सावन में ज्‍यादातर लोग दर्शन करने के ल‍िए महाकाल जाते हैं। इस दौरान मंद‍िरों में काफी ज्‍यादा भीड़ बढ़ जाती है। उज्‍जैन के महाकाल मंद‍िर की बात करें तो यहां हर रोज सुबह होने वाली भस्‍म आरती दुन‍ियाभर में पॉपुलर है। कई लोग तो स‍िर्फ इस आरती को देखने के ल‍िए दूर-दूर से यहां आते हैं, लेक‍िन क्‍या आपने कभी सोचा है क‍ि आख‍िर बाबा महाकाल का श्रृंगार भस्‍म से ही क्‍यों क‍िया जाता है? भगवान श‍िव को भस्‍म इतनी प्र‍िय क्‍यों है?

क्‍या सच में आज भी भस्‍म आरती में च‍िता की राख का इस्‍तेमाल क‍िया जाता है? इन सभी सवालों के जवाब धार्मिक मान्यताओं, शिव पुराण और महाकाल की सदियों पुरानी परंपरा में छिपे हुए हैं। आइए जानते हैं कि महाकाल की भस्म आरती का आध्यात्मिक महत्व क्या है और यह परंपरा इतनी खास क्यों मानी जाती है।

महाकाल को क्यों कहा जाता है मृत्यु का स्वामी?

ये तो आप भी जानती होंगी क‍ि भगवान शिव के कई रूप हैं, लेकिन महाकाल उनका सबसे शक्तिशाली स्वरूप माना जाता है। महाकाल का मतलब है समय और मृत्यु के भी स्वामी। धार्मिक मान्यता है कि इस दुनिया में हर चीज एक दिन खत्म हो जाती है, लेकिन शिव अनंत हैं। इसलिए महाकाल का स्वरूप हमें याद दिलाता है कि जन्म और मृत्यु जीवन का सबसे बड़ा सत्य है। इसी वजह से महाकाल की पूजा केवल सुख-समृद्धि के लिए नहीं बल्कि मन को मोह-माया से दूर रखने के लिए की जाती है।

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भस्म से ही क्यों होता है बाबा महाकाल का श्रृंगार?

भगवान शिव को श्मशानवासी भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है क‍ि उन्हें भस्म बहुत ज्‍यादा प्रिय है, क्योंकि भस्म इस बात का प्रतीक है कि अंत में हर शरीर पंचतत्व में ही मिल जाता है। चाहे इंसान कितना भी धनवान या शक्तिशाली क्यों न हो, जीवन का आख‍िरी सच भस्म ही है। महाकाल का भस्म श्रृंगार भी हमें यही संदेश देता है कि शरीर कभी भी खत्‍म हो सकतस है, लेकिन आत्मा हमेशा अमर रहती है।

कैसे शुरू हुई भस्म आरती की परंपरा?

शिव पुराण में बताया गया है कि उज्जैन की अवंतिका नगरी में दूषण नाम का एक शक्तिशाली असुर आ पहुंचा था जो लोगों को काफी परेशान क‍िया करता था। उसने धर्म और वेदों को भी नष्ट करने की कोशिश की। तब भगवान शिव ने महाकाल का रूप ल‍िया और उसका वध कर दिया। तब असुर के भस्म होने के बाद भगवान शिव ने उसी भस्म को अपने शरीर पर लगाया और श्मशान में समाधि लगा ली। इसी घटना से महाकाल में भस्म श्रृंगार और भस्म आरती की परंपरा जुड़ी है। हालांक‍ि, यह बात धार्मिक मान्‍यताओं पर ही आधार‍ित है।

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भोर में ही क्यों होती है भस्म आरती?

महाकाल मंदिर में भस्म आरती सुबह 4 बजे ब्रह्म मुहूर्त में होती है। यह समय सूर्योदय से पहले का सबसे शुभ समय है। इस समय वातावरण सबसे शांत रहता है और मन आसानी से भगवान की भक्ति में लग जाता है, लेक‍िन ऐसा नहीं है क‍ि सीधे भस्‍म आरती ही कर दी जाती है। आरती से पहले भगवान महाकाल का अभिषेक, पूजन और श्रृंगार किया जाता है। इसके बाद वैदिक मंत्रों, शंख और नगाड़ों की ध्वनि के बीच भस्म अर्पित की जाती है।

क्या आज भी चिता की राख से होती है भस्म आरती?

कई लोगों को लगता है क‍ि बाबा महाकाल को जो भस्‍म लगाया जाता है, वह चि‍ता की होती है। दरअसल, पहले के समय में ऐसी मान्यता थी कि महाकाल का श्रृंगार ताजा चिता की भस्म से ही किया जाता था, लेकिन अब ऐसा कुछ नहीं है। अब भस्म आरती के लिए कपिला गाय के गोबर से बने कंडे और शमी, पलाश, पीपल, वट, अमलतास और बेर जैसी लकड़ियों को जलाकर भस्‍म बनाया जाता है।

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भस्म आरती का क्‍या है आध्यात्मिक महत्व?

भस्म आरती केवल एक धार्मिक रस्म नहीं है। इसका आध्यात्मिक अर्थ भी है, ज‍िसके बारे में ज्‍यादातर लोगों को नहीं मालूम है। जैसे-

  • भस्‍म आरती जीवन की नश्वरता का संदेश देती है।
  • इंसान को अहंकार छोड़ने की सीख देती है।
  • मन को वैराग्य और आत्मचिंतन की ओर ले जाती है।
  • भक्तों को मोक्ष के मार्ग पर चलने की सीख देती है।
  • भस्‍म आरती हमें याद दिलाती है कि पैसा, पॉवर और पॉपुलैर‍िटी सब यहीं रह जाते हैं, साथ केवल कर्म जाते हैं।

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Image Credit- Jagran/Incredible india