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धीरे-धीरे खत्म हो रही हैं छत्तीसगढ़ की ये खूबसूरत लोककलाएं, क्या आपने देखी हैं?

पुरानी और पारंपरिक लोक-कलाएं धीर-धीरे गुम होती जा रही हैं। आज के इस लेख में हम आपको छत्तीसगढ़ की खोती हुई कलाओं के बारे में बताने जा रहे हैं, जो कभी जीवन में खास भूमिका निभाती थीं।
Updated:- 2026-07-06, 18:14 IST
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छत्तीसगढ़ की धरती सिर्फ जंगलों, पहाड़ों और खनिजों से ही समृद्ध नहीं है, बल्कि इसकी असली पहचान यहां की बेहद खूबसूरत और अनूठी लोककथाओं में बसती है। सदियों से यहां के आदिवासी और ग्रामीण समाजों ने अपनी संस्कृति को गीतों, नृत्यों और शिल्प कलाओं के जरिए जिंदा रखा है। बदलते दौर आधुनिकता की चकाचौंध और सही संरक्षण न मिलने के कारण छत्तीसगढ़ की कई पारंपरिक लोककलाएं अब धीरे-धीरे दम तोड़ रही हैं। नई पीढ़ी इनसे दूर होती जा रही है, जिससे कई विधाएं इतिहास के पन्नों में सिमटने की कगार पर हैं। आज के इस लेख में हम छत्तीसगढ़ की लोककलाओं के बारे में बताने जा रहे हैं, जो हमारे बीच से धीरे-धीरे गायब होती जा रही हैं।

धनकुल गीत और वाद्ययंत्र

धनकुल बस्तर अंचल की एक बेहद अनूठी और पवित्र लोक कला है। इसमें जगार (महाकाव्य) गाए जाते हैं, जिसमें तीजा-जगार या आठे-जगार प्रमुख हैं। इस कला की सबसे खास बात इसका वाद्ययंत्र है, जो मिट्टी के घड़े, सूपा (बांस का बर्तन), धनुष और बांस की खपच्ची से मिलकर बनता है। इसे केवल महिलाएं ही बजाती और गाती हैं।

chatishgarh folk vadhy yantra

आज के समय में इस कठिन और लंबी साधना वाली कला को जानने और सीखने वाले लोग उंगलियों पर गिनने लायक बचे हैं, जिससे इस अद्भुत वाद्ययंत्र की गूंज अब शांत होने लगी है।

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गोंड भित्ति चित्र- दीवारों पर उकेरी जाने वाली कला

छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों, खासकर गोंड जनजाति में घरों की दीवारों पर मिट्टी और प्राकृतिक रंगों से बेहद खूबसूरत चित्र बनाने की परंपरा रही है। इन चित्रों में पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, देवी-देवता और उनके दैनिक जीवन की झलक दिखती थी।

gond kala

अब गांवों में भी कच्चे मिट्टी के घरों की जगह पक्के सीमेंट के मकानों ने ले ली है। दीवारों पर पुट्टी और प्लास्टिक पेंट होने की वजह से पारंपरिक भित्ति चित्र बनाने की यह कला अब गांवों से गायब होकर सिर्फ कुछ संग्रहालयों या प्रदर्शनियों तक ही सीमित रह गई है।

घडवा और झारा शिल्प

मोम और पीतल/कांस्य की मदद से बनाई जाने वाली लोस्ट वैक्स कास्टिंग पद्धति से बस्तर में घडवा शिल्प और रायगढ़ में झारा शिल्प की खूबसूरत मूर्तियां बनाई जाती हैं। इन मूर्तियों को बनाने की प्रक्रिया कठिन और समय लेने वाली होती है। साथ ही चीनी व प्लास्टिक के सस्ते सामानों ने बाजार पर कब्जा कर लिया है। यही वजह है कि इस शिल्पकला से जुड़े कारीगरों की नई पीढ़ी अब इस पुश्तैनी काम को छोड़कर शहरों में मजदूरी करने पर मजबूर हो रही है।

पंडवानी की वेदमती शैली

पंडवानी छत्तीसगढ़ की सबसे प्रसिद्ध लोककलाओं में से एक है, जिसमें महाभारत की कथा सुनाई जाती है। इसकी दो शैलियां होती हैं, जिसमें कापालिक (जिसमें कलाकार खड़े होकर अभिनय करते हैं) और वेदमती शामिल है। वेदमती शैली को जानने और गाने वाले बुजुर्ग कलाकार अब धीरे-धीरे इस दुनिया से जा रहे हैं।

chattishgarh folk song

सुआ और डंडा नृत्य 

दीपावली के समय छत्तीसगढ़ की महिलाएं सुआ नृत्य यानी तोता नृत्य करती हैं, जिसमें टोकरी में मिट्टी का सुआ रखकर उसके चारों ओर ताली बजाते हुए गीत गाए जाते हैं। इसी तरह पुरुष डंडा नृत्य (सैला) करते हैं।

suwa dance

कुछ साल पहले तक छत्तीसगढ़ के हर गांव और गली-मोहल्ले में दीपावली के दौरान इनकी गूंज सुनाई देती थी। हालांकि, वर्तमान में मोबाइल, सोशल मीडिया और आधुनिक गानों के शोर में इन पारंपरिक नृत्यों की रौनक फीकी पड़ गई है। अब गांवों में भी यह परंपरा केवल एक औपचारिकता बनकर रह गई है।

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ये लोककलाएं केवल मनोरंजन का जरिया नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ की पहचान हैं। हालांकि, आज के युवा इस कलाओं से बहुत कम परिचित हैं। अगर आपको यह स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर करें। ऐसी स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़े रहे हरजिंदगी के साथ।

Image Credit- Ai, Wikipedia


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