वाद में जान डालने के लिए हींग का इस्तेमाल किया जाता है।

कहते हैं कि उस जमाने में अंग्रेज अफसरों को भी आलू के लच्छों वाली यह दालमोठ इतनी पसंद आती थी कि वे इसके फैन हो गए थे। धीरे-धीरे जो भी लोग फर्रुखाबाद आते-जाते, वे इसकी चटपटी रेसिपी अपने साथ दूसरे शहरों में ले गए और यह हर जगह मशहूर हो गई।

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आगरा की दालमोठ का स्वाद क्यों है अलग?

फर्रुखाबाद के अलावा आगरा भी अपनी दालमोठ के लिए पूरे देश में फेमस है, लेकिन यहां का स्वाद बाकी जगहों से काफी अलग और स्पेशल होता है। जहां फर्रुखाबाद और बरेली की दालमोठ का टेस्ट थोड़ा माइल्ड होता है, वहीं आगरा की दालमोठ एकदम तीखी, चटपटी और खट्टी-मीठी होती है। इसके अलग स्वाद के पीछे ये खास वजहें हैं-

  • आगरा की दालमोठ का असली सीक्रेट है इसमें डलने वाला खास मसाला, जो इसे एक अलग ही फ्लेवर देता है।
  • आगरा की दालमोठ में मोटी नहीं बल्कि काफी पतली और नरम सेव मिलाई जाती है, जिससे इसका टेक्सचर बहुत ही बढ़िया हो जाता है।
  • सबसे बड़ी बात यह है कि आगरा की दालमोठ में तीखेपन के लिए लाल मिर्च की जगह काली मिर्च का इस्तेमाल किया जाता है।

कैसे बनाई जाती है दालमोठ?

दालमोठ बनाने की रेसिपी सुनने में भले ही सिंपल लगे, पर इसका असली कुरकुरापन और फ्लेवर लाने में काफी मेहनत लगती है। इसे बनाने के लिए साबुत मसूर या मोठ दाल को रातभर पानी में भिगोया जाता है। अगले दिन इसे सुखाकर गरम तेल या घी में डीप-फ्राई करते हैं। फिर इसमें बेसन की क्रंची सेव और चटपटे मसाले मिक्स किए जाते हैं। हालांक‍ि, समय के साथ इसे बनाने का तरीका भी थोड़ा बदल गया है।

पहले सारा काम हाथ से होता था, अब मशीनों का यूज होने लगा है। घी की जगह रिफाइंड ऑयल ने ले ली है, लेकिन आज भी दाल को सही टेम्परेचर पर तलने और मसालों का परफेक्ट बैलेंस बनाने का काम एक्सपीरियंस्ड लोग ही करते हैं। आजकल तो इसमें काजू, बादाम, पिस्ता और खरबूजे के बीज भी मिलाए जाने लगे हैं।

फर्रुखाबाद से निकलकर बाकी शहरों तक कैसे पहुंची दालमोठ?

दालमोठ का स्वाद सिर्फ यूपी तक सीमित नहीं रहा है। जब फर्रुखाबाद के पुराने कारीगर और परिवार दूसरे शहरों में शिफ्ट हुए, तो वे अपने साथ दालमोठ का यह सीक्रेट फॉर्मूला भी ले गए। हर शहर ने अपने टेस्ट के हिसाब से इसमें थोड़ा-बहुत बदलाव कर द‍िया। कहीं यह चनाचूर बनी तो कहीं दाल बीजी के नाम से मशहूर हुई।

यूपी में सिर्फ नमकीन नहीं, मेहमाननवाजी की पहचान है दालमोठ

आपको बता दें क‍ि यूपी के घरों में दालमोठ कइ खास जगह है। सुबह की चाय हो, शाम की छोटी-मोटी भूख या बच्चों का टिफिन, दालमोठ सबकी पसंद है। घर पर कोई मेहमान आ जाए, तो चाय के साथ दालमोठ जरूर रखा तो मस्त है।

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