नोकझोंक, ताने और अवधी नखरे; यूपी की इन दो 'मशहूर औरतों' के आगे फेल है राजस्थान का पपेट शो

कठपुतली का नाम लेते ही राजस्थान पपेट शो का ख्याल दिमाग में आता है, लेकिन क्या आपको उत्तर प्रदेश की गुलाबो और सिताबो की कहानी पता है? ये दो किरदार अवध की तहजीब और व्यंग की पहचान है। चलिए नीचे लेख में जानिए इनकी कहानी और इतिहास-
Updated:- 2026-07-01, 08:48 IST
Traditional Indian puppet show

जब टेलीविजन नहीं हुआ करते थे, तब पारंपरिक लोककलाएं ही लोगों का मनोरंजन किया करती थीं। बदलते दौर के साथ ये विधाएं गुम होती जा रही हैं। हालांकि, पुराने समय की अपेक्षा आज ये बहुत कम देखने को मिलती हैं। पहले गांवों में नुक्कड़-नाटक, आल्हा, लोकगीत और कठपुतली के खेल हुआ करते थे। आज जब भी पपेट शो का नाम आता है, तो राजस्थान का जिक्र होना स्वाभाविक है, लेकिन क्या आपको पता है कि उत्तर प्रदेश की 'गुलाबो-सिताबो' की नोक-झोंक के आगे वह भी फीकी पड़ जाती है? अब आप सोच रहे होंगे कि भला ऐसा कैसे? तो चलिए, फिर देर किस बात की, नीचे लेख में जानें गुलाबो-सिताबो की पूरी कहानी।

गुलाबो-सिताबो कौन हैं?

गुलाबो और सिताबो का रिश्ता देवरानी-जेठानी का है। गुलाबो तेजतर्रार,निडर अपनी राय रखने वाली और एक तरफ सिताबो शांत-समझदार और समय आने पर उतनी ही हाजिर-जवाब। इनकी नोंक-झोंक लोगों को खूब गुदगुदाते थें। इनकी खास-बात ये थी कि ये मनोरंजन के साथ-साथ जागरूकता फैलाते थे। उसमें दहेज और बाल-विवाह के साथ-साथ समाज में फैली अन्य कुरीतियां। आज भी कई कलाकार इस परंपरा को जिंदा रखा हुआ है।

gulabo sitabo

कहां से शुरू हुई गुलाबो-सिताबो की कहानी?

अवध की पहचान गुलाबो और सिताबो की कहानी की शुरुआत लखनऊ की गलियों में सदियो पहले जन्मी। धीरे-धीरे यह उत्तर प्रदेश की सबसे लोकप्रिय लोककलाओं में शामिल हो गई है।

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राजस्थान के पपेट शो से क्यों है यूपी की गुलाबो-सिताबो अलग?

राजस्थान की कठपुतली कला पूरी दुनिया में मशहूर है, लेकिन यूपी की गुलाबो-सिताबो का अपना एक अलग ही स्वैग है। नीचे आसान भाषा में समझें कैसे ये दोनों कठपुतली कला एक-दूसरे से है।

rajasthan papet show

विशेषता राजस्थान की कठपुतली गुलाबो-सिताबो (यूपी)   
मुख्य विषय राजा-महाराजाओं की वीर गाथाएं, अमर सिंह राठौर के किस्से और दरबारी संस्कृति। 

आम आदमी के घर के झगड़े, महंगाई, देवरानी-जेठानी के ताने और सामाजिक मुद्दे।

शैली धागे से चलने वाली होती हैं, जिसमें संगीत और बैकग्राउंड स्कोर मुख्य होता है।    

ये हाथ के दस्ताने वाली होती हैं और इसमें संवाद और भाषा ही सब कुछ है।

भाषा मारवाड़ी/राजस्थानी गीतों की धुन। ठेठ, रसीली और तीखी अवधी बोली।

गुलाबो-सिताबो कला खत्म होने की कगार

एक समय था जब लखनऊ और आसपास के गांवों में गुलाबो-सिताबो के खेल के बिना कोई मेला या त्योहार पूरा नहीं होता था। उंगलियों पर नचती इन दो औरतों को देखने के लिए पूरा गांव इकट्ठा हो जाता था। समय के साथ यह कला थोड़ी फीकी जरूर पड़ी, लेकिन हाल के वर्षों में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और सिनेमा ने इसे फिर से चर्चा में ला दिया था।

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गुलाबो-सिताबो जैसी पारंपरिक कलाएं हमें अपनी जड़ों की याद दिलाती हैं। भले ही आधुनिक मनोरंजन के साधन बहुत बढ़ गए हों, लेकिन जो मजा अपनी मिट्टी की बोली सुनने और लाइव परफॉर्मेंस देखने में है। अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।

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